भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 154
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १२५ ---|---
भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर स्कन्द बहुत प्रसन्न हुए तथा सब देवता आनन्दमग्न हो 'साधु-साधु' कहने लगे।<br><br>तदनन्तर तीसरे लिंगकी स्थापना करनेकी इच्छावाले कार्तिकेयसे ब्रह्माजीने उनकी प्रसन्नताके लिये कहा—'कुमार! मैं स्वयं एक दूसरे लिंगका निर्माण करता हूँ।' यों कहकर ब्रह्माजीने स्वयं सब दोषोंसे रहित मनोहर शिवलिंगका निर्माण किया। इसी प्रकार सब देवताओंने भी स्कन्दको प्रसन्न करनेके लिये वहाँ एक सुन्दर सरोवर तैयार किया और उसमें गंगा आदि समस्त तीर्थोंकी स्थापना करके उनसे कहा—'जबतक यह सरोवर यहाँ रहे तबतक तुम सब तीर्थ इसमें निवास करो।' तब स्कन्दकी प्रसन्नताके लिये इन सब तीर्थोंने 'एवमस्तु' कहकर देवताओंकी आज्ञा स्वीकार की। तत्पश्चात् स्कन्दने प्रसन्नतापूर्वक उस सुन्दर सरोवरमें स्नान किया और सब तीर्थोंके जलसे भक्तिपूर्वक उस शिवलिंगको स्नान कराकर भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे 'सद्योजातादि' पाँच मन्त्रोंद्वारा पूजन किया। पूजाके समय साक्षात् भगवान् महेश्वर स्थावर-जंगम प्राणियोंके साथ उस शिवलिंगमें स्थित हो स्वयं पूजनसामग्री ग्रहण करते थे। भक्तिभावमें डूबे हुए स्कन्दने पूजन करते समय भगवान् शंकरसे पूछा—'भगवन्! आपको कौन-सा उपहार भेंट करनेसे क्या-क्या फल प्राप्त होता है?'<br><br>भगवान् महेश्वर बोले—जो मेरे लिंगकी स्थापना करता और उसके लिये सुन्दर मन्दिर बनवाता है, वह कल्पभर मेरे लोकमें निवास करता है। जो मेरे मन्दिरमें झाडू देता और धूल आदि हटाकर शुद्ध करता है, वह सब रोगोंसे छूट जाता है। देवमन्दिरको चूने आदिसे पुतवानेपर मनुष्यका शरीर दृढ़ होता है। पुष्प, दूध आदि, कुशा, तिल, जल, अक्षत और सरसोंसे भगवान् शंकरके मस्तकपरअर्घ्य देकर मनुष्य दस हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। दही और दूधसे शिवलिंगको स्नान करानेपर मनुष्यका शरीर नीरोग हो जाता है। जल, दही, दूध और घीसे स्नान करानेपर क्रमशः दसगुना फल प्राप्त होता है। उपर्युक्त वस्तुओंसे मुझे स्नान कराकर भक्तिपूर्वक गोधूम-चूर्ण आदिके द्वारा उबटन लगावे, फिर कपिला गायके पंचगव्यसे और गंगाके जलसे मुझे स्नान करावे और विधिपूर्वक मेरा पूजन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष मेरे परम धामको प्राप्त होता है। कुशमिश्रित जलकी अपेक्षा गन्धमिश्रित जल उत्तम है, उससे भी तीर्थका जल श्रेष्ठ है तथा अन्य सब तीर्थोंके जलकी अपेक्षा महीसागर तीर्थका जल श्रेष्ठ है। ताँबे, चाँदी और सोनेके कलशोंसे स्नान करानेपर क्रमशः सौगुना फल होता है। इसी प्रकार चन्दन, अगर, केशर तथा कपूर अर्पण करनेसे उत्तरोत्तर अधिक फलकी प्राप्ति होती है। इन सब वस्तुओंको मेरे अंगमें लगानेसे मनुष्य धनवान्, सौभाग्यवान् तथा सुखी होता है। गुग्गुलका धूप उत्तम माना गया है, उससे भी श्रेष्ठ अगुरु है, इन सब धूपोंको मुझे अर्पण करनेसे सुख और स्वर्गकी प्राप्ति होती है। दीप-दान करनेवाला पुरुष कीर्ति तथा उत्तम नेत्र प्राप्त करता है। नैवेद्य अर्पण करनेसे मनुष्य मिष्टान्नभोजी होता है। अखण्ड बिल्वपत्रों और भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे शिवलिंगकी पूजा करनेपर मनुष्य एक लाख वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। भगवान् शिवको चँवर भेंट करनेसे मनुष्य राजा होता है। मेरे मन्दिरमें गीत, वाद्य और नृत्य करके शुद्ध चित्त हुआ मनुष्य मुझको प्राप्त होता है। मेरी पूजाके लिये शंख और घण्टा दान करके दाता अवश्य विद्वान् होता है। मेरी रथयात्राका उत्सव करके मनुष्य चिरकालके लिये शोकोंसे मुक्त हो जाता है। मुझे नमस्कार और प्रणाम करके मानव महान् कुलमें जन्म लेता है। जो मेरे आगे शास्त्रका पाठ कराता है, वह