संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १२५ ---|---
| भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर स्कन्द बहुत प्रसन्न हुए तथा सब देवता आनन्दमग्न हो 'साधु-साधु' कहने लगे।<br><br>तदनन्तर तीसरे लिंगकी स्थापना करनेकी इच्छावाले कार्तिकेयसे ब्रह्माजीने उनकी प्रसन्नताके लिये कहा—'कुमार! मैं स्वयं एक दूसरे लिंगका निर्माण करता हूँ।' यों कहकर ब्रह्माजीने स्वयं सब दोषोंसे रहित मनोहर शिवलिंगका निर्माण किया। इसी प्रकार सब देवताओंने भी स्कन्दको प्रसन्न करनेके लिये वहाँ एक सुन्दर सरोवर तैयार किया और उसमें गंगा आदि समस्त तीर्थोंकी स्थापना करके उनसे कहा—'जबतक यह सरोवर यहाँ रहे तबतक तुम सब तीर्थ इसमें निवास करो।' तब स्कन्दकी प्रसन्नताके लिये इन सब तीर्थोंने 'एवमस्तु' कहकर देवताओंकी आज्ञा स्वीकार की। तत्पश्चात् स्कन्दने प्रसन्नतापूर्वक उस सुन्दर सरोवरमें स्नान किया और सब तीर्थोंके जलसे भक्तिपूर्वक उस शिवलिंगको स्नान कराकर भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे 'सद्योजातादि' पाँच मन्त्रोंद्वारा पूजन किया। पूजाके समय साक्षात् भगवान् महेश्वर स्थावर-जंगम प्राणियोंके साथ उस शिवलिंगमें स्थित हो स्वयं पूजनसामग्री ग्रहण करते थे। भक्तिभावमें डूबे हुए स्कन्दने पूजन करते समय भगवान् शंकरसे पूछा—'भगवन्! आपको कौन-सा उपहार भेंट करनेसे क्या-क्या फल प्राप्त होता है?'<br><br>भगवान् महेश्वर बोले—जो मेरे लिंगकी स्थापना करता और उसके लिये सुन्दर मन्दिर बनवाता है, वह कल्पभर मेरे लोकमें निवास करता है। जो मेरे मन्दिरमें झाडू देता और धूल आदि हटाकर शुद्ध करता है, वह सब रोगोंसे छूट जाता है। देवमन्दिरको चूने आदिसे पुतवानेपर मनुष्यका शरीर दृढ़ होता है। पुष्प, दूध आदि, कुशा, तिल, जल, अक्षत और सरसोंसे भगवान् शंकरके मस्तकपर | अर्घ्य देकर मनुष्य दस हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। दही और दूधसे शिवलिंगको स्नान करानेपर मनुष्यका शरीर नीरोग हो जाता है। जल, दही, दूध और घीसे स्नान करानेपर क्रमशः दसगुना फल प्राप्त होता है। उपर्युक्त वस्तुओंसे मुझे स्नान कराकर भक्तिपूर्वक गोधूम-चूर्ण आदिके द्वारा उबटन लगावे, फिर कपिला गायके पंचगव्यसे और गंगाके जलसे मुझे स्नान करावे और विधिपूर्वक मेरा पूजन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष मेरे परम धामको प्राप्त होता है। कुशमिश्रित जलकी अपेक्षा गन्धमिश्रित जल उत्तम है, उससे भी तीर्थका जल श्रेष्ठ है तथा अन्य सब तीर्थोंके जलकी अपेक्षा महीसागर तीर्थका जल श्रेष्ठ है। ताँबे, चाँदी और सोनेके कलशोंसे स्नान करानेपर क्रमशः सौगुना फल होता है। इसी प्रकार चन्दन, अगर, केशर तथा कपूर अर्पण करनेसे उत्तरोत्तर अधिक फलकी प्राप्ति होती है। इन सब वस्तुओंको मेरे अंगमें लगानेसे मनुष्य धनवान्, सौभाग्यवान् तथा सुखी होता है। गुग्गुलका धूप उत्तम माना गया है, उससे भी श्रेष्ठ अगुरु है, इन सब धूपोंको मुझे अर्पण करनेसे सुख और स्वर्गकी प्राप्ति होती है। दीप-दान करनेवाला पुरुष कीर्ति तथा उत्तम नेत्र प्राप्त करता है। नैवेद्य अर्पण करनेसे मनुष्य मिष्टान्नभोजी होता है। अखण्ड बिल्वपत्रों और भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे शिवलिंगकी पूजा करनेपर मनुष्य एक लाख वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। भगवान् शिवको चँवर भेंट करनेसे मनुष्य राजा होता है। मेरे मन्दिरमें गीत, वाद्य और नृत्य करके शुद्ध चित्त हुआ मनुष्य मुझको प्राप्त होता है। मेरी पूजाके लिये शंख और घण्टा दान करके दाता अवश्य विद्वान् होता है। मेरी रथयात्राका उत्सव करके मनुष्य चिरकालके लिये शोकोंसे मुक्त हो जाता है। मुझे नमस्कार और प्रणाम करके मानव महान् कुलमें जन्म लेता है। जो मेरे आगे शास्त्रका पाठ कराता है, वह |
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ज्ञानी होता है। भक्तिपूर्वक मेरी स्तुति करनेपर मनुष्य मनके मोहसे मुक्ति पा जाता है। मेरे आगे आरती घुमानेसे उपासक पीड़ारहित होता है। मुझे शीतल चन्दन अर्पण करनेपर दुःखजनित सन्तापोंसे छुटकारा मिल जाता है। शिवलिंगके समीप अपनी शक्तिके अनुसार दान करनेपर दाताको उस दानका सौगुना फल मिलता है तथा वह इस लोक और परलोकमें आनन्दका भागी होता है। मैं शिवलिंगको प्रणाम करनेपर पंद्रह, उसे स्नान करानेपर बीस तथा उसकी विधिपूर्वक पूजा करनेपर सौ अपराधोंको क्षमा कर देता हूँ। कुमार! इस तीर्थमें पूर्वोक्त सम्पूर्ण फलोंकी प्राप्ति होगी। जो लोग कुमारेश्वर नामसे यहाँ मेरी पूजा करेंगे, वे पूर्वोक्त सम्पूर्ण फलोंके भागी होंगे। बेटा! जैसे काशीपुरीमें मैं विश्वनाथके रूपमें निवास करता हूँ, उसी प्रकार इस गुप्त क्षेत्रमें मैं कुमारेश्वर नाम धारण करके रहूँगा।
देवताओंके सामने ही भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर कुमार कार्तिकेयको बड़ा विस्मय हुआ। वे भगवान् गिरिजापतिको नमस्कार करके उनकी स्तुति करने लगे—'जो सब प्रकारके रोग-शोकसे रहित हैं, उन कल्याणस्वरूप भगवान् शिवको नमस्कार है। जो सबके भीतर मनरूपसे निवास करते हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। सम्पूर्ण देवताओंसे पूजित भगवान् शंकरको नमस्कार है। भक्तजनोंपर निरन्तर कृपा करनेवाले आप भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। सबकी उत्पत्तिके कारण भगवान् भवको नमस्कार है। भगवन्! आप भवके उद्भव (संसारके स्रष्टा) हैं, आपको नमस्कार है। कामदेवका विध्वंस करनेवाले आपको नमस्कार है। आप गूढ़ भावसे महान् व्रतका पालन करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप मायारूपी गहन वनके आश्रय हैं, अथवा सबको आश्रय देनेवाला आपका स्वरूप योगमायासमावृत होनेके कारण दुर्बोध है, आपको नमस्कार है। प्रलयकालमें जगत्का संहार करनेवाले 'शर्व' नामधारी आपको नमस्कार है। शिवरूप आपको नमस्कार है। आप पुरातन सिद्धरूप हैं, आपको नमस्कार है। कालरूप आपको नमस्कार है। आप सबकी कलना (गणना) करनेवाले होनेके कारण 'कल' नामसे प्रसिद्ध हैं। आपको नमस्कार है। आप कालकी कलाका अतिक्रमण करके उससे बहुत दूर रहते हैं, आपको नमस्कार है। आप स्वाभाविक ऐश्वर्यसे सम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। आप अप्रमेय महिमावाले वृषभ तथा महासमृद्धिसे सम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। आप सबको शरण देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही निर्गुण ब्रह्म हैं, आपको नमस्कार है। आपके अनुगामी सेवक भयानक गुणसम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। नाना भुवनोंपर अधिकार रखनेवाले आपको नमस्कार है। भक्तोंको मनोवांछित फल प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है। भगवन्! आप ही कर्मोंका फल देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही सबका धारण-पोषण करनेवाले धाता तथा उत्तम कर्ता हैं। आपको सर्वदा नमस्कार है। आपके अनन्त रूप हैं, आपका कोप सबके लिये असह्य है। आपको सदैव नमस्कार है। आपके स्वरूपका कोई माप नहीं हो सकता, आपको नमस्कार है। वृषभेन्द्रको अपना वाहन बनानेवाले आप भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। आप सुप्रसिद्ध महौषधरूप हैं, आपको नमस्कार है। समस्त व्याधियोंका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है। आप चराचरस्वरूप, सबको विचार देनेवाले, कुमारनाथके नामसे प्रसिद्ध तथा परम कल्याणस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। प्रभो! आप मेरे स्वामी हैं, सम्पूर्ण भूतोंके ईश्वर एवं महेश्वर हैं। आप ही समस्त भोगोंके अधिपति हैं। वाणी, बल और बुद्धिके अधिपति भी आप ही हैं। आप ही क्रोध और मोहपर शासन करनेवाले हैं। पर और अपर (कारण और कार्य)-के स्वामी भी आप ही हैं। सबकी हृदयगुहामें निवास करनेवाले परमेश्वर
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तथा मुक्तिके अधीश्वर भी आप ही हैं, आपको नमस्कार है।'
पार्वतीनन्दन स्कन्दने सबको वर देनेवाले शूलपाणि भगवान् उमापतिकी इस प्रकार स्तुति करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और 'नमो नमः' का उच्चारण किया।*
इस प्रकार भक्तिभावसे भरे हुए अपनेयोग्य स्तवन सुनकर शिवजी बहुत सन्तुष्ट हुए और पुत्र कार्तिकेयका उन्होंने चिरकालतक अभिनन्दन करके कहा—'बेटा! मेरे भक्तके वध करनेका जो दुःख तुम्हारे मनमें हुआ है, उसका विचार तुमको नहीं करना चाहिये। अपने इस कर्मसे तुम मुनियोंके लिये भी स्पृहणीय बन गये हो। जो लोग सायंकाल और सबेरे पूर्ण भक्तिपूर्वक तुम्हारे द्वारा की हुई इस स्तुतिसे मेरा स्तवन करेंगे, उनको जो फल प्राप्त होगा, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो—उन्हें कोई रोग नहीं होगा, दरिद्रता भी नहीं होगी तथा प्रियजनोंसे कभी वियोग भी न होगा। वे इस संसारमें दुर्लभ भोगोंका उपभोग करके मेरे परम धामको प्राप्त होंगे। इतना ही नहीं, मैं उन्हें और भी परम दुर्लभ वर प्रदान करूँगा। बेटा! मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत प्रसन्न हूँ और तुम्हारी प्रसन्नताके लिये सब कुछ करूँगा। जो मनुष्य वैशाखमासकी पूर्णिमाको महीसागरके तटपर मेरी स्तुति करेंगे, उनका वह सब दान, पूजन अक्षय होगा। जो मानव वैशाखकी पूर्णिमाको यहाँके सरोवरमें स्नान करेंगे, उन्हें सब तीर्थोंके स्नानजनित फलकी प्राप्ति होगी। कार्तिकेय! जब कभी अनावृष्टि हो, नाना प्रकारके उत्तम कलशोंद्वारा विधिपूर्वक गन्धयुक्त जलसे मुझे एक, तीन, पाँच अथवा सात राततक स्नान करावे और मेरे सर्वांगमें कुंकुमका लेप करे, फिर दो वस्त्र धारण कराकर लाल कनेरके पुष्पोंसे तथा जवाके पुष्पोंसे और फूलकी मालाओंसे मेरा पूजन करे। पूजनके पश्चात् उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी ब्राह्मणोंको भोजन करावे। मेरी प्रसन्नताके लिये एक लाख आहुति हवन करे, ग्रहादिकी शान्तिके लिये भी हवन करे। तदनन्तर भूमिदान करके गौके लिये दैनिक ग्रास (अथवा एक दिनके खानेके लिये पर्याप्त चारा, दाना आदि) दे। तत्पश्चात् मंगलमय शान्तिपाठ एवं रुद्रका जप करावे। इसी विधानसे उत्तम ब्राह्मणोंद्वारा अनुष्ठान करानेपर जल-शून्य बादल भी उस समय अवश्य वर्षा करते हैं। भाँति-भाँतिके धान्यों तथा हरी-हरी घासोंसे वसुधा परिपूर्ण हो जाती है। मनुष्यों और पशुओंमें कोई रोग नहीं रह जाता। इस अनुष्ठानके प्रभावसे राजा धर्मपरायण होता है। शत्रुमण्डलीसे वह कभी पीड़ित नहीं होता। जो मनुष्य यहाँ भक्तियुक्त होकर मुझे घृतसे स्नान कराता है, उसे कन्यादानका फल होता है। जो दूध अथवा पंचामृतसे मुझे स्नान कराता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है। जो कुमारेश्वर तीर्थमें मृत्युको प्राप्त होता है,
* नमः शिवायास्तु निरामयाय नमः शिवायास्तु मनोमयाय । नमः शिवायास्तु सुरार्चिताय तुभ्यं सदा भक्तकृपापराय ॥
नमो भवायास्तु भवोद्भवाय नमोऽस्तु ते ध्वस्तमनोभवाय । नमोऽस्तु ते गूढमहाव्रताय नमोऽस्तु मायागहनाश्रयाय ॥
नमोऽस्तु शर्वाय नमः शिवाय नमोऽस्तु सिद्धाय पुरातनाय । नमोऽस्तु कालाय नमः कलाय नमोऽस्तु ते कालकलातिगाय ॥
नमो निसर्गात्मकभूतिकाय नमोऽस्त्वमेयोक्षमहर्द्धिकाय । नमः शरण्याय नमोऽगुणाय नमोऽस्तु ते भीमगुणानुगाय ॥
नमोऽस्तु नाना भुवनाधिकर्त्रे नमोऽस्तु भक्ताभिमतप्रदात्रे । नमोऽस्तु कर्मप्रसवाय धात्रे नमः सदा ते भगवन्सुकर्त्रे ॥
अनन्तरूपाय सदैव तुभ्यमसहा्रकोपाय सदैव तुभ्यम् । अमेयमानाय नमोऽस्तु तुभ्यं वृषेन्द्रयानाय नमोऽस्तु तुभ्यम् ॥
नमः प्रसिद्धाय महौषधाय नमोऽस्तु ते व्याधिगणापहाय । चराचरायाथ विचारदाय कुमारनाथाय नमः शिवाय ॥
ममेश भूतेश महेश्वरोऽसि कामेश वागीश बलेश धीश । क्रोधेश मोहेश परापरेश नमोऽस्तु मोक्षेश गुहाशयेश ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० २७। ४०—४७)
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वह महाप्रलयकालतक मेरे लोकमें निवास करता है। अयणारम्भके दिन, विषुव योगमें (जब कि दिन और रात बराबर होते हैं), चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणकालमें, पूर्णिमा तथा अमावास्या तिथिको, संक्रान्तिके समय तथा वैधृति योगमें जो मनुष्य महीसागरसंगममें स्नान करके भक्तिपूर्वक कुमारेश्वरका पूजन करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो—पृथ्वीके सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेका जो महान् फल है तथा सम्पूर्ण शिवलिंगोंके पूजनका जो सर्वश्रेष्ठ फल है, वह सब उसे प्राप्त होता है। कुमारेश्वरकी सेवासे मनुष्यको निश्चतरूपसे आरोग्य, पुत्र, धन तथा उत्तम सुखकी प्राप्ति होती है। जो तपस्वी इस तीर्थमें ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए, पवित्रतापूर्वक निवास करता है, वह सर्वश्रेष्ठ पाशुपत योगको प्राप्त करके मुझमें लीन हो जाता है। बेटा! यहाँ तुम्हारे द्वारा स्थापित किये हुए शिवलिंगको तुम्हारी प्रसन्नताकी वृद्धिके लिये मैंने ये वरदान दिये हैं।
स्कन्दने कहा—महेश्वर! आपके दिये हुए ये वरदान पाकर मैं कृतकृत्य हो गया। आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है। प्रभो! आप कभी इस स्थानका त्याग न करें।
देवेश्वर भगवान् शिवसे प्रणामपूर्वक यह प्रार्थना करनेके पश्चात् स्कन्दने माता पार्वतीके चरणोंमें मस्तक झुकाकर कहा—'माँ! मेरा प्रिय करनेकी अभिलाषासे तुम्हें भी इस स्थानका कभी त्याग न करना चाहिये।'
पार्वती बोलीं—बेटा! जहाँ भगवान् शंकर विराजमान होते हैं, वहाँ तो मैं स्वभावसे ही निवास करती हूँ। षडानन! यहाँ स्त्रियोंद्वारा मेरी आराधना होनेपर मैं उन्हें सौभाग्य, उत्तम पति तथा अनेक पुत्र प्रदान करूँगी। चैत्रमासकी तृतीयाको शीतल जलसे स्नान करके जो नारी फूल, चन्दन, धूप आदिसे मेरी पूजा करेगी और भक्तिपूर्वक मुझे आठ सौभाग्यसूचक वस्तुएँ अर्पण करेगी, उसे मैं पिता, माता, सास, श्वशुर, पति, पुत्र, सौभाग्य तथा सम्पत्ति—ये आठ वस्तुएँ प्रदान करूँगी। कुंकुम, पुष्प, चन्दन, ताम्बूल, काजल, ईख, लवण और जीरा—ये आठ सौभाग्यसूचक वस्तुएँ हैं। इन सब वस्तुओंको तराजूके पलड़ेपर रखकर उनसे अपनेको तोले तथा वह स्त्री अपने पैरसहित सम्पूर्ण अंगोंके साथ तुल जाय और उन वस्तुओंका मेरी प्रीतिके लिये दान कर दे। तत्पश्चात् वह बिना नमकका भोजन करे। ऐसा करनेवाली स्त्री संसारमें कभी विधवा नहीं होती—सदा सौभाग्यवती बनी रहती है। जो स्त्री माघ, कार्तिक अथवा चैत्रमें यहाँ स्नान करके मेरी पूजा करेगी, उसे दुःख, दरिद्रता और दुर्भाग्यका संयोग कभी नहीं होगा।
गिरिराजनन्दिनी पार्वतीकी यह बात सुनकर उनके पुत्र स्कन्दको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने माता पार्वतीकी स्थापना करके अपने भाई गणेशजीसे कहा—'विनायक! जो लोग पुष्प, धूप और मोदकसे पहले तुम्हारी पूजा करके फिर कुमारेश्वरका पूजन करते हैं, उनके सभी विघ्नोंका तुम निवारण करो।'
- माहेष्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १२९
गणेशजी बोले—भैया ! तुम्हारे द्वारा स्थापित इस शिवलिंगके प्रति जो लोग भक्ति रखते हैं, उन्हें मेरी तथा मेरे अनुगामियोंकी ओरसे कोई भी विघ्न नहीं होगा।
विघ्नराज गणेशके प्रसन्नतापूर्वक ऐसा कहनेपर कुमारने उनकी भी स्थापना की। इसलिये वहाँ सर्वदा ही विशेषतः चतुर्थी तिथिको गणेशजीका पूजन अवश्य करना चाहिये। इस प्रकार भगवान् कुमारेश्वरकी स्थापना करके भगवान् शिवसे ये वरदान पाकर प्रसन्न हुए कार्तिकेयने अपनेको कृतकृत्य माना तथा वे भगवान् कुमारेश्वरके समीप स्वयं भी अंशतः निवास करने लगे। स्वामिकार्तिकेयकी यात्रा करनेवाले जो लोग इस तीर्थमें निवास करनेवाले भगवान् शंकरका दर्शन करते हैं, उनकी वह यात्रा सफल होती है। विशेषतः कार्तिककी पूर्णिमाको कार्तिकेयजीका पूजन करे। ऐसा करनेसे स्कन्द स्वामीकी यात्राका जो फल है, वह पूर्णरूपेण प्राप्त होता है। कार्तिकेयके एक सौ आठ नामोंका ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक पवित्र भावसे एक मासतक जप करनेपर मनुष्य सब संकटोंसे छुटकारा पा जाता है।* अर्जुन ! यह महीसागरसंगम तीर्थ ऐसी ही महिमावाला है।
* श्रीविश्वामित्रजीने कुमार कार्तिकेयजीकी स्तुति करते हुए उनके १०८ नाम इस प्रकार बतलाये हैं—
'भगवान्! आप (१) ब्रह्मवादी (वेदोंके वक्ता एवं परब्रह्म परमात्माके तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाले) हैं, आप ही (२) ब्रह्मा हैं, आप ही (३) ब्रह्म, (४) ब्राह्मणवत्सल, (५) ब्रह्मण्य (ब्राह्मणभक्त), (६) ब्रह्मदेव, (७) ब्रह्मद (ब्रह्मज्ञानको देनेवाले) तथा (८) ब्रह्मसंग्रह (वेदार्थोंके संग्रही और केवल परब्रह्म परमात्माको ही सम्यक् रूपसे ग्रहण करनेवाले) हैं। आप (९) सर्वोत्कृष्ट, परमतेज, (१०) मंगलमंगल (मंगलोंके भी मंगल), (११) अप्रमेयगुण (असंख्य गुणवाले) और (१२) मन्त्रमन्त्रग (मन्त्रोंके सारभूत मन्त्रमें भी गति रखनेवाले) हैं। आप ही (१३) देव! आप ही सावित्रीमय हैं। आप (१४) सर्वत्र अपराजित (अजेय), (१५) मन्त्र, शर्वात्मक मन्त्र, (१६) देव (दिव्यप्रकाशमय) तथा (१७) षडक्षरवतां वरः (छः अक्षरवाले मन्त्र 'ॐ नमः शिवाय' का जप करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ) हैं। आप (१८) गवाम्पुत्र (गौ अर्थात् जलस्वरूपा गंगाके पुत्र), (१९) सुरारिघ्न (देवशत्रुओंका नाश करनेवाले), (२०) सम्भव (असम्भवको भी सम्भव कर दिखानेवाले), (२१) भवभावन (ब्रह्मरूपसे संसारकी सृष्टि करनेवाले), (२२) पिनाकी (शंकररूपसे पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले), (२३) शत्रुहा (शत्रुनाशक), (२४) श्वेत (श्वेत पर्वतरूप), (२५) गूढ (एकान्तस्थानमें जन्म ग्रहण करनेवाले अथवा छिपी हुई शक्ति और महिमावाले), (२६) स्कन्द (उछलकर चलनेवाले), (२७) सुराग्रणी (देवताओंके अगुआ), (२८) द्वादश (बारह नेत्र और कान आदि धारण करनेवाले), (२९) भू (मण्डलस्वरूप), (३०) भुवः (अन्तरिक्ष लोकस्वरूप), (३१) भावी (सबको उत्पन्न करनेवाले अथवा भवितव्यतारूप), (३२) भुवःपुत्र (पृथ्वीपर रखे हुए भगवान् शंकरके वीर्यसे उत्पन्न होनेके कारण पृथ्वीके पुत्ररूपसे प्रसिद्ध) (३३) नमस्कृत (सबके द्वारा अभिवन्दित), (३४) नागराज (नागोंके स्वामी), (३५) सुधर्मात्मा, (३६) नाकपृष्ठ (स्वर्गके संरक्षक होनेके कारण उसकी आधारभूमि), (३७) सनातन (सदा रहनेवाले), (३८) हेमगर्भ (स्वर्णके समान कान्तिवाले तेजोमय वीर्यसे उत्पन्न), (३९) महागर्भ (अनेक माताओंके गर्भमें वास करनेवाले), (४०) जय (युद्धमें जय पानेवाले) तथा (४१) विजयेश्वर (विजयके स्वामी) हैं। आप ही (४२) कर्ता, (४३) विधाता (धारण-पोषण करनेवाले), (४४) नित्य (अविनाशी), (४५) नित्यारिमर्दन (सदा शत्रुओंका संहार करनेवाले), (४६) महासेन (विशाल सेनाके अधिपति), (४७) महातेजा (परम तेजस्वी), (४८) वीरसेन (पराक्रमी सैनिकोंके अधिनायक), (४९) चमूपति (सेनापति), (५०) शूरसेन (शौर्यशालिनी सेनाके संचालक), (५१) सुराध्यक्ष (देवताओंके सेनानायक), (५२) भीमसेन (भयंकर सेनावाले), (५३) निरामय (रोगरहित), (५४) शौरि (शौर्यसम्पन्न भगवान् शंकरके पुत्र), (५५) पटु (कुशल एवं समर्थ), (५६) महातेजा (महाप्रतापी), (५७) वीर्यवान् (बल और पराक्रमसे सम्पन्न), (५८) सत्यविक्रम (सत्यपराक्रमी), (५९) तेजोगर्भ (अग्निपुत्र अथवा तेजोमय वीर्यसे प्रादुर्भूत), (६०) असुररिपु (असुरोंके शत्रु), (६१) सुरमूर्ति (देवस्वरूप), (६२) सुरोजित (देवताओंसे अधिक बलवान्), (६३) कृतज्ञ (उपकारको माननेवाले) (६४) वरद (वर देनेवाले), (६५) सत्य (सत्यवादी), (६६) शरण्य (शरणागतपालक), (६७) साधुवत्सल (साधु पुरुषोंपर स्नेह रखनेवाले), (६८) सुव्रत (उत्तम व्रतका पालन करनेवाले), (६९) सूर्यसङ्काश (सूर्यके समान तेजस्वी), (७०) वह्निगर्भ (अग्निके गर्भसे उत्पन्न), (७१) रणोत्सुक (युद्धके लिये उत्कण्ठित रहनेवाले), (७२) पिप्पली (पीपलका सेवन करनेवाले), (७३) शीघ्रग (तीव्र गतिसे चलनेवाले), (७४) रौद्रि (रुद्रपुत्र), (७५) गाङ्गेय (गंगापुत्र), (७६) रिपुदारण (शत्रुओंको विदीर्ण करनेवाले), (७७) कार्तिकेय (कृत्तिकापुत्र), (७८) प्रभु (समर्थ), (७९) क्षान्त (क्षमाशील),
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इस प्रकार कुमारेश्वरका संक्षेपसे वर्णन किया गया, जो कुमारेश्वरके इस माहात्म्यका उनके आगे पाठ करता है तथा जो लोग इस माहात्म्यको सुनते और प्रसन्न होते हैं, वे सभी रुद्रलोकमें निवास करते हैं। जो श्राद्धकालमें इस लिंगके माहात्म्यका पाठ करता है, उसका किया हुआ श्राद्ध पितरोंको अक्षय तृप्ति प्रदान करनेवाला होता है। यदि कोई गर्भवती स्त्रीको इस शिवलिंगका माहात्म्य सुनावे, तो उसके गर्भसे गुणवान् पुत्र उत्पन्न होता है। और यदि कन्या हुई तो वह पतिव्रता होती है। यह प्रसंग परम पवित्र, पापहारक, धर्मानुकूल तथा अतिशय आनन्द प्रदान करनेवाला है। इसे पढ़ने और सुननेवाले मनुष्योंको यह समस्त मनोवांछित फल प्रदान करनेवाला है।
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कुमारका विजयस्तम्भ, प्रलम्ब दानवका वध तथा भूगोलका वर्णन
नारदजी कहते हैं— कुमारके द्वारा कुमारेश्वरकी स्थापना हो जानेपर देवताओंने दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— 'प्रभो! हम आपकी विजयकीर्ति प्रकाशित करनेके लिये जलमें एक उत्तम स्तम्भ डालेंगे और उसके आगे आप विश्वकर्माके द्वारा बनाये हुए तीसरे शिवलिंगकी स्थापना करें।' देवताओंके ऐसा कहनेपर महामना स्कन्दने 'तथास्तु' कहकर अनुमति दे दी। तब इन्द्र आदि देवताओंने प्रसन्न होकर सुवर्ण एवं उत्तम रत्नोंके बने हुए एक उत्तम स्तम्भको जलमें डालकर खड़ा किया। उस खम्भेके चारों ओर रत्नोंका चबूतरा बनवाया। उस समय आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुई और देवताओंके बाजे बज उठे। उस स्तम्भका नाम रखा गया 'विश्वनन्दक'। उसका आरोपण हो जानेके पश्चात् उसीके पश्चिम भागमें भगवान् स्तम्भेश्वरकी स्थापना की गयी। स्तम्भेश्वरसे पश्चिमकी ओर महात्मा स्कन्दने अपनी शक्तिके अग्र भागसे एक कूपका निर्माण किया, जिसमें पातालगंगा प्रकट हुई हैं। अर्जुन! माघके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको जो मनुष्य उस कूपमें स्नान करके पितरोंका तर्पण करेगा, उसे निश्चय ही गया-श्राद्धसे होनेवाले पुण्यफलकी प्राप्ति होगी। तर्पणके पश्चात् गन्ध और पुष्पसे भगवान् स्तम्भेश्वरकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष वाजपेय यज्ञका फल प्राप्त करके भगवान् शिवके परमधाममें आनन्दका
(८०) नीलदंष्ट्र (नीले दाँतवाले), (८१) महामना (अत्यन्त उदार हृदयवाले), (८२) निग्रह (निरपराध लोगोंका दमन करनेकी दानवीय प्रथाको बलपूर्वक रोकनेवाले), (८३) नेता (सेनानायक) तथा आप ही, (८४) सुरनन्दन (देवताओंको आनन्दित करनेवाले), (८५) प्रग्रह (शत्रुओंको बलपूर्वक पकड़ लेनेवाले), (८६) परमानन्द, (८७) क्रोधघ्न (अपने भक्तोंके क्रोधका नाश करनेवाले), (८८) तार (उच्च स्वरसे गर्जना करनेवाले), (८९) उच्छ्रित (ऊँचे पदपर स्थित अथवा ऊँची कदवाले), (९०) कुक्कुटी (बालके लिये मोर अथवा पहाड़ी मुर्गी पालनेवाले), (९१) बहुली (बहुत साधनसामग्रीसे सम्पन्न), (९२) दिव्य (स्वर्गीय शोभा धारण करनेवाले), (९३) कामद (मनोरथ पूर्ण करनेवाले), (९४) भूरिवर्द्धन (अधिक वृद्धि प्रदान करनेवाले), (९५) अमोघ (कभी असफल न होनेवाले), (९६) अमृतद (अमृत प्रदान करनेवाले), (९७) अग्नि (अग्निरूप), (९८) शत्रुघ्न (शत्रुनाशक), (९९) सर्वबोधन (सबको ज्ञान देनेवाले), (१००) अनघ (पापरहित), (१०१) अमर (अविनाशी), (१०२) श्रीमान् (शोभासम्पन्न), (१०३) उन्नत (उन्नतिशील), (१०४) अग्निसम्भव (अग्निसे उत्पन्न), (१०५) पिशाचराज (शिवके पिशाच आदि गणोंका आधिपत्य ग्रहण करनेवाले), (१०६) सूर्याभ (सूर्यके समान कान्तिमान्), (१०७) शिवात्मा (शिवस्वरूप) तथा आप ही (१०८) सनातन (नित्य) हैं। (स्क० पु०, मा० कुमा० २३। २२ से ३५)
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १३१
भागी होता है। जो पूर्णिमा और अमावास्याको महीसागरसंगममें श्राद्ध करके स्तम्भेश्वरका पूजन करता है, उसके पितर तृप्त होते हैं। तृप्त होकर उत्तम आशीर्वाद देते हैं तथा वह पुरुष सब पापोंका नाश करके भगवान् रुद्रके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। यह बात स्वयं भगवान् शंकरने कार्तिकेयकी प्रशंसाके लिये पहले कही थी। इस प्रकार स्कन्दद्वारा स्थापित किये हुए चौथे उत्तम लिंगको सब देवताओोंने प्रणाम किया और 'साधु साधु' कहकर उनके इस कार्यकी प्रशंसा की।
इस प्रकार भगवान् शंकरके पुत्र स्कन्दद्वारा पृथ्वीपर स्थापित किये हुए उन शिवलिंगोंका दर्शन करके विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता आपसमें इस प्रकार कहने लगे—'अहो ! ये कुमार धन्य हैं, जिन्होंने परम दुर्लभ महीसागरसंगममें चार शिवलिंग स्थापित किये। हम लोग भी यहाँ आत्मशुद्धिके लिये, भगवान् शंकर और कुमार कार्तिकेयकी प्रसन्नताके लिये, सत्कर्मका अनुष्ठान करनेके लिये तथा अपने परम लाभके लिये शिवलिंगोंकी परम्परा स्थापित करें। ऐसी सलाह करके सबने भगवान् महेश्वरसे आज्ञा प्राप्त की। आज्ञा मिल जानेपर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा बनाये हुए एक उत्तम शिवलिंगको एकान्त स्थानमें स्थापित किया। जिनका प्रयोजन सिद्ध हो चुका था, ऐसे ब्रह्मा आदि देवताओोंने उस लिंगकी स्थापना की थी, इसलिये उसका नाम 'सिद्धेश्वर' रखा गया। फिर सब देवताओोंने मिलकर वहाँ एक उत्तम सरोवर खोदा और उन महात्माओोंने समस्त तीर्थोंके उत्तम जलसे उस जलाशयको भर दिया। इसी समय पातालसे शेषनागके पुत्र कुमुदने आकर शेष आदि सर्पगणोंसे कहा—'तारकासुरके साथ जब युद्ध हो रहा था, उस समय प्रलम्ब नामक दानव कुमारके भयसे भागकर पातालमें जा घुसा था। वह इस समय आपलोगोंके धन, पुत्र, पत्नी, कन्या और गृहोंका विध्वंस कर रहा है।'
यह सुनकर कुमार कार्तिकेयने शक्ति हाथमें ली और 'प्रलम्ब नामक दैत्य मारा जाय' ऐसा संकल्प करके उसे पातालकी ओर छोड़ दिया। स्कन्दके हाथसे छूटी हुई वह शक्ति पृथ्वीको चीरकर बड़े वेगसे पातालमें जा पहुँची और दस करोड़ दैत्योंसे युक्त प्रलम्बको भस्म करके जलकी लहरोंके साथ पुनः लौट आयी। शक्तिने पातालको जाते समय जो बिल बना दिया, उस मार्गसे पातालगंगाका पापहारी जल आकर वहाँ पूर्ण हो गया। स्कन्दने उसका नाम 'सिद्धकूप' रखा। जो मनुष्य उपवासपूर्वक कृष्णपक्षकी अष्टमी और चतुर्दशीको सिद्धकूपमें स्नान करता और अनन्य भावसे भगवान् सिद्धेश्वरका पूजन करता है, उसका अनेक जन्मोंका पाप भाग जाता है। जो सिद्धकुण्डमें श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर भगवान् शंकरकी भक्तिके योग्य हो जाता है।
उस तीर्थमें अक्षयवट भी है, उसके ऊपर सन्तुष्ट हो भगवान् शंकरने यों वरदान दिया—'यह वटवृक्ष प्रयागके अक्षय वटके समान है। जो यहाँ श्राद्ध करता है, उसके पिण्ड देनेसे सब पितरोंको अक्षय दान प्राप्त होता है।'
तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओोंने स्कन्दके साथ जाकर महाशक्ति भगवती सिद्धाम्बिकासे प्रार्थना की—'देवि! तुम यहीं रहकर इस क्षेत्रकी दुष्ट जीवोंसे रक्षा करो। शुभे! अष्टमी और चतुर्दशीको जो लोग तुम्हारी पूजा करते हैं, उनकी सब प्रकारकी आपत्तियोंसे तुम्हें रक्षा करनी चाहिये।' उनके इस प्रकार कहनेपर सिद्धाम्बिकाने 'तथास्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की। तत्पश्चात् सिद्धेश्वर लिंगसे उत्तर भागमें देवताओोंने भगवती सिद्धाम्बाको स्थापित किया। उस तीर्थमें भी देवसमूहने सिद्धेश्वर क्षेत्रकी रक्षाके लिये क्षेत्रपतिके रूपमें चतुःषष्ठि महेश्वरकी स्थापना की। उसके बाद उन्होंने सिद्धिके लिये वहाँ शिवजीके पुत्र गणेशकी
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सिद्धिविनायकके नामसे स्थापना की। जो लोग प्रत्येक कार्यके आरम्भमें सदा उनकी पूजा करते हैं, उन सबको ये प्रबल विघ्नराज सिद्धि प्रदान करते हैं। इस प्रकार उस तीर्थके सिद्धसप्तककी जो लोग सदा पूजा, दर्शन और स्मरण करते हैं, वे सब दोषोंसे मुक्त हो जाते हैं। सिद्धेश्वर, सिद्ध-वट, सिद्धाम्बिका, सिद्धिविनायक, सिद्धेश क्षेत्राधिपति, सिद्धसर तथा सिद्धकूप—ये सात सिद्धसप्तक कहलाते हैं।
सिद्धेशके सम्बन्धमें देवताओंने भी ये गाथा गायी है—'जो मनुष्य सिद्धलिंगका पूजन करेगा, उसके द्वारा हम सब देवता यज्ञ, जप, स्तोत्र और तपस्याद्वारा सन्तुष्ट किये हुएके समान हो जायेंगे।'
यों कहकर वे सब देवता बड़े हर्षको प्राप्त हो स्कन्दके साथ उस क्षेत्रसे चले गये। स्कन्दने मारुतस्कन्ध नामसे प्रसिद्ध सप्तमस्कन्धको प्रस्थान किया। अर्जुन! इस प्रकार मैंने तुमसे महीसागरसंगम तीर्थके पाँच लिंगोंका वृत्तान्त कह सुनाया।
कुन्तीनन्दन! सृष्टिके पहले यहाँ सब कुछ अव्यक्त एवं प्रकाशशून्य था। उस अव्याकृत अवस्थामें प्रकृति और पुरुष—ये दो अजन्मा (जन्मरहित) एक-दूसरेसे मिलकर एक हुए, यह हम सुना करते हैं। तत्पश्चात् अपने स्वरूपभूत स्वभाव और कालकी प्रेरणा होनेपर पुरुषके ईक्षण (सृष्टिविषयक संकल्प) से क्षोभको प्राप्त हुई, प्रकृतिसे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति हुई। फिर महत्तत्त्वमें विकार आनेपर अहङ्कार प्रकट हुआ। मुनियोंने उस अहंकारको सात्त्विक, राजस और तामसभेदसे तीन प्रकारका बतलाया है। तामस अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न हुईं तथा उन तन्मात्राओंसे पाँच महाभूतोंकी उत्पत्ति हुई और रूप-रसादि पाँच विषय पाँच महाभूतोंके कार्य हैं। तैजस अर्थात् राजस अहंकारसे पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं। पूर्वोक्त दस इन्द्रियोंके देवता तथा ग्यारहवीं इन्द्रिय मन सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्न हुए हैं, ऐसा विद्वान् पुरुषोंका मत है। ये ही चौबीस तत्त्व पूर्वकालमें उत्पन्न हुए, फिर परम पुरुष भगवान् सदाशिवकी दृष्टि पड़नेपर ये सभी तत्त्व बुलबुलेके आकारमें परिणत हो गये; उस बुलबुलेसे सुन्दर अण्ड उत्पन्न हुआ, जिसका परिमाण सौ कोटि योजन है। इसीको ब्रह्माण्ड कहते हैं।
ब्रह्माण्डके आत्मा ब्रह्माजी बताये गये हैं, उन्होंने इसके तीन विभाग किये—ऊर्ध्वभाग, मध्यभाग और अधोभाग। ऊर्ध्वभाग स्वर्ग है, उसमें देवता निवास करते हैं। मध्यभाग भूलोक है, इसमें मनुष्य रहते हैं। अधोभागको पाताल कहते हैं, उसमें नाग और दैत्य निवास करते हैं। ये ही ब्रह्माण्डके तीन विभाग किये गये हैं। इनमेंसे एक-एक विभागके पुनः सात-सात भाग ब्रह्माजीने किये हैं। जो सात पाताल, सात द्वीप और सात स्वर्गलोकके रूपमें प्रसिद्ध हैं।
पहले मैं सात द्वीपोंका वर्णन करूँगा। उनकी कल्पना सुनो—पृथ्वीके मध्यमें जम्बूद्वीप है; इसका विस्तार एक लाख योजनका बतलाया जाता है। जम्बूद्वीपकी आकृति सूर्यमण्डलके समान है। वह उतने ही बड़े खारे पानीके समुद्रसे घिरा हुआ है।* जम्बूद्वीप और क्षारसमुद्रके बाद शाकद्वीप है, जिसका विस्तार जम्बूद्वीपसे दुगुना है। वह अपने ही बराबर प्रमाणवाले क्षीरसमुद्रसे, उसके बाद उससे दुगुना बड़ा पुष्करद्वीप है, जो दैत्योंको मदोन्मत्त कर देनेवाले उतने ही बड़े सुरासमुद्रसे घिरा हुआ है। उससे परे कुशद्वीपकी स्थिति मानी
* भागवत आदि अन्य पुराणोंके अनुसार द्वीपोंका क्रम इस प्रकार है—जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर। परंतु स्कन्दपुराणके कुमारिकाखण्डमें क्रमभेद प्राप्त होता है। इसमें यहाँ तो जम्बू, शाक, पुष्कर, कुश, क्रौंच, शाल्मलि तथा गोमेद (प्लक्ष) इस क्रमसे उल्लेख हुआ है, परंतु जहाँ इन द्वीपोंका विशेष वर्णन है, वहाँ पुष्करको सबके अन्तमें तथा प्लक्षद्वीपके बाद रखा है। मूलमें जैसा पाठ है, वैसा ही अर्थमें भी रखा गया है।
* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड *
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गयी है, जो अपनेसे पहले द्वीपकी अपेक्षा दुगुने विस्तारवाला है। कुशद्वीपको उतने ही बड़े विस्तारवाले दहीके समुद्रने घेर रखा है। उसके बाद क्रौंच नामक द्वीप है; जिसका विस्तार कुशद्वीपसे दूना है। वह अपने ही समान विस्तारवाले घीके समुद्रसे घिरा है। इसके बाद इसके दूने विस्तारवाला शाल्मलि द्वीप है; जो उतने ही बड़े ईखके रसके समुद्रसे घिरा है। उसके बाद उससे दुगुने विस्तारवाला गोमेद (प्लक्ष) नामक द्वीप है; जिसे उतने ही बड़े अत्यन्त रमणीय स्वादिष्ट जलके समुद्रने घेर रखा है। अर्जुन! इस प्रकार सात द्वीप और समुद्रोंसहित पृथ्वीका विस्तार दो करोड़, पचास लाख, तिरपन हजार योजन है। शुक्ल और कृष्णपक्षमें समुद्रके जलकी पाँच सौ दस अंगुलकी वृद्धि और क्षय देखे गये हैं। उसके बाद दस करोड़ योजनतक सुवर्णमयी भूमि है; वह देवताओंकी क्रीडास्थली है। उसके बाद कंकणके समान गोल आकारवाला लोकालोकपर्वत है, जिसका विस्तार दस हजार योजन है। उस पर्वतके बाह्य भागमें भयंकर अन्धकार है, जिसकी ओर देखना भी कठिन है। वहाँ कोई जीव-जन्तु नहीं रहते। वह अन्धकारपूर्ण प्रदेश पैंतीस करोड़, उन्नीस लाख, चालीस हजार योजनतक फैला हुआ है। उसके बाद गर्भोदक सागर है, जिसका विस्तार सात समुद्रोंके बराबर है। उसके बाद एक करोड़ योजन विस्तृत कड़ाह है, जो ब्रह्माजीके अण्डकटाहसे ढका हुआ है। ब्रह्माण्डके मध्यमें मेरुपर्वत है, उसकी दसों दिशाओंमें पचास-पचास करोड़ योजनतक ब्रह्माण्डका विस्तार जानना चाहिये। जम्बूद्वीपके मध्यभागमें मेरुपर्वत है, वह नीचेसे ऊपरतक एक लाख योजन ऊँचा है। सोलह हजार योजन तो वह पृथ्वीके नीचेतक गया हुआ है और चौरासी हजार योजन पृथ्वीसे ऊपर उसकी ऊँचाई है। मेरुके शिखरका विस्तार बत्तीस हजार योजन है। उसकी आकृति प्यालेके समान है। वह पर्वत तीन शिखरोंसे युक्त है, उसके मध्यम शिखरपर ब्रह्माजीका निवास है, ईशान कोणमें जो शिखर है, उसपर शंकरजीका स्थान है तथा नैर्ऋत्य कोणवाले शिखरपर भगवान् विष्णुकी स्थिति है। मेरुके सुवर्णमय शिखरपर ब्रह्माजीका, रत्नमय शिखरपर शंकरजीका तथा रजतमय शिखरपर भगवान् विष्णुका अधिकार है।
मेरुपर्वतके चारों ओर चार विष्कम्भ पर्वत माने गये हैं। पूर्वमें मन्दराचल, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें सुपार्श्व तथा उत्तरमें कुमुद नामक पर्वत है। मन्दराचल पर्वतपर कदम्बका विशाल वृक्ष है, जो विशेषरूपसे जाननेयोग्य है। इसी प्रकार गन्धमादन पर्वतपर जम्बू वृक्ष, सुपार्श्व पर्वतपर अश्वत्थ वृक्ष तथा कुमुद पर्वतपर वट वृक्षकी स्थिति मानी गयी है। ये चारों वृक्ष उन-उन पर्वतोंकी ध्वजाके समान हैं। इनका दीर्घ विस्तार ग्यारह-ग्यारह सौ योजन है। इनके चार वन हैं, जो पर्वतके शिखरपर ही स्थित हैं। पूर्वमें नन्दन वन, दक्षिणमें चैत्ररथ वन, पश्चिममें वैभ्राज वन तथा उत्तरमें सर्वतोभद्र नामक वन है। इन्हीं चार वनोंमें चार सरोवर भी हैं। पूर्वमें अरुणोद सरोवर, दक्षिणमें मान सरोवर, पश्चिममें शीतोद सरोवर तथा उत्तरमें महाह्रद नामक सरोवर है। ये विष्कम्भ पर्वत पचीस-पचीस हजार योजन ऊँचे हैं। इनकी चौड़ाई भी हजार-हजार योजन मानी गयी है। इनके सिवा वहाँ और भी बहुत-से केसरपर्वत* हैं। मेरुगिरिके दक्षिण दिशामें निषध, हेमकूट और हिमवान्—ये तीन मर्यादा पर्वत हैं। इनकी लंबाई एक लाख योजन और चौड़ाई दो हजार योजन है। मेरुके उत्तरमें भी तीन मर्यादा पर्वत हैं—नील, श्वेत और शृंगवान्। मेरुसे पूर्व माल्यवान् पर्वत है और मेरुके पश्चिम गन्धमादन पर्वत है। ये सभी पर्वत जम्बूद्वीपमें चारों ओर फैले हुए हैं। गन्धमादन पर्वतपर जो जम्बूका वृक्ष है, उसके
* जैसे कमलकी कर्णिकाके चारों ओर केसर होते हैं, वैसे मेरुके सब ओर दो पर्वत हैं। वे केसरके ही सदृश जान पड़ते हैं। अतः उन्हें केसरपर्वत कहा है।
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फल बड़े-बड़े हाथियोंके समान होते हैं। उस जम्बूके ही नामपर इस द्वीपको जम्बूद्वीप कहा गया है।
पूर्वकालमें स्वायम्भुव नामसे प्रसिद्ध एक मनु हो गये हैं; वे ही आदि मनु और प्रजापति कहे गये हैं। उनके दो पुत्र हुए, प्रियव्रत और उत्तानपाद। राजा उत्तानपादके पुत्र परम धर्मात्मा ध्रुवजी हुए, जिन्होंने भक्ति-भावसे भगवान् विष्णुकी आराधना करके अविनाशी पदको प्राप्त कर लिया। राजर्षि प्रियव्रतके दस पुत्र हुए, जिनमेंसे तीन तो संन्यास ग्रहण करके घरसे निकल गये और परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो गये। शेष सात द्वीपोंमें उन्होंने अपने सात पुत्रोंको प्रतिष्ठित किया। राजा प्रियव्रतके ज्येष्ठ पुत्र आग्नीध्र जम्बूद्वीपके अधिपति हुए। उनके नौ पुत्र जम्बूद्वीपके नौ खण्डोंके स्वामी माने गये हैं। वे नवों खण्ड आज भी उन्हींके नामसे विख्यात हैं। प्रत्येक खण्डका विस्तार एक हजार योजन है। मेरुके चारों ओर और गन्धमादन तथा माल्यवान्के बीचमें सुवर्णमयी भूमिसे सुशोभित भू-भाग है, उसे इलावृत वर्ष कहते हैं। माल्यवान् पर्वतसे लेकर समुद्रपर्यन्त भद्राश्व वर्ष कहलाता है। गन्धमादनसे समुद्रतककी भूमिको केतुमाल वर्ष कहा गया है। शृंगवान् पर्वतसे आरम्भ करके सागरतकके भूखण्डको कुरु वर्ष कहते हैं। शृंगवान् और श्वेत पर्वतके बीचका भाग हिरण्मय वर्ष कहलाता है। नील और श्वेत पर्वतके बीचमें रम्यक् वर्ष है। निषध और हेमकूटके बीच हरिवर्षकी स्थिति है। हिमवान् और हेमकूटके मध्यका भूभाग किंपुरुष वर्ष माना गया है। हिमालयसे लेकर समुद्रतकके भूभागको नाभिखण्ड कहते हैं। नाभि और कुरु ये दोनों वर्ष धनुषकी-सी आकृतिवाले हैं। इनमें क्रमशः हिमवान् और शृंगवान् पर्वत प्रत्यंचाके स्थानपर स्थित बताये गये हैं। नाभिके पुत्र ऋषभ हुए और ऋषभसे 'भरत' का जन्म हुआ; जिनके नामपर इस देशको भारतवर्ष भी कहते हैं। अर्जुन! यहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका उपार्जन होता है। भारतवर्षके सिवा अन्य सब द्वीपों और वर्षोंमें केवल भोग-भूमि है।
शाकद्वीपमें एक हजार योजन विस्तृत शाक वृक्ष है। उसीके नामसे उस वर्षको शाकद्वीप कहा गया है। राजा प्रियव्रतके पुत्र मेधातिथि उस द्वीपके अधिपति हैं। उनके सात पुत्र हुए— पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप तथा विश्वधार— ये उनके पुत्रोंके नाम हैं। इन्हीं नामोंसे प्रसिद्ध वहाँ सात खण्ड हैं। शाकद्वीपमें ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामवाले चार वर्णोंके लोग हैं, जो वायुस्वरूप भगवान्के नामोंका जप करते हैं। जो अपनी प्राण आदि वृत्तियोंके द्वारा सम्पूर्ण भूतोंके भीतर प्रवेश करके उनका पालन-पोषण करते हैं तथा यह जगत् जिनके अधीन है, वे अन्तर्यामी ईश्वर साक्षात् वायुदेव हम सबकी रक्षा करें। कुशद्वीपमें एक हजार योजनतक कुशोंकी झाड़ी है। उसीके चिह्नसे चिह्नित होनेके कारण उसको कुशद्वीप कहते हैं। राजा प्रियव्रतके पुत्र हिरण्यरोमा उस द्वीपके स्वामी हैं; उनके वसु, वसुदान, दृढ़रुचि, नाभिगुप्त, स्तुत्यव्रत, विविक्त और वामदेव— इन सात पुत्रोंके नामसे प्रसिद्ध सात वर्ष कुशद्वीपमें हैं। वहाँके चार वर्णोंका नाम कुशल, कोविद, अभियुक्त और कुलक है। वे भगवान् अग्निदेवकी इस प्रकार स्तुति करते हैं— 'हे अग्निदेव! आप जन्म ग्रहण करनेवाले सम्पूर्ण भूतोंको जानते हैं; इसलिये 'जातवेदा' हैं। साक्षात् परब्रह्म परमात्माके लिये आप हविष्य पहुँचाया करते हैं। सब देवता परम पुरुष भगवान्के ही अंग हैं। अतः उनके यजनद्वारा आप उन परम पुरुषका ही यजन करें।'
क्रौञ्चद्वीपमें क्रौञ्च नामक पर्वत है, जिसका विस्तार दस हजार योजन है। उसी पर्वतको स्वामिकार्तिकेयने विदीर्ण कर डाला था। उसके चिह्नसे चिह्नित होनेके कारण उस द्वीपका नाम क्रौञ्चद्वीप है। वहाँ प्रियव्रतके पुत्र महाराज धृतपृष्ठका अधिकार है। उनके सात पुत्र हुए— आम, मधुरूह,
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मेघपृष्ठ, सुधामा, भ्राजिष्ठ, लोहितार्णव तथा वनस्पति। इन्हींके नामपर उस द्वीपके सात वर्ष हैं। वहाँ पुरुष, ऋषभ, द्रविण और देवक नामवाले चार वर्णोंके लोग रहते हैं और जलस्वरूप भगवान्की स्तुति करते हैं—‘हे जल! तुम परम पुरुष परमात्माके रेतस् हो अथवा परमेश्वर ही तुम्हारी शक्ति हैं; तुम भूः, भुवः, स्वः तीनों लोकोंको पवित्र करते हो। अतः स्वभावसे ही पापनाशक हो। हम अपने शरीरसे तुम्हारा स्पर्श करते हैं, तुम हमें पवित्र कर दो।’
शाल्मलिद्वीपमें सेमलका एक बहुत बड़ा वृक्ष है, जिसपर गरुड़जी निवास करते हैं। उसका विस्तार एक हजार योजन है। वही वहाँका चिह्न है; इसलिये उसे शाल्मलिद्वीप कहते हैं। राजा प्रियव्रतके पुत्र यज्ञबाहु उसके अधिपति हैं। उनके सुरोचन, सौमनस्य, रमणक, देवबर्हि, पारिभद्र, आप्यायन और अविज्ञात नामवाले सात पुत्र हैं, जिनके नामपर वहाँके सात वर्ष प्रसिद्ध हैं। उस द्वीपमें श्रुतधर, वीर्यधर, वसुन्धर और ईषन्धर नामवाले चार वर्णोंके लोग भगवान् सोमका यजन एवं स्तवन करते हैं। ‘जो अपनी किरणोंसे कृष्ण और शुक्ल पक्षमें पितरों और देवताओंको अन्न वितरण करते हैं, वे भगवान् चन्द्रमा हम सब प्रजाओंके राजा हों।’
गोमेद या प्लक्षद्वीपमें गोमेद नामसे प्रसिद्ध एक पाकरिका वृक्ष है, जिसकी सुगन्धित छायासे विशेष सुख मिलनेके कारण लोगोंका मेदा बढ़ जाता है। अतः उससे उपलक्षित द्वीपको गोमेद द्वीप कहते हैं। वहाँ राजा प्रियव्रतके पुत्र इध्मजिह्व राजा हैं। उनके शिव, यवस, सुभद्र, शान्त, क्षेम, अमृत तथा अभय नामवाले सात पुत्र हैं, जिनके नामसे उस द्वीपके सात वर्ष प्रसिद्ध हुए हैं। वहाँ हंस, पतंग, ऊर्ध्वंचन और सत्यांग नामवाले चार वर्णोंके लोग रहते हैं जो भगवान् सूर्यकी आराधना करते हैं। जो पुराण-पुरुष भगवान् विष्णुके स्वरूप हैं, सत्य, ऋत, वेद, अमृत तथा मृत्युके भी आत्मा हैं, उन भगवान् सूर्यकी हम शरण लेते हैं।’
पुष्करद्वीपमें एक हजार योजनतक विस्तृत स्वर्णमय कमल देदीप्यमान होता है, जिसके लाखों स्वर्णमय दल शोभा पाते हैं। वही वहाँका चिह्न है। इसलिये उसे पुष्करद्वीप कहते हैं। राजा प्रियव्रतके पुत्र वीतिहोत्र वहाँके अधिपति हैं। उनके दो ही पुत्र हैं—रमणक और धातकि। इन्हींके नामसे उस द्वीपके दो खण्ड प्रसिद्ध हैं। इन दोनों खण्डोंके मध्य भागमें मानसोत्तर नामक पर्वत है; जिसकी आकृति कंगनके समान है। उसीके ऊपर भगवान् भास्कर भ्रमण करते हैं। वहाँ वर्ण-विभाग नहीं है। सब समान हैं और केवल ब्रह्माजीका चिन्तन करते रहते हैं। वे इस प्रकार प्रार्थना करते हैं—‘जो सुप्रसिद्ध कर्मफलस्वरूप हैं, साक्षात् ब्रह्ममें ही जिनकी स्थिति है, सब लोग जिनका पूजन करते हैं तथा जो एकान्तनिष्ठ, अद्वितीय एवं परम शान्त हैं, उन भगवान् ब्रह्माको नमस्कार है।’ पुष्करद्वीपके निवासियोंमें क्रोध और मात्सर्य नहीं होता। पुण्य और पापकी भी प्रवृत्ति नहीं होती। उनकी आयु दस हजार वर्षसे लेकर बीस हजार वर्षतककी होती है। वे लोग जप करते रहते हैं और देवताओंकी भाँति अपनी पत्नियोंके साथ विहार किया करते हैं। अर्जुन! अब मैं तुम्हें ऊपरके लोकोंकी स्थिति बतलाऊँगा।
नवग्रहोंकी स्थिति, ऊपरके सात लोकोंका वर्णन, वायुके सात स्कन्ध, सात पाताल, इक्कीस नरक, ब्रह्माण्डकटाह एवं काल-मान आदिका निरूपण
नारदजी कहते हैं— कुरुश्रेष्ठ! भूमिसे लाख योजन ऊपर सूर्यमण्डल है। भगवान् सूर्यके रथका विस्तार नौ सहस्र योजन है। उसका ईषादण्ड (हरसा) अठारह हजार योजन बड़ा है। इसकी
१३६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
धुरी डेढ़ करोड़, साढ़े सात लाख योजनकी है। उसीमें सूर्यके रथका पहिया लगा है। उस पहियेमें तीन नाभि, पाँच अरे और छः नेमि बताये गये हैं। सूर्यके रथका जो दूसरा धुरा है, उसका माप साढ़े पैंतालीस हजार योजन है। धुरेका जो प्रमाण है, वही दोनों युगाद्धोंका भी है। उस रथका जो छोटा धुरा और युगार्द्ध है, वह ध्रुवके आधारपर स्थित है और दूसरे बायें धुरेमें जो पहिया लगा है, वह मानसोत्तर पर्वतपर स्थित है। वेदके जो सात छन्द हैं, वे ही सूर्यरथके सात अश्व हैं। उनके नाम सुनो—गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पङ्क्ति—ये छन्द ही सूर्यके घोड़े बताये गये हैं। सदा विद्यमान रहनेवाले सूर्यका न तो कभी अस्त होता और न उदय ही होता है। सूर्यका दिखायी देना ही उदय है और उनका दृष्टिसे ओझल हो जाना ही अस्त है।
इन्द्र, यम, वरुण और कुबेर—इनमेंसे किसी एककी पुरीमें प्रकाशित होते हुए सूर्यदेव शेष तीन पुरियों और दो विकोणों (कोनों)-को प्रकाशित करते हैं और जब किसी कोनकी दिशामें स्थित होते हैं तब वे शेष तीन कोनों और दो पुरियोंको प्रकाशित करते हैं। उत्तरायणके प्रारम्भमें सूर्य मकर राशिमें जाते हैं, उसके पश्चात् वे कुम्भ और मीन राशियोंमें एक राशिसे दूसरी राशिपर होते हुए जाते हैं। इन तीनों राशियोंको भोग लेनेपर सूर्यदेव दिन और रात दोनोंको बराबर करते हुए विषुवत् रेखापर पहुँचते हैं। उसके बादसे प्रतिदिन रात्रि घटने लगती है और दिन बढ़ने लगता है। फिर मेष तथा वृष राशिका अतिक्रमण करके मिथुनके अन्तमें उत्तरायणके अन्तिम सीमापर उपस्थित होते हैं और कर्क राशिपर पहुँचकर दक्षिणायनका आरम्भ करते हैं। जैसे कुम्हारके चाकके सिरे बैठा हुआ जीव बड़ी शीघ्रतासे घूमता है उसी प्रकार सूर्य भी दक्षिणायनको पार करनेमें शीघ्रतासे चलते हैं। वे वायुवेगसे चलते हुए अत्यन्त वेगवान् होनेके कारण बहुत दूरकी भूमि भी थोड़ेमें पार कर लेते हैं। कुलालचक्रके मध्यमें स्थित जीव जिस प्रकार मन्द गतिसे चलता है, उसी प्रकार उत्तरायणमें सूर्य मन्द गतिसे चलते हैं, अतः वे थोड़ी-सी भूमिको भी चिरकालमें पार करते हैं।
सन्ध्याकाल आनेपर मन्देह नामक राक्षस भगवान् सूर्यको खा जानेकी इच्छा करते हैं। उन राक्षसोंको प्रजापतिका यह शाप है कि उनका शरीर तो अक्षय रहेगा, परंतु मृत्यु प्रतिदिन होगी। अतः सन्ध्याकालमें उन राक्षसोंके साथ सूर्यका बड़ा भयानक युद्ध होता है। उस समय द्विजलोग गायत्री मन्त्रसे पवित्र किये जलका जो अर्घ्य देते हैं, उससे वे पापी राक्षस जल जाते हैं। इसलिये सदा सन्ध्योपासना करनी चाहिये। जो सन्ध्योपासना नहीं करते, वे कृतघ्न होनेके कारण रौरव नरकमें पड़ते हैं।
प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न सूर्य, ऋषि, गन्धर्व, राक्षस, अप्सरा, यक्ष तथा सर्प—इन सातोंसे संयुक्त भगवान् सूर्यका रथ गमन करता है। धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, विवस्वान्, इन्द्र, पूषा, सविता, भग, त्वष्टा तथा विष्णु ये बारह आदित्य, चैत्र आदि मासोंमें सूर्यमण्डलमें अधिकारी माने गये हैं।
सूर्यके स्थानसे लाख योजन दूर चन्द्रमाका मण्डल स्थित है, चन्द्रमाका भी रथ तीन पहियोंवाला बताया जाता है, उसमें बायीं और दाहिनी ओर कुन्दके समान श्वेत दस घोड़े जुते होते हैं। चन्द्रमासे पूरे एक लाख योजन ऊपर सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल प्रकाशित होता है। नक्षत्रोंकी संख्या अस्सी समुद्र चौदह अरब और बीस करोड़ बतायी गयी है। नक्षत्रमण्डलसे दो लाख योजन ऊपर बुधका स्थान है। चन्द्रनन्दन बुधका रथ वायु तथा अग्निद्रव्यसे बना हुआ है, उसमें वायुके समान वेगवाले आठ पीले रंगके घोड़े जुते रहते हैं। बुधसे भी दो लाख योजन ऊपर शुक्राचार्यका स्थान माना गया है, उनके रथमें भी आठ घोड़े जोते जाते हैं। शुक्रसे लाख योजन ऊपर मंगल हैं, इनका रथ सुवर्णके समान कान्तिवाले आठ घोड़ोंसे युक्त होता है। मंगलसे दो लाख योजन ऊपर
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १३७
देवपुरोहित बृहस्पतिका स्थान माना जाता है, उनका रथ सुवर्णका बना हुआ है, उसमें श्वेत वर्णके आठ घोड़े जोते जाते हैं। बृहस्पतिसे दो लाख योजन ऊपर शनैश्चरका स्थान है। उनका रथ आकाशसे उत्पन्न हुए आठ चितकबरे घोड़ोंद्वारा जोता जाता है। राहुके रथमें भ्रमरके समान रंगवाले आठ घोड़े हैं, वे एक ही बार जोत दिये गये हैं और सदा उनके धूसर रथको खींचते रहते हैं। उनकी स्थिति सूर्यलोकके नीचे मानी गयी है। शनैश्चरसे एक लाख योजन ऊपर सप्तर्षियोंका मण्डल है और उनसे भी लाख योजन ऊपर ध्रुवकी स्थिति है। ध्रुव समस्त ज्योतिर्मण्डलके मेंह (केन्द्र) हैं। वे भी शिशुमारचक्रके पुच्छके अग्रभागमें स्थित हैं, जिन्हें भगवान् वासुदेवका सर्वोत्तम एवं अविनाशी भक्त कहते हैं। अर्जुन! यह सारा ज्योतिर्मण्डल वायुरूपी डोरसे ध्रुवमें बँधा है। सूर्यमण्डलका विस्तार नौ हजार योजन है, उससे दूना चन्द्रमाका मण्डल बताया गया है। मण्डलाकार राहु इन दोनोंके बराबर होकर पृथ्वीकी निर्मल छाया ग्रहण करके उनके नीचे चलता है। शुक्राचार्यका मण्डल चन्द्रमाके सोलहवें भागके बराबर है। बृहस्पतिमण्डलका विस्तार शुक्राचार्यसे एक चौथाई कम है। इसी प्रकार मंगल, शनैश्चर और बुध—ये बृहस्पतिकी अपेक्षा भी एक चौथाई कम हैं। नक्षत्रमण्डलका परिमाण पाँच सौ, चार सौ, तीन सौ, दो सौ तथा एक सौसे लेकर कम-से-कम एक योजन, आध योजनतकका है, इससे छोटा कोई नक्षत्र नहीं है।
पृथ्वीपर स्थित सभी लोक, जहाँ पैदल जाया जा सकता है, भूलोक कहलाता है। भूमि और सूर्यके मध्यवर्ती लोकको भुवर्लोक कहते हैं। ध्रुव तथा सूर्यलोकके बीच जो चौदह लाख योजनका अवकाश है, उसे लोकस्थितिका विचार करनेवाले विज्ञ पुरुषोंने स्वर्गलोक कहा है। ध्रुवसे ऊपर एक करोड़ योजनतक महर्लोक बताया गया है। उससे ऊपर दो करोड़ योजनतक जनलोक है, जहाँ सनकादि निवास करते हैं। उससे ऊपर चार करोड़ योजनतक तपोलोक माना गया है, जहाँ वैराज नामवाले देवता सन्तापरहित होकर निवास करते हैं। तपोलोकसे ऊपर उसकी अपेक्षा छः गुने विस्तारवाला सत्यलोक विराजमान है, जहाँ ऐसे लोग निवास करते हैं, जिनकी पुनर्मृत्यु नहीं होती (अर्थात् जो वहीं ज्ञान प्राप्त करके ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते हैं। इस संसारमें उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती)। सत्यलोक ही ब्रह्मलोक माना गया है। उसके ऊपर अठारह करोड़ पचीस लाख योजन परम कल्याणमय धाम प्रकाशित होता है; उसकी कहीं उपमा नहीं है, वह सर्वोपरि विराजमान है।
भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक—इन तीनोंको त्रैलोक्य कहते हैं। यह त्रैलोक्य कृतक (अनित्य) लोक है। जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक—ये तीनों अकृतक (नित्य) लोक हैं। कृतक और अकृतक लोकोंके मध्यमें महर्लोककी स्थिति मानी गयी है। कल्पके अन्तमें जब महाप्रलय होता है, उस समय त्रिलोकी सर्वथा नष्ट हो जाती है; महर्लोक जनशून्य तो हो जाता है, परंतु उसका अत्यन्त विनाश नहीं होता। ये पुण्यकर्मोंद्वारा प्राप्त होनेवाले सात लोक बताये गये हैं; वेदादि शास्त्रोंमें कहे हुए यज्ञ, दान, जप, होम, तीर्थ और व्रतसमुदाय तथा अन्यान्य साधनोंसे पूर्वोक्त सातों लोक साध्य माने गये हैं। इन सबसे ऊपर ब्रह्माण्डके शीर्षभागसे शीतल कल्याणमयी जलधाराके रूपमें श्रीगंगाजी उतरती हैं और समस्त लोकोंको आप्लावित करके मेरुपर्वतपर आती हैं। वहाँसे क्रमशः सम्पूर्ण भूतल और पाताललोकमें प्रवेश करती हैं। ब्रह्माण्डके शिखरपर स्थित हुई गंगादेवी सदैव उसके द्वारपर निवास करती हैं। कोटि-कोटि देवियों तथा पिंगल नामक रुद्रसे घिरी हुई महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न श्रीगंगादेवी सदा ब्रह्माण्डकी रक्षा तथा दुष्टगणोंका संहार करती हैं।
अर्जुन! वायुकी सात शाखाएँ हैं, उनकी
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स्थिति जिस प्रकार है, वह बतलाता हूँ सुनो,- पृथ्वीको लाँघकर मेघमण्डलपर्यन्त जो वायु स्थित है, उसका नाम 'प्रवह' है। वह अत्यन्त शक्तिमान् है और वही बादलोंको इधर-उधर उड़ाकर ले जाता है। धूम तथा गर्मीसे उत्पन्न होनेवाले मेघोंको वह प्रवह वायु ही समुद्रजलसे परिपूर्ण करती है, जिससे वे मेघ काली घटाके रूपमें परिणत हो अतिशय वर्षा करनेवाले होते हैं। वायुकी दूसरी शाखाका नाम 'आवह' है, जो सूर्यमण्डलमें बँधा हुआ है। उसीके द्वारा ध्रुवसे आबद्ध होकर सूर्यमण्डल घुमाया जाता है। तीसरी शाखाका नाम 'उद्वह' है, जो चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित है। इसीके द्वारा ध्रुवसे सम्बद्ध होकर यह चन्द्रमण्डल घुमाया जाता है। चौथी शाखाका नाम 'संवह' है, जो नक्षत्रमण्डलमें स्थित है। उसीके द्वारा वायुमयी डोरियोंसे ध्रुवमें आबद्ध होकर सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल घूमता रहता है। पाँचवीं शाखाका नाम 'विवह' है, वह ग्रहमण्डलमें स्थित है। उसीके द्वारा यह ग्रहचक्र ध्रुवसे सम्बद्ध होकर घूमा करता है। वायुकी छठी शाखाका नाम 'परिवह' है, जो सप्तर्षिमण्डलमें स्थित है। इसीके द्वारा ध्रुवसे सम्बद्ध हो सप्तर्षि आकाशमें भ्रमण करते हैं। वायुके सातवें स्कन्धका नाम 'परावह' है, जो ध्रुवमें आबद्ध है। उसीके द्वारा ध्रुवचक्र तथा अन्यान्य मण्डल दृढ़तापूर्वक एक स्थानपर स्थापित हैं। ध्रुवसे ऊपर जो स्थान है, वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होते हैं और न नक्षत्र एवं तारे ही उदित होते हैं। वहाँके लोग अपने ही तेज और अपनी ही शक्तिसे सदा स्थिर रहते हैं। इस प्रकार ऊर्ध्वलोकोंका वर्णन किया गया है। अब पातालका वर्णन सुनो।
अर्जुन! भूमिकी ऊँचाई सत्तर हजार योजन है। इसके भीतर सात पाताल हैं, जो एक-दूसरेसे दस-दस हजार योजनकी दूरीपर हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- अतल, वितल, नितल, रसातल, तलातल, सुतल तथा पाताल। कुरुनन्दन! वहाँकी भूमियाँ सुन्दर महलोंसे सुशोभित हैं। वे क्रमशः कृष्ण, शुक्ल, अरुण, पीत, कंकरीली, पथरीली तथा सुवर्णमयी हैं। उन पातालोंमें दानव, दैत्य और नाग सैकड़ों संघ बनाकर रहते हैं। वहाँपर न गर्मी है, न सर्दी है, न वर्षा है, न कोई कष्ट। सातवें पातालमें 'हाटकेश्वर' शिवलिंग है, जिसकी स्थापना ब्रह्माजीके द्वारा हुई है। वहाँ अनेकानेक नागराज उस शिवलिंगकी आराधना करते हैं। पातालके नीचे बहुत अधिक जल है और उसके नीचे नरकोंकी स्थिति बतायी गयी है, जिनमें पापी जीव गिराये जाते हैं। महामते! उनका वर्णन सुनो-यों तो नरकोंकी संख्या पचपन करोड़ है; किंतु उनमें रौरवसे लेकर श्वभोजनतक इक्कीस प्रधान हैं।* उनके नाम इस प्रकार हैं- रौरव, शूकर, रोध, ताल, विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, विमोहक, रुधिरान्ध, वैतरणी, कृमिश, कृमिभोजन, असिपत्रवन, कृष्ण, भयंकर लालाभक्ष, पापमय पूयवह, वह्निज्वाल, अधःशिरा, संदंश, कालसूत्र, तमोमय-अवीचि, श्वभोजन और प्रतिभाशून्य अपर अवीचि तथा ऐसे ही और भी नरक बड़े भयंकर हैं। झूठी गवाही देनेवाला मनुष्य रौरव नरकमें पड़ता है। गौओं तथा ब्राह्मणोंको कहीं बंद करके रोक रखनेवाला पापी रोध नरकमें जाता है। मदिरा पीनेवाला शूकर नरकमें और नरहत्या करनेवाला ताल नरकमें पड़ता है। गुरु-पत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाला पुरुष तप्तकुम्भ नामक नरकमें गिराया जाता है तथा जो अपने भक्तकी हत्या करता है, उसे तप्तलोह नरकमें तपाया जाता है। गुरुजनोंका अपमान करनेवाला पापी महाज्वाल नरकमें डाला जाता है। वेद-
* यहाँ चौबीस नरकोंके नाम आये हैं। इनमें कालसूत्र, तमोमय-अवीचि और प्रतिभाशून्य अवीचि-ये तीन अप्रधान हैं। शेष इक्कीसको प्रधान समझना चाहिये।
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १३९
शास्त्रोंको नष्ट करनेवाला लवण नामक नरकमें गलाया जाता है। धर्म-मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला विमोहक नरकमें जाता है। देवताओंसे द्वेष रखनेवाला मनुष्य कृमिभक्ष नामक नरकमें पड़ता है। दूषित भावनासे तथा शास्त्रविधिके विपरीत यज्ञ करनेवाला पुरुष कृमिश नरकमें जाता है। जो देवताओं और पितरोंका भाग उन्हें अर्पण किये बिना ही अथवा उन्हें अर्पण करनेसे पहले ही भोजन कर लेता है, वह लालाभक्ष नामक नरकमें यमदूतोंद्वारा गिराया जाता है।
सब जीवोंसे व्यर्थ वैर रखनेवाला तथा छलपूर्वक अस्त्र-शस्त्रोंका निर्माण करनेवाला विशसन नरकमें गिराया जाता है। असत्प्रतिग्रह ग्रहण करनेवाला अधोमुख नरकमें और अकेले ही मिष्टान्न भोजन करनेवाला पूयवह नरकमें पड़ता है। मुर्गा, कुत्ता, बिल्ली तथा पक्षियोंको जीविकाके लिये पालनेवाला मनुष्य भी पूयवह नरकमें ही पड़ता है। जो दूसरोंके घर, खेत, घास और अनाज आदिमें आग लगाता है, वह रुधिरान्ध नरकमें डाला जाता है। नक्षत्रविद्या तथा नट एवं मल्लोंकी वृत्तिसे जीविका चलानेवाला मनुष्य वैतरणी नामक नरकमें जाता है। जो धन और जवानीके मदसे उन्मत्त होकर दूसरोंके धनका अपहरण करता है, वह कृष्ण नामक नरकमें पड़ता है। व्यर्थ ही वृक्षोंको काटनेवाला मनुष्य असिपत्रवनमें जाता है। जो कपटवृत्तिसे जीविका चलाते हैं, वे सब लोग वह्निज्वाल नामक नरकमें गिराये जाते हैं। परायी स्त्री और पराये अन्नका सेवन करनेवाला पुरुष संदंश नरकमें डाला जाता है। जो दिनमें सोते हैं तथा व्रतका लोप किया करते हैं और जो शरीरके मदसे उन्मत्त रहते हैं, वे सब लोग श्वभोजन नामक नरकमें पड़ते हैं। जो भगवान् शिव और विष्णुको नहीं मानते, उन्हें अवीचि नरकमें जाना पड़ता है।
इस प्रकारके शास्त्रनिषिद्ध कर्मोंके आचरणरूप पापोंसे पापी जीव सहस्रों अत्यन्त घोर नरकोंमें अवश्य ही गिरते हैं। अतः जो मनुष्य इन नरकोंसे छुटकारा पाना चाहता हो, उसे वैदिक मार्गका अवलम्बन करके भगवान् विष्णु और शिव दोनोंकी आराधना करनी चाहिये। नरकोंके निम्नभागमें कालाग्निकी स्थिति है, कालाग्निके नीचे मण्डूक और मण्डूकके नीचे अनन्त हैं, जिनके मस्तकके अग्रभागमें यह सम्पूर्ण जगत् सरसोंकी भाँति प्रतीत होता है। इस प्रकार अनन्त प्रभावके कारण वे इस मानव-जगत्में अनन्त कहलाते हैं। पद्म, कुमुद, अंजन और वामन—ये दिग्गज भी वहीं स्थित हैं। इनके निम्नभागमें अण्डकटाह है, जहाँ एकवीरा नामवाली देवी विराजमान हैं। अण्डकटाहका परिमाण चौवालीस करोड़, नवासी लाख, अस्सी हजार है। उसमें कपालीशा देवी रहती हैं, जो कोटि-कोटि देवियोंसे घिरकर हाथमें दण्ड लिये वहाँ पहरा देती हैं। अनन्त नामवाले भगवान् संकर्षणके निःश्वासवायुसे प्रेरित होकर दाहक अग्नि प्रज्वलित हो उठती है। इस प्रकार ये भगवान् अनन्त ही कालाग्निको प्रेरित करते हैं, जिससे वह कल्पान्तके समय सम्पूर्ण जगत्को दग्ध कर डालती है। अर्जुन! इस प्रकार पातालके अधोभागमें स्थानका निर्माण हुआ है। जिन्होंने इस परम आश्चर्यमय ब्रह्माण्डकी स्थापना की है, उन ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेवजीको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ। विष्णुलोक और रुद्रलोक इस ब्रह्माण्डके बाहर बताया जाता है। सदा भगवान् विष्णु और शिवकी उपासना करनेवाले मुक्त पुरुष ही वहाँ जाते हैं। उस दिव्य धामका वर्णन केवल ब्रह्माजी ही कर सकते हैं। हमलोगोंकी वहाँ गति नहीं है। यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सब ओरसे कड़ाहद्वारा ढका हुआ है, ठीक उसी प्रकार जैसे कपित्थका बीज कड़ाहसे (उसके गोलाकार छिलकेसे) आच्छादित रहता है। यह समूचा अण्डकटाह अपनेसे दस गुने प्रमाणवाले जलसे घिरा है। वह जल भी दसगुने विस्तारवाले तेजसे, तेज वायुसे, वायु आकाशसे, आकाश
१४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
अहंकारसे तथा अहंकार महत्तत्त्वसे घिरा हुआ है। तथा उस महत्तत्त्वको भी सर्वप्रधान प्रकृति घेरकर स्थित है। पहले जो छः आवरण कहे गये हैं, उन सबको विद्वान् पुरुष उत्तरोत्तर दसगुना बतलाते हैं और सातवाँ आवरण प्रकृतिका है। उसे अनन्त कहा गया है। उसके भीतर ऐसे-ऐसे करोड़ों और अरबों ब्रह्माण्ड स्थित हैं तथा वे सभी ऐसे ही हैं, जैसा कि यह ब्रह्माण्ड बताया गया है। कुन्तीनन्दन ! जिनका वैभव (ऐश्वर्य) ऐसा है, उन भगवान् सदाशिवको मैं प्रणाम करता हूँ। अहो! जो ऐसे मोहमें फँस जाय कि तारनेवाले भगवान् शिवका भजनतक न कर सके, उससे बढ़कर मूर्ख कौन होगा? वह मूढ़ तो बड़ा पापात्मा है।
अब मैं तुमसे कालका मान बताऊँगा, उसे सुनो—विद्वान् लोग पंद्रह निमेषकी एक ‘काष्ठा’ बताते हैं। तीस काष्ठाकी एक ‘कला’ गिननी चाहिये। तीस कलाका एक ‘मुहूर्त’ होता है। तीस मुहूर्तके एक ‘दिन-रात’ होते हैं। एक दिनमें तीन-तीन मुहूर्तवाले पाँच काल होते हैं, उनका वर्णन सुनो—‘प्रातःकाल’, ‘संगवकाल’, ‘मध्याह्नकाल’, ‘अपराह्नकाल’ तथा पाँचवाँ ‘सायाह्नकाल’। इनमें पंद्रह मुहूर्त व्यतीत होते हैं। पंद्रह दिन-रातका एक ‘पक्ष’ कहलाता है। दो पक्षका एक ‘मास’ कहा गया है। दो सौरमासकी एक ‘ऋतु’ होती है। तीन ऋतुओंका एक ‘अयन’ होता है तथा दो अयनोंका एक वर्ष माना गया है। विज्ञ पुरुष मासके चार १ और वर्षके पाँच भेद बतलाते हैं। पहला संवत्सर, दूसरा परिवत्सर, तीसरा इद्वत्सर, चौथा अनुवत्सर तथा पाँचवाँ युगवत्सर है। २ यही वर्षगणनाकी निश्चित संख्या है। मनुष्योंके एक मासका पितरोंका एक दिन-रात होता है; कृष्णपक्ष उनका दिन बताया गया है और शुक्लपक्ष उनकी रात्रि। मनुष्योंके एक वर्षका देवताओंका एक दिन माना गया है। उत्तरायण तो उनका दिन है और दक्षिणायन रात्रि। देवताओंका एक वर्ष पूरा होनेपर सप्तर्षियोंका एक दिन माना गया है। सप्तर्षियोंके एक वर्षमें ध्रुवका एक दिन होता है। मानववर्षके अनुसार सत्रह लाख अट्ठाईस हजार वर्षोंका सत्ययुग माना गया है। मानवमानसे ही बारह लाख छानबे हजार वर्षोंका त्रेतायुग कहा गया है। आठ लाख चौंसठ हजार वर्षोंका द्वापर
१. सौरमास, चान्द्रमास, नाक्षत्रमास और सावनमास—ये ही मासके चार भेद हैं। सौरमासका आरम्भ सूर्यकी संक्रान्तिसे होता है। सूर्यकी एक संक्रान्तिसे दूसरी संक्रान्तितकका समय सौरमास है। यह मास प्रायः तीस-इकतीस दिनका होता है। कभी-कभी उनतीस और बत्तीस दिनका भी होता है। चन्द्रमाकी कलाकी ह्रास-वृद्धिवाले दो पक्षोंका जो एक मास होता है, वही चान्द्रमास है। यह दो प्रकारका है—शुक्ल प्रतिपदासे आरम्भ होकर अमावास्याको पूर्ण होनेवाला ‘अमान्त’ मास मुख्य चान्द्रमास है। कृष्णप्रतिपदासे पूर्णिमातक पूरा होनेवाला गौण चान्द्रमास है। यह तिथिकी ह्रास-वृद्धिके अनुसार २९, ३०, २८ एवं २७ दिनोंका भी हो जाता है। जितने समयमें चन्द्रमा अश्विनीसे लेकर रेवतीतकके नक्षत्रोंमें विचरण करता है, वह काल नाक्षत्रमास कहलाता है। यह लगभग २७ दिनोंका ही होता है। सावनमास तीस दिनोंका होता है। यह किसी भी तिथिसे प्रारम्भ होकर तीसवें दिन समाप्त होता है। प्रायः व्यापार और व्यवहार आदिमें इसका उपयोग होता है। इसके भी सौर और चान्द्र ये दो भेद हैं। सौर सावनमास सौरमासकी किसी भी तिथिसे प्रारम्भ होकर उसके तीसवें दिन पूर्ण होता है। चान्द्र सावनमास चान्द्रमासकी किसी भी तिथिसे प्रारम्भ होकर उसके तीसवें दिन समाप्त माना जाता है। प्रत्येक संवत्सरमें बारह सौर और बारह चान्द्रमास होते हैं। परंतु सौरवर्ष ३६५ दिनका और चान्द्रवर्ष ३५५ दिनका होता है; जिससे दोनोंमें प्रतिवर्ष दस दिनका अन्तर पड़ता है। इस वैषम्यको दूर करनेके लिये प्रति तीसरे वर्ष बारहकी जगह तेरह चान्द्रमास होते हैं। ऐसे बढ़े हुए मासको अधिमास या मलमास कहते हैं।
२. बृहस्पतिकी गतिके अनुसार प्रभव आदि साठ वर्षोंमें बारह युग होते हैं तथा प्रत्येक युगमें पाँच-पाँच वत्सर होते हैं। बारह युगोंके नाम ये हैं—प्रजापति, धाता, वृष, व्यय, खर, दुर्मुख, प्लव, पराभव, रोधकृत, अनल, दुर्मति और क्षय। प्रत्येक युगके जो पाँच वत्सर हैं, उनमेंसे प्रथमका नाम संवत्सर है। दूसरा परिवत्सर, तीसरा इद्वत्सर, चौथा अनुवत्सर और पाँचवाँ युगवत्सर है। इनके पृथक्-पृथक् देवता होते हैं; जैसे संवत्सरके देवता अग्नि माने गये हैं।
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १४१ ---|---
होता है और चार लाख बत्तीस हजार वर्षोंका कलियुग माना गया है। इन चारोंके योगसे देवताओंका एक युग होता है। ऐसे इकहत्तर युगोंसे कुछ अधिक कालतक मनुकी आयु मानी गयी है। चौदह मनुओंका काल व्यतीत हो जानेपर ब्रह्माका एक दिन पूरा होता है। जो एक हजार चतुर्युगोंका माना गया है; वही कल्प है। अब कल्पोंके नाम श्रवण करो— भवोद्भव, तपोभव्य, ऋतु, वह्नि, वराह, सावित्र, औसिक, गान्धार, कुशिक, ऋषभ, खड्ग, गान्धारीय, मध्यम, वैराज, निषाद, मेघवाहन, पंचम, चित्रक, ज्ञान, आकूति, मीन, दंश, बृंहक, श्वेत, लोहित, रक्त, पीतवासा, शिव, प्रभु तथा सर्वरूप—इन तीस कल्पोंका ब्रह्माजीका एक मास होता है। ऐसे बारह मासोंका एक वर्ष होता है तथा ऐसे ही सौ वर्षोंतक ब्रह्माजीकी आयुका पूर्वार्ध मानना चाहिये। पूर्वार्धके समान ही अपरार्ध भी है। इस प्रकार ब्रह्माजीकी आयुका मान बताया गया। अर्जुन! भगवान् विष्णु तथा भगवान् शंकरजीकी आयुका वर्णन करनेमें मैं सर्वथा असमर्थ हूँ। कहाँ तो मेरी छोटी बुद्धि और कहाँ अनन्त अपार भगवान् विष्णु और शिव (वे तो कालातीत एवं महाकालस्वरूप हैं)। पाताललोकमें भी देवताओंके मानसे ही गणना की जाती है। ये सब बातें अपनी बुद्धिके अनुसार मैंने तुम्हें बतायी हैं।
राजा शतशृंगकी पुत्री कुमारीका चरित्र तथा कुमारीखण्डकी श्रेष्ठता
**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! नाभिके पुत्र जो ऋषभ नामसे प्रसिद्ध हुए हैं, उनके नामपर कलियुगमें नाना प्रकारके पाखण्डपूर्ण मतवादोंकी कल्पना हो जायगी, जो लोगोंको मोहमें डालनेवाली होगी। उन्हीं ऋषभजीके पुत्र भरत हुए और भरतके शतशृंग हुए। शतशृंगके आठ पुत्र और एक कुमारी कन्या हुई। पुत्रोंके नाम इस प्रकार हैं—इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रद्वीप, गभस्तिमान्, नाग, सौम्य, गन्धर्व तथा वरुण। इनके अतिरिक्त जो कन्या थी, उसके मुखकी आकृति बकरीके मुखके समान थी। ऐसा होनेका एक महान् आश्चर्ययुक्त कारण था, जिसे बताता हूँ, सुनो—महीसागरके तटपर जो स्तम्भतीर्थ है, उसके समीपवर्ती दुर्गम प्रदेशमें एक दिन एक बकरी अपने झुंडसे भटककर चली आयी। वहाँ लतापताओंसे एक जाल-सा बन गया था। बकरी प्याससे पीड़ित थी। वह ज्यों ही उधरसे निकली कि लताजालमें फँसकर मृत्युको प्राप्त हो गयी। कुछ समयके पश्चात् उसके शरीरका सिरसे नीचेका भाग टूटकर सब पापोंका निवारण करनेवाले सर्वतीर्थमय महीसागरसंगममें गिर पड़ा। उस दिन शनैश्चर तथा अमावास्याका भी योग था। सिर तो लतागुल्मके उस जालमें फँसकर ज्यों-का-त्यों रह गया था, अतः जलमें गिरने नहीं पाया। शेष शरीर महीसागरके जलमें गिरा था, अतः उस तीर्थके प्रभावसे वह बकरी सिंहलदेशमें राजा शतशृंगकी पुत्री हुई। परंतु उसका मुँह बकरीका ही रह गया था। शेष सभी अंग बड़े सुन्दर थे। राजा शतशृंग पहले सन्तानहीन थे; अतः उनके यहाँ जो पुत्री हुई, वह उन्हें सौ पुत्रोंके समान प्रिय थी, किंतु बकरीके तुल्य उसका मुख देखकर सब राज-परिवारके लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ। राजा अपनी रानियोंसहित बहुत दुःखी हुए। धीरे-धीरे वह कन्या युवावस्थाको
१४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
प्राप्त हुई। एक दिन उसने दर्पणमें अपना मुँह देखा; देखते ही उसे अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आया। तब उसने माता-पिताको अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त बताकर उनसे वहाँ जानेके लिये आज्ञा ली और नावके द्वारा वह स्तम्भतीर्थमें जा पहुँची। वहाँ राजकुमारीने सर्वस्व दक्षिणावाला दान किया। तदनन्तर लता-गुल्मोंकी जालमें ढूँढ़कर उसने अपने पूर्वजन्मके मस्तकका पता लगाया और संगमके समीप उसका दाह करके हड्डियोंको महीसागरमें फेंक दिया। तब उस तीर्थके प्रभावसे उसका मुँह चन्द्रमाके समान कान्तिमान् हो गया। देवता, दानव और मनुष्य सब उसके रूपसे मोहित होकर बार-बार उसे पानेके लिये राजासे याचना करते थे, किंतु वह उनमेंसे किसीको अपना पति बनाना नहीं चाहती थी। तत्पश्चात् कुमारीने प्रसन्नतापूर्वक अत्यन्त दुष्कर एवं कठोर तपस्या प्रारम्भ की।
तपस्या करते-करते जब एक वर्ष पूरा हो गया; तब देवाधिदेव महेश्वरने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'मैं तुझे वर देनेके लिये आया हूँ।' तब राजकुमारी भगवान्का पूजन करके इस प्रकार बोली—'देवेश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो इस तीर्थमें सर्वदा निवास करें।' भगवान् शिवने 'एवमस्तु' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। इससे कुमारीको बड़ा हर्ष हुआ। जहाँ उसने बकरीके सिरका दाह किया था; वहीं 'वक्रेश' नामक शिवकी स्थापना की। यह आश्चर्यजनक समाचार सुनकर स्वस्तिक नामवाला नागराज कुमारीको देखनेके लिये तलातल लोकसे आया। सिरके बलसे आते समय वह पृथ्वीको जहाँ विदीर्ण करके बाहर निकला वहाँ स्वस्तिक नामक कूप हो गया। वह कूप वक्रेश्वरके ईशानकोणमें है; उसे गंगाजीने अपने जलसे भर दिया; इससे वह सब तीर्थोंका फल देनेवाला हो गया। वहाँ शिवलिंगको स्थापित देख भगवान् शिवने प्रसन्न होकर यह वरदान दिया। 'जिनके शवका यहाँ दाह होगा और दाह करके महीसागर-संगममें जिनकी हड्डियाँ डाली जायेंगी, वे दीर्घ कालतक स्वर्गमें निवास करनेके पश्चात् इस लोकमें लौटनेपर सब प्रकारके वैभवसे परिपूर्ण प्रतापी राजा होंगे। जो मनुष्य महीसागरसंगमके जलमें स्नानकर भक्तिभावसे भगवान् वक्रेश्वरका पूजन करता है, उसका मनोरथ सफल होता है। कार्तिक कृष्णा चतुर्दशीको जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस कूपमें स्नान और अपने पितरोंका तर्पण करके वक्रेश्वरका पूजन करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त हो जायगा।'
ऐसा वरदान पाकर वह पुनः सिंहल देशमें लौट आयी और अपने पितासे वहाँका सब वृत्तान्त निवेदन किया। वह सुनकर राजा शतश्रृंग तथा अन्य सब लोग भी बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। सबने उस महातीर्थका गुण-गान किया और उसके प्रति आदरका भाव रखकर वहाँकी यात्रा की। उस तीर्थमें स्नान और नाना प्रकारके दान करके वे सब लोग पुनः सिंहलको लौट आये। तीर्थकी अद्भुत महिमा जानकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई थी। तदनन्तर राजा शतश्रृंगने इस भारतवर्षके नौ विभाग किये; उनमेंसे आठ तो उन्होंने अपने आठ पुत्रोंको दे दिये और नवाँ भाग कुमारीको
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १४३
अर्पित किया। नाना प्रकारके पर्वतोंसे सुशोभित उन भागोंका मैं वर्णन करता हूँ। पुत्रों और कुमारीके नामपर ही वे नवों खण्ड प्रसिद्ध हुए। यथा—इन्द्रद्वीपखण्ड, कसेरुखण्ड, ताम्रद्वीपखण्ड, गभस्तिमत् खण्ड, नागखण्ड, सौम्यखण्ड, गन्धर्वखण्ड, वरुणखण्ड और कुमारिकाखण्ड। अब पर्वतोंके नाम सुनो—महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋच्छ, विन्ध्य और पारियात्र। यही सात यहाँ कुलपर्वत हैं। महेन्द्र पर्वतसे परे जो भूभाग है, उसे इन्द्रद्वीप कहते हैं। पारियात्र पर्वतके पीछेका क्षेत्र कौमारिकखण्ड माना गया है। ये सभी खण्ड एक-एक सहस्र योजनका विस्तार रखते हैं। अब नदियोंके उद्गम स्थानोंका संक्षिप्त परिचय सुनो—वेद, स्मृति आदि नदियाँ पारियात्र पर्वतसे प्रकट हुई मानी गयी हैं। नर्मदा और सुरसा आदि सरिताएँ विन्ध्य पर्वतसे निकली हैं। शतद्रु और चन्द्रभागा (शटलज और चनाव), आदि ऋच्छ पर्वतकी सन्तान हैं। ऋषिकूला और कुमारी आदि नदियाँ शुक्तिमान्की शाखासे प्रकट हुई हैं। तापी, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, महानदी कावेरी, कृष्णवेणी तथा भीमरथी—ये सह्यके समीपवर्ती पर्वतोंसे निकली हुई मानी गयी हैं। कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि सरिताएँ मलय पर्वतसे निकली हैं। त्रिसामा और ऋष्यकुल्या आदि महेन्द्र पर्वतसे प्रकट हुई हैं।
इस प्रकार राजा अपने पुत्रों तथा कुमारीको भारतवर्षके विभिन्न भाग देकर स्वयं उत्तर दिशामें शतशृंग पर्वतपर चले गये और वहाँ घोर तपस्या करके ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए। इधर महाभाग्यशालिनी कुमारी स्तम्भतीर्थमें रहकर कुमारिकाखण्डकी आयसे दान देती हुई तपस्या करने लगी। तदनन्तर कुछ कालके बाद कुमारीके आठों भाइयोंसे नौ-नौ पुत्र उत्पन्न हुए, जो महान् पराक्रम, बल और उत्साहसे सम्पन्न थे। एक दिन वे सब-के-सब वहाँ आकर कुमारीसे बोले—‘शुभे! तुम हमारे कुलकी देवी हो; हमपर कृपा करो। हमलोग बहत्तर भाई हैं और हमारे पास आठ खण्ड हैं; तुम स्वयं ही बटवारा करके हम सब लोगोंको दे दो; जिससे हमलोगोंमें फूट न होने पावे।'
उनके ऐसा कहनेपर सब धर्मोंको जाननेवाली कुमारीने भारतवर्षके नौ खण्डोंके बहत्तर भाग किये। मण्डलप्रदेशमें चार करोड़ ग्रामोंको सम्मिलित किया। ढाई करोड़ ग्रामोंसे युक्त प्रदेश बालाक कहलाता है। खुरासाहणक (खुरासान) देशमें सवा करोड़ ग्राम हैं; अन्धलमें चार लाख और नेपालमें एक लाख ग्राम हैं। कान्यकुब्ज देश छत्तीस लाख ग्रामोंसे युक्त बताया गया है; जनक प्रदेश बहत्तर लाख और गौड़ देशमें अठारह लाख गाँव हैं। कामरूपमें नव लाख; लाहर्व और मालदेशमें नौ-नौ लाख, कान्तिपुरमें नौ लाख, माचिपुरमें नौ लाख तथा जालन्धर और लोहपुर देशमें भी नौ लाख ही ग्राम बताये गये हैं। पाम्बीपुरमें सात लाख, रटराजमें सात लाख, हरिआलमें पाँच लाख, इड् देशमें साढ़े तीन लाख, षाम्भण वाहकमें साढ़े तीन लाख, नीलपुरमें इक्कीस हजार, अम्ल देशमें एक लाख, नरेन्द्र देशमें सवा लाख, तिलंग देशमें भी सवा लाख, मालवमें अठारह लाख बानबे हजार, सयंबर देशमें सवा लाख, मेवाड़ देशमें सवा लाख, बागुरी देशमें अस्सी हजार, गुर्जर देशमें सत्तर हजार, पाण्डु देशमें सत्तर हजार, तेजाकुतिमें बयालीस हजार, काश्मीर मण्डलमें अड़सठ हजार, कौंकण देशमें छत्तीस हजार, लघु कौंकण देशमें चौदह सौ चालीस गाँव, सौराष्ट्रमें पचपन हजार गाँव तथा ताड देशमें इक्कीस हजार गाँव बताये गये हैं। अतिसिन्धुमें दस हजार, अश्वमुखमें भी दस हजार, सजानुहूति देशमें दस हजार, वेणु देशमें दस हजार, कलहज देशमें दस हजार, द्रविड़ देशमें दस हजार, भद्राश्व तथा देवभद्राश्वमें भी दस-दस हजार गाँव माने गये हैं। चिरायुष और यमकोटि देशमें छत्तीस-छत्तीस हजार गाँव हैं। रोमक देशमें अठारह करोड़ गाँव बताये जाते हैं। कामरु, कर्णाटक तथा जांगल इन तीन देशोंमें सवा-सवा लाख गाँव हैं। स्त्री राज्यमें पाँच लाख
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तथा पुलस्ति देशमें दस लाख गाँव हैं। काम्बोज और कौशलमें दस-दस लाख, बाहीकमें चार लाख, लंकामें छत्तीस हजार, वर्धमानमें चौंसठ हजार, सिंहलद्वीपमें दस हजार, पाण्ड्य देशमें छत्तीस हजार, भयानक देशमें एक लाख, मगध देशमें छाछठ हजार, पंगु देशमें साठ हजार, वरेन्द्रक देशमें तीस हजार, मूलस्थानमें पचीस हजार, यवन देशमें चालीस हजार तथा पक्षबाहु देशमें चार हजार गाँव बताये गये हैं। इस प्रकार बहत्तर देशों और उनके ग्रामोंकी संख्याका वर्णन किया गया। भारतवर्षके कुल ग्रामोंकी संख्या छानबे करोड़, बहत्तर लाख, छत्तीस हजार है। इस प्रकार कुमारीने समुद्रतकके नौ खण्डोंका विभाग करके वे सब अपने भतीजोंको दे दिये। यद्यपि भतीजे अपनी बुआका अंश नहीं लेना चाहते थे, तथापि उस देवीने अपना भाग भी उन्हें दे ही दिया। इसलिये इन सब देशोंमें कुमारीखण्ड ही चतुर्वर्गका साधक होनेके कारण सबसे श्रेष्ठ बताया गया है। उसमें भी महीसागरसंगम ही गुप्त क्षेत्र है, जिसे कुमारी जानती थी। अतः उस गुप्त क्षेत्रमें भगवान् कुमारेशका पूजन करती हुई वह महान् व्रतका पालन करने लगी। कुमारी वहाँके छहों कुण्डों तथा संगममें स्नान करती हुई उस तीर्थमें वास करने लगी। तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर जब स्वामि-कार्तिकेयजीका बनवाया हुआ मन्दिर पुराना हो गया तो उसके स्थानमें उसने नूतन सुवर्णमय प्रासाद निर्माण कराया। उसकी भक्तिसे महादेवजी बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्होंने कुमारेश्वर लिंगसे प्रकट होकर उसे प्रत्यक्ष दर्शन देते हुए कहा— 'भद्रे ! मैं तुम्हारी भक्ति और ज्ञानसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने इस जीर्ण मन्दिरका पुनः उद्धार किया है; इसलिये अब मैं तुम्हारे नामसे विख्यात होऊँगा। मन्दिर बनानेवाला तथा उसका जीर्णोद्धार करनेवाला दोनों समान फलके भागी माने गये हैं। इसलिये आजसे लोग मुझे कुमारेश्वर और कुमारीश्वर दोनों नामोंसे पुकारेंगे। वर्कनेश्वरमें जो वरदान तुम्हें दिये गये हैं, वे सदैव संघटित होनेवाले हैं। अब तुम्हारा अन्तकाल समीप आ गया है। जिस स्त्रीने अपने जीवनमें पतिका वरण नहीं किया है अर्थात् जो अविवाहिता रह गयी है उसे स्वर्ग अथवा मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती। इसलिये इस तीर्थमें सिद्धिको प्राप्त हुए महाकालको तुम पतिरूपमें अंगीकार करो।'
भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर कुमारीने महाकालको पतिके रूपमें स्वीकार किया और महाकालके साथ ही वह भी रुद्रलोकमें चली गयी। वहाँ पार्वतीजीने उसे हृदयसे लगा लिया और हर्षमें भरकर कहा— 'शुभे ! तुमने पृथ्वीको चित्रलिखित-सा कर दिया; इसलिये चित्रलेखा नामसे प्रसिद्ध मेरी सखी होकर रहो।' तबसे वह चित्रलेखा नामवाली सखी होकर पार्वतीजीके साथ रहने लगी। उसीने ऊषाको चित्रद्वारा अनिरुद्धका परिचय दिया था। वह योगिनियोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा महाकालकी प्राणवल्लभा हुई। इस प्रकार राजकुमारीने कुमारीश्वरलिंग तथा वर्कनेश्वरलिंगको स्थापित किया। अर्जुन! यहाँ मरे हुए मनुष्योंका दाह करना और उनके हड्डियोंको संगमके जलमें डालना प्रयागसे भी अधिक उत्तम बताया गया है।
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