संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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और सौ इन लिंगोंके नाम ये सभी सम्पूर्ण दोषोंका नाश करनेवाले माने गये हैं। विशेषतः इस महीतीर्थके इन पाँच लिंगोंके समक्ष जो इस शतरुद्रियका पाठ करेगा, वह पंचविषयजनित दोषोंसे मुक्त हो जायगा।
नारदजी कहते हैं—अर्जुन! उस गुप्त क्षेत्रमें शंकरजीके आराधनका यह माहात्म्य सुनकर वे इन्द्रद्युम्न आदि भक्त बहुत प्रसन्न हुए और पंचलिंगोंकी आराधना करते हुए भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर रहने लगे। तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर उनकी विशेष भक्तिसे प्रसन्न हो भगवान् शंकरने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और इस प्रकार कहा—
'हे बक, उलूक, गृध्र, कच्छप और राजा इन्द्रद्युम्न! तुमलोग मेरी सारूप्य मुक्तिको प्राप्त होकर मेरे ही लोकमें निवास करोगे। लोमश और मार्कण्डेय मुनि जीवन्मुक्त होंगे।'
भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर राजा इन्द्रद्युम्नने महाकालसे पूर्वकी ओर इन्द्रद्युम्नेश्वर नामक शिवलिंगकी स्थापना की। उस तीर्थके गुणोंको जानकर राजाने वहाँ चिरस्थायिनी कीर्ति करनेकी इच्छासे परम सुन्दर अविचल शिवलिंगकी स्थापना की। फिर शिवजीने कहा—'जो इस इन्द्रद्युम्नेश्वर लिंगकी पूजा करेगा, वह मेरा गण होगा और मेरे ही लोकमें निवास करेगा।' ऐसा कहकर भगवान् चन्द्रशेखर उन पाँचोंके साथ रुद्रलोकको चले गये और वे सब-के-सब पुनः शिवजीके गण हो गये। राजा इन्द्रद्युम्न ऐसे प्रभावशाली थे; जिन्होंने यज्ञ करते हुए इस महीनदीको प्रकट किया था। इस प्रकार यह महीसागरसंगम अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ हुआ। कुन्तीनन्दन! इस तीर्थका माहात्म्य तुम्हें संक्षेपसे बतलाया है। जो मनुष्य यहाँ संगममें स्नान करके इन्द्रद्युम्नेश्वरका पूजन करता है, उसका निवास उस धाममें होता है, जहाँ पार्वतीवल्लभ भगवान् महेश्वर विराजमान हैं। यह लिंग सब प्रकारके बन्धनोंका नाशक तथा गणाधीशका पद प्रदान करनेवाला है; क्योंकि राजाने सब प्रकारके बन्धनोंका त्याग करके ही इस लिंगको स्थापित किया था। अर्जुन! इस प्रकार इस उत्तम संगमका पुण्यदायक माहात्म्य तुमसे कहा है, तथा इन्द्रद्युम्नेश्वरकी भी पुण्योत्पादक महिमाका वर्णन किया है। जो इसका पाठ करेगा, उसको महान् पुण्य प्राप्त होगा।
कुमारका अनुताप, भगवान् विष्णुका उन्हें समझाना तथा उनकी सम्मतिसे स्कन्दद्वारा तीन शिवलिंगोंकी स्थापना और भगवान् शिवका वरदान
| **अर्जुनने कहा—**महामुने! आपने कथाके बीचमें जो कुमार नाथके माहात्म्यकी चर्चा की थी, उसे मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। | **नारदजी बोले—**अर्जुन! भगवान् कार्तिकेयजीने तारकासुरका वध करके स्वयं ही इस कुमारेश्वर नामक शिवलिंगको स्थापित किया था। मैं |
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