संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १४१ ---|---
होता है और चार लाख बत्तीस हजार वर्षोंका कलियुग माना गया है। इन चारोंके योगसे देवताओंका एक युग होता है। ऐसे इकहत्तर युगोंसे कुछ अधिक कालतक मनुकी आयु मानी गयी है। चौदह मनुओंका काल व्यतीत हो जानेपर ब्रह्माका एक दिन पूरा होता है। जो एक हजार चतुर्युगोंका माना गया है; वही कल्प है। अब कल्पोंके नाम श्रवण करो— भवोद्भव, तपोभव्य, ऋतु, वह्नि, वराह, सावित्र, औसिक, गान्धार, कुशिक, ऋषभ, खड्ग, गान्धारीय, मध्यम, वैराज, निषाद, मेघवाहन, पंचम, चित्रक, ज्ञान, आकूति, मीन, दंश, बृंहक, श्वेत, लोहित, रक्त, पीतवासा, शिव, प्रभु तथा सर्वरूप—इन तीस कल्पोंका ब्रह्माजीका एक मास होता है। ऐसे बारह मासोंका एक वर्ष होता है तथा ऐसे ही सौ वर्षोंतक ब्रह्माजीकी आयुका पूर्वार्ध मानना चाहिये। पूर्वार्धके समान ही अपरार्ध भी है। इस प्रकार ब्रह्माजीकी आयुका मान बताया गया। अर्जुन! भगवान् विष्णु तथा भगवान् शंकरजीकी आयुका वर्णन करनेमें मैं सर्वथा असमर्थ हूँ। कहाँ तो मेरी छोटी बुद्धि और कहाँ अनन्त अपार भगवान् विष्णु और शिव (वे तो कालातीत एवं महाकालस्वरूप हैं)। पाताललोकमें भी देवताओंके मानसे ही गणना की जाती है। ये सब बातें अपनी बुद्धिके अनुसार मैंने तुम्हें बतायी हैं।
राजा शतशृंगकी पुत्री कुमारीका चरित्र तथा कुमारीखण्डकी श्रेष्ठता
**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! नाभिके पुत्र जो ऋषभ नामसे प्रसिद्ध हुए हैं, उनके नामपर कलियुगमें नाना प्रकारके पाखण्डपूर्ण मतवादोंकी कल्पना हो जायगी, जो लोगोंको मोहमें डालनेवाली होगी। उन्हीं ऋषभजीके पुत्र भरत हुए और भरतके शतशृंग हुए। शतशृंगके आठ पुत्र और एक कुमारी कन्या हुई। पुत्रोंके नाम इस प्रकार हैं—इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रद्वीप, गभस्तिमान्, नाग, सौम्य, गन्धर्व तथा वरुण। इनके अतिरिक्त जो कन्या थी, उसके मुखकी आकृति बकरीके मुखके समान थी। ऐसा होनेका एक महान् आश्चर्ययुक्त कारण था, जिसे बताता हूँ, सुनो—महीसागरके तटपर जो स्तम्भतीर्थ है, उसके समीपवर्ती दुर्गम प्रदेशमें एक दिन एक बकरी अपने झुंडसे भटककर चली आयी। वहाँ लतापताओंसे एक जाल-सा बन गया था। बकरी प्याससे पीड़ित थी। वह ज्यों ही उधरसे निकली कि लताजालमें फँसकर मृत्युको प्राप्त हो गयी। कुछ समयके पश्चात् उसके शरीरका सिरसे नीचेका भाग टूटकर सब पापोंका निवारण करनेवाले सर्वतीर्थमय महीसागरसंगममें गिर पड़ा। उस दिन शनैश्चर तथा अमावास्याका भी योग था। सिर तो लतागुल्मके उस जालमें फँसकर ज्यों-का-त्यों रह गया था, अतः जलमें गिरने नहीं पाया। शेष शरीर महीसागरके जलमें गिरा था, अतः उस तीर्थके प्रभावसे वह बकरी सिंहलदेशमें राजा शतशृंगकी पुत्री हुई। परंतु उसका मुँह बकरीका ही रह गया था। शेष सभी अंग बड़े सुन्दर थे। राजा शतशृंग पहले सन्तानहीन थे; अतः उनके यहाँ जो पुत्री हुई, वह उन्हें सौ पुत्रोंके समान प्रिय थी, किंतु बकरीके तुल्य उसका मुख देखकर सब राज-परिवारके लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ। राजा अपनी रानियोंसहित बहुत दुःखी हुए। धीरे-धीरे वह कन्या युवावस्थाको