भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 150
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १२१

हैं। देवल मुनि यवमय लिंगका पूजन और पति (६७) नामका जप करते हैं। वाल्मीकि मुनि वाल्मीक लिंगका पूजन और चीरवासा (६८) नामका जप करते हैं। प्रतर्दनजी वाणलिंगका पूजन और हिरण्यभुज (६९) नामका जप करते हैं। दैत्यगण राईके शिवलिंगका पूजन और उग्र (७०) नामका जप करते हैं। दानवलोग निष्पावज लिंगका पूजन और दिक्पति (७१) नामका जप करते हैं। बादल नीरमय लिंगका पूजन तथा पर्जन्य (७२) नामका जप करते हैं। यक्षराज माषमय लिंगका पूजन और भूतपति (७३) नामका जप करते हैं। पितृगण तिलमय लिंगका पूजन और वृषपति (७४) नामका जप करते हैं। गौतम मुनि गोधूलिमय लिंगका पूजन और गोपति (७५) नामका जप करते हैं। वानप्रस्थगण फलमय लिंगका पूजन और वृक्षावृत (७६) नामका जप करते हैं। स्वामिकार्तिकेय पाषाणलिंगका पूजन और सेनान्य (७७) नामका जप करते हैं। अश्वतर नाग धान्यमय लिंगका पूजन और उसके मध्यम (७८) नामका जप करते हैं। यज्ञकर्ता पुरुष पुरोडाशमय लिंगका पूजन और स्रुवहस्त (७९) नामका जप करते हैं। यम कालायसमय लिंगका पूजन और धन्वी (८०) नामका जप करते हैं। परशुरामजी यवांकुर-लिंगका पूजन तथा भार्गव (८१) नामका जप करते हैं। पुरूरवा घृतमय लिंगका पूजन और बहुरूप (८२) नामका जप करते हैं। श्रीमान्धाता शर्करामय लिंगकी बाहुयुग (८३) नामसे आराधना करते हैं। गायें पयोमय 'दुग्धमय' लिंगका पूजन और नेत्रसहस्रदृक् (८४) नामका जप करती हैं। पतिव्रता स्त्रियाँ भर्तृमय लिंगका पूजन तथा विश्वपति (८५) नामका जप करती हैं। नर-नारायण मौञ्जीमय शिवलिंगका सहस्रशीर्ष (८६) नामसे आराधन करते हैं। पृथु सहस्रचरण (८७) नामवाले तार्क्ष्यलिंगका पूजन करते हैं। पक्षी सर्वात्मक (८८) नामसे व्योमलिंगका पूजन करते हैं। पृथ्वी गन्धमय लिंगका पूजन और उसके द्वितनु (८९) नामका जप करती हैं। पाशुपतगण भस्ममय लिंगका पूजन और उसके महेश्वर (९०) नामका जप करते हैं। ऋषि ज्ञानमय लिंगकी चिरस्थान (९१) नामसे उपासना करते हैं। ब्राह्मण ब्रह्म-लिंगकी ज्येष्ठ (९२) नामसे उपासना करते हैं। शेषनाग गोरोचनमय लिंगका पूजन और पशुपति (९३) नामका जप करते हैं। वासुकिनाग विषलिंगका पूजन और शंकर (९४) नामका जप करते हैं। तक्षकनाग कालकूटमय लिंगका पूजन तथा बहुरूप (९५) नामका जप करते हैं। कर्कोटकनाग हाला-हलमय लिंगका पूजन और पिंगाक्ष (९६) नामका जप करते हैं। शृंगी विषमय लिंगका पूजन तथा धूर्जटि (९७) नामका जप करते हैं। पुत्र पितृमय लिंगका पूजन और विश्वरूप (९८) नामका जप करता है। शिवादेवी पारदमय लिंगका पूजन और त्र्यम्बक (९९) नामका जप करती हैं। मत्स्य आदि जीव शस्त्रमय लिंगका पूजन तथा वृषाकपि (१००) नामका जप करते हैं।

इस प्रकार बहुत कहनेसे क्या लाभ, संसारमें जो-जो जीव किसी विलक्षण विभूतिसे युक्त हैं, उनकी यह विशेषता भगवान् शिवके आराधनाके प्रभावसे ही हुई है। यदि धर्म, अर्थ, काम, मोक्षकी प्राप्तिका विचार बुद्धिमें आता हो तो भगवान् शिवकी भलीभाँति आराधना करनी चाहिये; क्योंकि त्रिलोकीमें वे ही मनोवांछित वस्तु देनेवाले माने गये हैं। जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर इस शतरुद्रियका पाठ करेगा, उसपर प्रसन्न हो भगवान् शिव उसे सभी मनोवांछित वर प्रदान करेंगे। पृथ्वीपर इससे बढ़कर परम पवित्र दूसरी कोई वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण वेदोंका रहस्य है। भगवान् सूर्यने मुझे इसका उपदेश दिया था। शतरुद्रियका पाठ करनेपर मन, वाणी और क्रियाद्वारा आचरित समस्त पापोंका नाश हो जाता है। जो शतरुद्रियका जप करता है, वह रोगातुर हो तो रोगसे छूट जाता है, कारागारमें बँधा हुआ हो तो बन्धनसे छुटकारा पा जाता है, और भयभीत हो तो भयसे मुक्त हो जाता है। इन सौ नामोंका उच्चारण करके जो विद्वान् उतने ही फूलोंद्वारा भगवान् शिवकी पूजा करता है और सौ बार उन्हें प्रणाम करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। ये सौ लिंग, सौ इनके उपासक

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