भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 169

१४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

अहंकारसे तथा अहंकार महत्तत्त्वसे घिरा हुआ है। तथा उस महत्तत्त्वको भी सर्वप्रधान प्रकृति घेरकर स्थित है। पहले जो छः आवरण कहे गये हैं, उन सबको विद्वान् पुरुष उत्तरोत्तर दसगुना बतलाते हैं और सातवाँ आवरण प्रकृतिका है। उसे अनन्त कहा गया है। उसके भीतर ऐसे-ऐसे करोड़ों और अरबों ब्रह्माण्ड स्थित हैं तथा वे सभी ऐसे ही हैं, जैसा कि यह ब्रह्माण्ड बताया गया है। कुन्तीनन्दन ! जिनका वैभव (ऐश्वर्य) ऐसा है, उन भगवान् सदाशिवको मैं प्रणाम करता हूँ। अहो! जो ऐसे मोहमें फँस जाय कि तारनेवाले भगवान् शिवका भजनतक न कर सके, उससे बढ़कर मूर्ख कौन होगा? वह मूढ़ तो बड़ा पापात्मा है।

अब मैं तुमसे कालका मान बताऊँगा, उसे सुनो—विद्वान् लोग पंद्रह निमेषकी एक ‘काष्ठा’ बताते हैं। तीस काष्ठाकी एक ‘कला’ गिननी चाहिये। तीस कलाका एक ‘मुहूर्त’ होता है। तीस मुहूर्तके एक ‘दिन-रात’ होते हैं। एक दिनमें तीन-तीन मुहूर्तवाले पाँच काल होते हैं, उनका वर्णन सुनो—‘प्रातःकाल’, ‘संगवकाल’, ‘मध्याह्नकाल’, ‘अपराह्नकाल’ तथा पाँचवाँ ‘सायाह्नकाल’। इनमें पंद्रह मुहूर्त व्यतीत होते हैं। पंद्रह दिन-रातका एक ‘पक्ष’ कहलाता है। दो पक्षका एक ‘मास’ कहा गया है। दो सौरमासकी एक ‘ऋतु’ होती है। तीन ऋतुओंका एक ‘अयन’ होता है तथा दो अयनोंका एक वर्ष माना गया है। विज्ञ पुरुष मासके चार १ और वर्षके पाँच भेद बतलाते हैं। पहला संवत्सर, दूसरा परिवत्सर, तीसरा इद्वत्सर, चौथा अनुवत्सर तथा पाँचवाँ युगवत्सर है। २ यही वर्षगणनाकी निश्चित संख्या है। मनुष्योंके एक मासका पितरोंका एक दिन-रात होता है; कृष्णपक्ष उनका दिन बताया गया है और शुक्लपक्ष उनकी रात्रि। मनुष्योंके एक वर्षका देवताओंका एक दिन माना गया है। उत्तरायण तो उनका दिन है और दक्षिणायन रात्रि। देवताओंका एक वर्ष पूरा होनेपर सप्तर्षियोंका एक दिन माना गया है। सप्तर्षियोंके एक वर्षमें ध्रुवका एक दिन होता है। मानववर्षके अनुसार सत्रह लाख अट्ठाईस हजार वर्षोंका सत्ययुग माना गया है। मानवमानसे ही बारह लाख छानबे हजार वर्षोंका त्रेतायुग कहा गया है। आठ लाख चौंसठ हजार वर्षोंका द्वापर


१. सौरमास, चान्द्रमास, नाक्षत्रमास और सावनमास—ये ही मासके चार भेद हैं। सौरमासका आरम्भ सूर्यकी संक्रान्तिसे होता है। सूर्यकी एक संक्रान्तिसे दूसरी संक्रान्तितकका समय सौरमास है। यह मास प्रायः तीस-इकतीस दिनका होता है। कभी-कभी उनतीस और बत्तीस दिनका भी होता है। चन्द्रमाकी कलाकी ह्रास-वृद्धिवाले दो पक्षोंका जो एक मास होता है, वही चान्द्रमास है। यह दो प्रकारका है—शुक्ल प्रतिपदासे आरम्भ होकर अमावास्याको पूर्ण होनेवाला ‘अमान्त’ मास मुख्य चान्द्रमास है। कृष्णप्रतिपदासे पूर्णिमातक पूरा होनेवाला गौण चान्द्रमास है। यह तिथिकी ह्रास-वृद्धिके अनुसार २९, ३०, २८ एवं २७ दिनोंका भी हो जाता है। जितने समयमें चन्द्रमा अश्विनीसे लेकर रेवतीतकके नक्षत्रोंमें विचरण करता है, वह काल नाक्षत्रमास कहलाता है। यह लगभग २७ दिनोंका ही होता है। सावनमास तीस दिनोंका होता है। यह किसी भी तिथिसे प्रारम्भ होकर तीसवें दिन समाप्त होता है। प्रायः व्यापार और व्यवहार आदिमें इसका उपयोग होता है। इसके भी सौर और चान्द्र ये दो भेद हैं। सौर सावनमास सौरमासकी किसी भी तिथिसे प्रारम्भ होकर उसके तीसवें दिन पूर्ण होता है। चान्द्र सावनमास चान्द्रमासकी किसी भी तिथिसे प्रारम्भ होकर उसके तीसवें दिन समाप्त माना जाता है। प्रत्येक संवत्सरमें बारह सौर और बारह चान्द्रमास होते हैं। परंतु सौरवर्ष ३६५ दिनका और चान्द्रवर्ष ३५५ दिनका होता है; जिससे दोनोंमें प्रतिवर्ष दस दिनका अन्तर पड़ता है। इस वैषम्यको दूर करनेके लिये प्रति तीसरे वर्ष बारहकी जगह तेरह चान्द्रमास होते हैं। ऐसे बढ़े हुए मासको अधिमास या मलमास कहते हैं।

२. बृहस्पतिकी गतिके अनुसार प्रभव आदि साठ वर्षोंमें बारह युग होते हैं तथा प्रत्येक युगमें पाँच-पाँच वत्सर होते हैं। बारह युगोंके नाम ये हैं—प्रजापति, धाता, वृष, व्यय, खर, दुर्मुख, प्लव, पराभव, रोधकृत, अनल, दुर्मति और क्षय। प्रत्येक युगके जो पाँच वत्सर हैं, उनमेंसे प्रथमका नाम संवत्सर है। दूसरा परिवत्सर, तीसरा इद्वत्सर, चौथा अनुवत्सर और पाँचवाँ युगवत्सर है। इनके पृथक्-पृथक् देवता होते हैं; जैसे संवत्सरके देवता अग्नि माने गये हैं।