संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ११९
समस्त सरिताओंकी महारानीके रूपमें प्रकट हुई है। महिद्रवे! तू मेरे पाप हर ले।'
इस महीसागरसंगम तीर्थमें स्नान, जप और तपस्या करके पुण्यकर्मके प्रभावसे बहुत लोग रुद्रलोकमें चले गये हैं। विशेषतः सोमवारको, उत्तम भक्तिपूर्वक यहाँ स्नान करके जो पाँच तीर्थोंकी यात्रा करता है, वह पाँच महापातकोंसे मुक्त हो जाता है। इस प्रकार इस तीर्थका बहुविध उत्तम माहात्म्य बताकर भर्तृयज्ञने उन सबको शिवागममें बताये अनुसार शिवारोधनकी विधि बतलायी तथा पूजायोगका उपदेश देकर शिवभक्तिके उद्रेकसे पूर्ण हो उन इन्द्रद्युम्न आदि भक्तोंसे पुनः इस प्रकार कहा— 'शिवजीके व्रतका वर्णन करनेवाले उपासको! शिवजीसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं है। यह सर्वथा सत्य है, जो भगवान् शंकरको छोड़कर अन्य किसी भी वस्तुकी उपासना करता है वह हाथमें रखे हुए अमृतको त्यागकर मृगतृष्णाकी ओर दौड़ रहा है। यह सम्पूर्ण जगत् शिवशक्तिस्वरूप है; यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है; क्योंकि कुछ प्राणी पुँल्लिगंके चिह्नोंसे युक्त हैं और कुछ स्त्रीलिंगके चिह्नोंसे युक्त हैं। जो पुरुषचिह्नसे युक्त हैं वे शिवस्वरूप हैं तथा जिनमें स्त्रीलिंगसूचक चिह्न हैं वे सब शक्तिस्वरूप हैं। भगवान् रुद्रका उत्तम माहात्म्य 'शतरुद्रिय' के नामसे प्रसिद्ध है। तुमलोग यदि अपने पाप धोना चाहते हो तो उसका नियमपूर्वक श्रवण करो।
वह इस प्रकार है— ब्रह्माजी भगवान् शिवके सुवर्णमय लिंगकी आराधना करके उसके जगत्प्रधान (१) नामका जप करते हुए, अपने पदपर विराजमान हैं। श्रीकृष्णने स्थलभागमें काले पत्थरका शिवलिंग स्थापित करके ऊर्जित (२) नामसे उसकी आराधना की है। सनकादि महर्षियोंने अपने हृदयरूपी लिंगका जगद्गति (३) नामसे पूजन करके अपना अभीष्ट साधन किया है। सप्तर्षियोंने दर्भांकुरमय लिंगका विश्वयोनि (४) के नामसे पूजन किया है। देवर्षि नारद आकाशमें ही शिवलिंगकी भावना करके उसे जगद्बीज (५) नाम देकर उसकी आराधना करते हैं। देवराज इन्द्र वज्रमय लिंगकी विश्वात्मा (६) नामसे पूजा करते हैं। सूर्यदेव ताम्रमय लिंगकी पूजा और उसके विश्वसृग् (७) नामका जप करते हैं। चन्द्रमा मुक्तामय लिंगकी उपासना और उसके जगत्पति (८) नामका जप करते रहते हैं। अग्निदेव इन्द्रनीलमणिके शिवलिंगकी पूजा करते हुए उसके विश्वेश्वर (९) नामका जप करते हैं। बृहस्पतिजी पुखराज मणिके शिवलिंगकी आराधना और उसके विश्वयोनि (१०) नामका जप किया करते हैं। शुक्राचार्य विश्वकर्मा (११) नामसे प्रसिद्ध पद्मराग मणिमय शिवलिंगकी उपासना करते हैं। धनाध्यक्ष कुबेर सुवर्णमय लिंगकी पूजा और उसके ईश्वर (१२) नामका जप करते हैं। विश्वेदेवगण जगद्गति (१३) नामसे प्रसिद्ध रजतमय शिवलिंगकी पूजा करते हैं। यमराज पित्तलके शिवलिंगकी पूजा और उसकी शम्भु (१४) नामसे उपासना करते हैं। वसुगण काँसेके शिवलिंगकी आराधना और उसके स्वयम्भू (१५) नामका जप करते हैं। मरुद्गण त्रिविध लोहमय लिंगकी पूजा और उमेश या भूतेश (१६) नामका जप करते हैं। राक्षस लोहमय लिंगकी उपासना और भूतभव्यभवोद्भव (१७) नामका जप करते हैं। गुह्यकगण शीशेके शिवलिंगकी पूजा और योग (१८) नामका जप करते हैं। जैगीषव्य मुनि ब्रह्मरन्ध्रमय शिवलिंगकी उपासना और योगेश्वर (१९) नामका जप करते हैं। राजा निमि सबके युगल नेत्रोंमें ही शिवलिंगकी भावना करके उसकी आराधना करते और शर्व (२०) नाम जपते रहते हैं। धन्वन्तरि सर्वलोकेश्वरेश्वर (२१) नामसे प्रसिद्ध गोमयलिंगकी उपासना करते हैं। गन्धर्वगण लकड़ीके शिवलिंगकी पूजा और उसके सर्वश्रेष्ठ (२२) नामका जप करते हैं श्रीरामचन्द्रजी ज्येष्ठ (२३) नामका जप करते हुए वैदूर्यमय शिवलिंगकी पूजा करते हैं। बाणासुर मरकतमणिमय शिवलिंगकी पूजा और वासिष्ठ