संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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(२४) नामकी पूजा करता है। वरुणजी परमेश्वर (२५) नामसे प्रसिद्ध स्फटिकमणिमय शिवलिंगकी पूजा करते हैं। नागगण मूँगेके शिवलिंगकी उपासना और लोकत्रयंकर (२६) नामका जप करते हैं। सरस्वती देवी शुद्धमुक्तामय शिवलिंगको पूजती और लोकत्रयाश्रित (२७) नामका जप करती हैं। शनिदेव शनिवारकी अमावास्याको आधी रातके समय महीसागरसंगममें आवर्त (भँवर)-मय शिवलिंगकी पूजा और जगन्नाथ (२८) नामका जप करते हैं। रावण चमेलीके फूलका शिवलिंग बनाकर पूजा करता और सुदुर्जय (२९) नामका जप करता है। सिद्धगण मानसलिंगकी उपासना और काममृत्युजरातिग (३०) नामका जप करते हैं। राजा बलि यज्ञमय लिंगकी आराधना और उसके ज्ञानात्मा (३१) नामका जप करते हैं। मरीचि आदि महर्षि पुष्पमय शिवलिंगकी उपासना और ज्ञानगम्य (३२) नामका जप करते हैं। सत्कर्म करनेवाले देवता शुभ कर्ममय लिंगको पूजते और ज्ञानज्ञेय (३३) नामका जप करते हैं। फेन पीकर रहनेवाले महर्षि फेनिज लिंगकी उपासना और सुदुर्विद (३४) नामका जप करते हैं। कपिलजी वरद (३५) नामका जप करते हुए बालुकामय शिवलिंगकी पूजा करते हैं। सरस्वतीपुत्र सारस्वत मुनि वाणीमें शिवलिंगकी उपासना करते हुए वागीश्वर (३६) नामका जप करते हैं। शिवगण भगवान् शिवके मूर्तिमय लिंगकी उपासना करते हुए रुद्र (३७) नामका जप करते हैं। देवतालोग जाम्बूनद सुवर्णमय लिंगकी आराधना और शितिकण्ठ (३८) नामका जप करते हैं। बुध कनिष्ठ (३९) नामका जप करते हुए शंखमय शिवलिंगकी पूजा करते हैं। दोनों अश्विनीकुमार सुवेधा (४०) नामसे प्रसिद्ध मृत्तिकामय (पार्थिव) शिवलिंगकी पूजा करते हैं। गणेशजी आटेका शिवलिंग बनाकर कपर्दी (४१) नामसे उसकी उपासना करते हैं। मंगल मक्खनके शिवलिंगकी कराल (४२) नामसे उपासना करते हैं। गरुड़जी ओदनमय शिवलिंगकी हर्यक्ष (४३) नामसे उपासना करते हैं। कामदेव गुड़के शिवलिंगकी रतिद (४४) नामसे उपासना करते हैं। शचीदेवी लवणमय (सैन्धव अथवा सुन्दर रूपमय) शिवलिंगकी आराधना तथा बभ्रुकेश (४५) नामका जप करती हैं। विश्वकर्मा प्रासादमय (महलके आकारका) शिवलिंग बनाकर याम्य (४६) नामसे उसकी उपासना करते हैं। विभीषण धूलिमय शिवलिंगकी पूजा और सुहृत्तम (४७) नामका जप करते हैं। राजा सगर वंशांकुरमय शिवलिंगकी पूजा और संगत (४८) नामका जप करते हैं। राहु हींगमय लिंगकी उपासना और गम्य (४९) नामका कीर्तन करते हैं। लक्ष्मीदेवी लेप्य लिंगका पूजन तथा हरिनेत्र (५०) नामका जप करती हैं।
योगी पुरुष सर्वभूतस्थ लिंगकी उपासना और स्थाणु (५१) नामका जप करते हैं। मनुष्य नानाविध लिंगका पूजन और पुरुष (५२) नामका जप करते हैं। नक्षत्र तेजोमय लिंगका पूजन तथा भग और भास्वर (५३) नामका जप करते हैं। किन्नरगण धातुमय लिंगका पूजन तथा सुदीप्त (५४) नामका जप करते हैं। ब्रह्मराक्षसगण अस्थिमय लिंगका पूजन और देवदेव (५५) नामका जप करते हैं। चारणलोग दन्तमय लिंगका पूजन तथा रंहस (५६) नामका जप करते हैं। साध्यगण सप्तलोकमय लिंगका पूजन और बहुरूप (५७) नामका जप करते हैं। ऋतुएँ दूर्वांकुरमय लिंगका पूजन और सर्व (५८) नामका जप करती हैं। अप्सराएँ कुंकुम लिंगका पूजन और आभूषण (५९) नामका जप करती हैं। उर्वशी सिन्दूरमय लिंगका पूजन और प्रियवासन (६०) नामका जप करती हैं। गुरु ब्रह्मचारी लिंगका पूजन और उष्णीवी (६१) नामका जप करते हैं। योगिनियाँ अलक्तक लिंगका पूजन और सुवभ्रुक् (६२) नामका जप करती हैं। सिद्ध योगिनियाँ श्रीखण्ड लिंगका पूजन और सहस्राक्ष (६३) नामका जप करती हैं। डाकिनियाँ मांसमय लिंगका पूजन तथा उसके सुमीढुष् (६४) नामका जप करती हैं। मनुगण गिरिश (६५) नामसे प्रसिद्ध अन्नमय लिंगका पूजन करते हैं। अगस्त्य मुनि व्रीहिमय लिंगका पूजन और सुशान्त (६६) नामका जप करते