संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें९२४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहने लगे। तत्पश्चात् महादेवजीने कार्तिकेयको छातीसे लगाकर कहा— 'वत्स! तुम मेरे भक्तोंपर जो इतनी कृपा रखते हो, इससे तुम्हारे ऊपर मेरा प्रेम बहुत बढ़ गया है। जगद्गुरु भगवान् वासुदेवने जो कुछ कहा है, वह सब यथार्थ है। जो मैं हूँ, वही भगवान् विष्णुको जानना चाहिये तथा जो भगवान् विष्णु हैं, वही मैं हूँ। जैसे दो दीपकोंमें प्रकाशकी दृष्टिसे कोई अन्तर नहीं होता, उसी प्रकार हम दोनोंमें भी किंचिन्मात्र अन्तर नहीं है। स्कन्द! जो भगवान् विष्णुसे द्वेष करता है वह मुझसे भी द्वेष करता है, जो उनका अनुगमन करता है, वह मेरा भी अनुगामी है*। जो ऐसा जानता है, वही मेरा वास्तविक भक्त है।'
कुमार बोले—पिताजी! आपका कहना सत्य है, मैं आपको और भगवान् विष्णुको एक ही समझता हूँ। भक्तवत्सल भगवान् विष्णुने जो मुझे शिवलिंग स्थापित करनेकी सलाह दी है, वही बात तारकासुरके वधके समय पहले आकाशवाणीने भी मुझसे कही थी। अतः मैं सब पापोंका नाश करनेवाले शिवलिंगकी स्थापना करूँगा। वह शिवलिंग मेरे पापोंको शान्त करनेवाला हो।
यों कहकर अग्निनन्दन स्कन्दने विश्वकर्माको बुलाया और उन्हें आदेश दिया कि 'तुम शीघ्र ही तीन विशुद्ध शिवलिंग तैयार करो।' कार्तिकेयकी आज्ञाके अनुसार विश्वकर्माने तीन विशुद्ध शिवलिंग तैयार किये और उन्हें उनको समर्पित कर दिया। तदनन्तर भगवान् विष्णु, शिव तथा ब्रह्मा आदि देवताओंके साथ स्कन्दने पहले पश्चिमदिशामें थोड़ी ही दूरपर 'प्रतिज्ञेश्वर' नामक परम सुन्दर शिवलिंगकी स्थापना की। तब भगवान् महेश्वरने कुमारकी प्रसन्नताके लिये वहाँ स्वयं ही यह वरदान दिया। 'जो इस स्थानपर कार्तिक और चैत्रमासमें अष्टमीको स्नान, उपवास, पूजा और जागरण करके निवास करेगा, वह मृत्युको भी लाँघ जायगा।'
इसके बाद वहाँसे अग्निकोणमें जहाँ दैत्यके कपालसे शक्ति निकली थी, वहाँ कार्तिकेयने द्वितीय शिवलिंगको स्थापित किया। सब पापोंका नाश करनेवाला वह कल्याणकारी शिवलिंग 'कपालेश्वर'के नामसे प्रसिद्ध हुआ। कपालेश्वरके समीप ही उस शक्तिका भी स्तवन करके कुमारने उसकी स्थापना की। जो कापालिकेश्वरी देवीके नामसे प्रसिद्ध हुई। वहाँसे उत्तर दिशामें एक तीर्थ है, जिसे 'शक्तिछिद्र' कहते हैं। वहाँ सब पापोंका नाश करनेवाली कल्याणमयी पातालगंगा प्रकट हुई हैं। उसमें स्नान करके स्कन्दने सब देवताओंके साथ कृपापूर्वक तारकासुरको जलांजलि दी। जिसका संकल्प-वाक्य इस प्रकार है—'महर्षि कश्यपके कुलमें उत्पन्न शिवभक्त तारकको अर्पित किया जानेवाला यह तिलसहित जल अक्षय भावसे प्राप्त हो।'
तब भगवान् महेश्वरने प्रसन्न होकर स्कन्दको सुनाते हुए कहा—'जो मनुष्य चैत्रमासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथिको यहाँ स्नान और उपवास करके भगवान् कपालेश्वरका पूजन करेगा, वह तेजस्वी महात्माओंके वधजनित पातकसे मुक्त हो जायगा। इसी तिथिको यदि सोमवार हो, शिवयोग हो और तैतिलकरण हो तो इन छहों योगोंके एकत्र होनेपर जो पुरुष 'शक्तिछिद्रा' नामक तीर्थमें स्नान करके रातमें रुद्रियका जप करेगा, वह शरीरसहित रुद्रलोकमें चला जायगा।'
* यो ह्यहं स हरिर्ज्ञेयो यो हरिः सोऽहमित्युत॥
नावयोरन्तरं किञ्चिद्दीपयोरिव सुव्रत। एनं द्वेष्टि स मां द्वेष्टि योऽन्वेत्येनं स मानुगः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० २६। ४१-४२)