भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१९८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तुमलोग शीघ्रतापूर्वक महीसागरसंगम तीर्थमें जाओ। वहाँके पाँच तीर्थोंका सेवन करते हुए तुमलोग निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लोगे।

ऐसा कहकर संवर्तजी अपने अभीष्ट स्थानको चले गये और इन्द्रद्युम्न आदि वे सब लोग भर्तृयज्ञ मुनिके पास पहुँचकर वहाँ महीसागरसंगम तीर्थमें रहने लगे। मुनिने अपने विशेष ज्ञानसे जान लिया कि ये सब लोग भगवान् शंकरके गण हैं। यह जानकर वे उन सब लोगोंसे बोले—'अहो! तुमलोगोंका पुण्य अत्यन्त निर्मल और महान् है। जिससे इस महीसागरसंगम नामक गुप्तक्षेत्रमें तुम्हारा आगमन हुआ है। महीसागरसंगममें किया हुआ स्नान, दान, जप, होम और विशेषतः पिण्डदान सब अक्षय होता है। पूर्णिमा और अमावास्याको यहाँ किया हुआ स्नान, दान और जप आदि सब कर्म अक्षय फल देनेवाला होता है। देवर्षि नारदने पूर्वकालमें जब यहाँ स्थान निर्माण किया था, उस समय ग्रहोंने आकर वरदान दिया था। शनिदेवने जो वरदान दिया, वह इस प्रकार है—'जिस समय शनिवारके साथ अमावास्या हो, उस दिन यहाँ स्नान, दानपूर्वक श्राद्ध करे। यदि श्रावण मासके शनिवारको अमावास्या तिथि हो और उसी दिन सूर्यकी संक्रान्ति तथा व्यतीपात योग भी हो तो यह 'पुष्कर' नामक पर्व होता है। इसका महत्त्व सौ सूर्यग्रहणोंसे भी अधिक है। उक्त सब योगोंका सम्बन्ध यदि किसी प्रकार उपलब्ध हो जाय, तो उस दिन लोहेकी शनिमूर्तिका और सोनेकी सूर्यप्रतिमाका महीसागरसंगममें विधिपूर्वक पूजन करना चाहिये। शनिके मन्त्रोंसे शनिका और सूर्यसम्बन्धी मन्त्रोंसे सूर्यका ध्यान करके सब पापोंकी शान्तिके लिये भगवान् सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये। उस समय वहाँका स्नान प्रयागसे भी अधिक है, दान कुरुक्षेत्रसे भी बढ़कर है। महान् पुण्यराशि सहायक हो, तभी यह सब योग प्राप्त होता है। वहाँ किये हुए श्राद्धसे पितरोंको स्वर्गमें अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है। जैसे परम पवित्र गयाशिर पितरोंके लिये परम तृप्तिदायक है। इसी प्रकार उससे भी अधिक पुण्य देनेवाला महीसागरसंगम है।—'अग्निश्च ते योनिरिडा च देहो रेतोऽथ विष्णोर्मृतस्य नाभिः।' अर्थात् 'हे महीनदी! अग्नि तुम्हारी योनि (उत्पत्तिस्थान) और पृथ्वी तुम्हारी देह है। तुम यज्ञस्वरूप विष्णुके वीर्यसे उत्पन्न हुई हो और अमृतका केन्द्रस्थान हो।' इस सत्य वाक्यका श्रद्धापूर्वक उच्चारण करते हुए महीसागरसंगम तीर्थमें स्नान करना चाहिये। जो सब नदियोंमें प्रधान और पवित्र सागर है, तथा प्रचुर जलवाली समस्त तीर्थस्वरूपा जो मही नदी है, इन दोनोंको मैं अर्घ्य देता हूँ, प्रणाम करता हूँ और इनकी स्तुति भी करता हूँ। ताम्रा, रस्या, पयोवाहा, पितृप्रीतिप्रदा, शुभा, शस्यमाला, महासिन्धु, दातृदात्री, पृथुस्तुता, इन्द्रद्युम्नकन्या, क्षितिजन्मा, इरावती, महीपर्णा, महीशृंगा, गंगा, पश्चिमवाहिनी, नदी तथा राजनदी—इन अठारह नामोंकी मालाका स्नानकाल और श्राद्धकालमें मनुष्य सर्वत्र पाठ करे। ये सब नाम महाराज पृथुके कहे हुए हैं, इनका पाठ करनेवाला मनुष्य यज्ञमूर्ति भगवान् विष्णुके पदको प्राप्त होता है।* तदनन्तर निम्नांकित मन्त्र पढ़कर मही नदीको अर्घ्य देना चाहिये—

महीदोहे महानन्दसन्दोहे विश्वमोहिनि।
जाता हि सरितां राज्ञि पापं हर महिद्रवे ॥

'हे देवी! तू इस पृथ्वीकी दुग्ध है, परमानन्दकी राशि है, सम्पूर्ण विश्वको मोहनेवाली है तथा


* मुखं च यः सर्वनदीषु पुण्यः पाथोधिरम्बुप्रचुरा मही च।
समस्ततीर्थाकृतिकेतयोश्च ददामि चार्घ्यं प्रणमामि नौमि॥
ताम्रा रस्या पयोवाहा पितृप्रीतिप्रदा शुभा। शस्यमाला महासिन्धुर्दातृदात्री पृथुस्तुता॥
इन्द्रद्युम्नस्य कन्या च क्षितिजन्मा इरावती। महीपर्णा महीशृङ्गा गङ्गा पश्चिमवाहिनी॥
नदी राजनदी चेति नामाष्टादशमालिकाम्।
स्नानकाले च सर्वत्र श्राद्धकाले पठेन्नरः। पृथुनोक्तानि नामानि यज्ञमूर्तिपदं व्रजेत्॥
(वेङ्कटेश्वर प्रेसकी प्रतिसे)
(स्क० पु०, मा० कुमा० १३। १२४—१२७)