भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 152
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १२३

देवताओंके सेनानायक और सबका शासन करनेमें समर्थ कुमार कार्तिकेयको प्रणाम करके उनके महान् चरित्रका वर्णन करता हूँ। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो।

नारदजी कहते हैं—अर्जुन ! तारकासुरके मरनेके कारण परम बुद्धिमान् कार्तिकेयजी मन-ही-मन अत्यन्त उदास हो शोक करने लगे। उन्होंने स्तुति करनेवाले देवताओंको रोककर कहा—'देवगण ! मुझ पातकीका, जो सर्वथा शोचनीय है, गुण-गान कैसे करते हो? यद्यपि पापाचारीका वध करनेमें कोई दोष नहीं है, तथापि यह तारकासुर तो भगवान् शंकरका भक्त था, यह स्मरण करके मुझे बड़ा शोक हो रहा है। इसलिये मैं कोई प्रायश्चित्त सुनना चाहता हूँ; क्योंकि प्रायश्चित्त करनेसे बहुत बड़ा पाप भी नष्ट हो जाता है।'

भगवान् शंकरके बुद्धिमान् पुत्र कार्तिकेयजी जब इस प्रकार शोक कर रहे थे, उस समय भगवान् विष्णु देवताओंके बीच यों बोले—'महेशनन्दन ! यदि श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणको प्रमाण माना जाय तो दुष्टोंके वधमें कोई दोष नहीं है।* जो निर्दय मनुष्य दूसरोंके प्राणोंसे अपने प्राणोंका पोषण करता है, उसका वध कर डालना ही उसके लिये कल्याणकारी है; क्योंकि अपने दोषपूर्ण आचरणसे वह मनुष्य नरकको ही जाता है। रक्षाके कार्यमें लगे हुए समर्थ पुरुषोंद्वारा यदि पापाचारियोंका वध न किया जाय तो ये असमर्थ मनुष्य किसकी शरणमें जायँगे, तथा सम्पूर्ण विश्वको धारण करनेवाले धर्मस्वरूप वेद और यज्ञ कैसे होंगे। इसलिये तुमने तारकासुरका वध करके पुण्य ही प्राप्त किया है। तुम्हें पाप तो किसी प्रकार भी नहीं लगेगा। इतनेपर भी भगवान् शंकरके भक्तोंके प्रति यदि तुम्हारा बहुत अधिक आदर है, तो उसके लिये मैं बहुत उत्तम उपाय बतलाऊँगा, जिससे जन्मभरके पापोंसे छुटकारा मिल जाता है तथा एक कल्पतक रुद्रलोकमें दिव्य शरीर धारण करके वह मनुष्य परमानन्दका उपभोग करता है। स्कन्द ! पाप करनेपर जिसे बहुत अधिक पश्चात्ताप होता है, उसके लिये भगवान् शंकरके आराधनसे बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है। जिनकी महिमाका वर्णन करनेमें ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं तथा जिनके विषयमें कुछ कहनेमें श्रुति भी भयभीत होती है, उन भगवान् महेश्वरसे बढ़कर दूसरी कौन वस्तु हो सकती है।'

'त्रिलोकीमें भगवान् शंकरके सिवा दूसरा कौन ऐसा देवता है, जिसका पृथ्वी ही रथ है, ब्रह्माजी सारथी हैं, मैं बाण हूँ, मन्दराचल धनुष है तथा चन्द्रमा और सूर्य रथके पहिये हैं। कोई-कोई योगमार्गसे भगवान् शंकरकी आराधना बताते हैं, परंतु सदा शून्यकी उपासना करनेवाले उन योगियोंका मार्ग सर्वसाधारणके लिये दुःसाध्य है। इसलिये जो भोग और मुक्ति दोनों चाहता है, उसे उनके लिंगमय स्वरूपकी ही आराधना करनी चाहिये। सृष्टिके आदिमें मेरे और ब्रह्माजीके विवादमें भगवान् शिव लिंगरूपमें प्रकट हुए थे। उस लिंगमय स्वरूपमें सम्पूर्ण चराचर जगत् लीन होता है, इसीलिये वेदमें उसे लिंग कहा गया है। जो परम बुद्धिमान् भगवान् शंकरके स्वरूपभूत लिंगको श्रद्धा और पवित्र भावसे जलके द्वारा स्नान कराता है, उसने मानो ब्रह्माजीसे लेकर तृणपर्यन्त इस सम्पूर्ण जगत्को तृप्त कर दिया। मिट्टीका, काठका, ईंटेका अथवा पत्थरका मन्दिर बनाकर जो भगवान् शिवको अर्पित करता है, उसे क्रमशः सौगुना पुण्यफल प्राप्त होता है। इसलिये महासेन ! तुम्हें यहाँ शिवलिंगकी स्थापना करनी चाहिये।'

भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर सब देवता


* श्रुतिः स्मृतिश्चेतिहासः पुराणं च शिवात्मज। प्रमाणं चेत्ततो दुष्टवधे दोषो न विद्यते॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० २६। ११)