भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 168
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १३९

शास्त्रोंको नष्ट करनेवाला लवण नामक नरकमें गलाया जाता है। धर्म-मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला विमोहक नरकमें जाता है। देवताओंसे द्वेष रखनेवाला मनुष्य कृमिभक्ष नामक नरकमें पड़ता है। दूषित भावनासे तथा शास्त्रविधिके विपरीत यज्ञ करनेवाला पुरुष कृमिश नरकमें जाता है। जो देवताओं और पितरोंका भाग उन्हें अर्पण किये बिना ही अथवा उन्हें अर्पण करनेसे पहले ही भोजन कर लेता है, वह लालाभक्ष नामक नरकमें यमदूतोंद्वारा गिराया जाता है।

सब जीवोंसे व्यर्थ वैर रखनेवाला तथा छलपूर्वक अस्त्र-शस्त्रोंका निर्माण करनेवाला विशसन नरकमें गिराया जाता है। असत्प्रतिग्रह ग्रहण करनेवाला अधोमुख नरकमें और अकेले ही मिष्टान्न भोजन करनेवाला पूयवह नरकमें पड़ता है। मुर्गा, कुत्ता, बिल्ली तथा पक्षियोंको जीविकाके लिये पालनेवाला मनुष्य भी पूयवह नरकमें ही पड़ता है। जो दूसरोंके घर, खेत, घास और अनाज आदिमें आग लगाता है, वह रुधिरान्ध नरकमें डाला जाता है। नक्षत्रविद्या तथा नट एवं मल्लोंकी वृत्तिसे जीविका चलानेवाला मनुष्य वैतरणी नामक नरकमें जाता है। जो धन और जवानीके मदसे उन्मत्त होकर दूसरोंके धनका अपहरण करता है, वह कृष्ण नामक नरकमें पड़ता है। व्यर्थ ही वृक्षोंको काटनेवाला मनुष्य असिपत्रवनमें जाता है। जो कपटवृत्तिसे जीविका चलाते हैं, वे सब लोग वह्निज्वाल नामक नरकमें गिराये जाते हैं। परायी स्त्री और पराये अन्नका सेवन करनेवाला पुरुष संदंश नरकमें डाला जाता है। जो दिनमें सोते हैं तथा व्रतका लोप किया करते हैं और जो शरीरके मदसे उन्मत्त रहते हैं, वे सब लोग श्वभोजन नामक नरकमें पड़ते हैं। जो भगवान् शिव और विष्णुको नहीं मानते, उन्हें अवीचि नरकमें जाना पड़ता है।

इस प्रकारके शास्त्रनिषिद्ध कर्मोंके आचरणरूप पापोंसे पापी जीव सहस्रों अत्यन्त घोर नरकोंमें अवश्य ही गिरते हैं। अतः जो मनुष्य इन नरकोंसे छुटकारा पाना चाहता हो, उसे वैदिक मार्गका अवलम्बन करके भगवान् विष्णु और शिव दोनोंकी आराधना करनी चाहिये। नरकोंके निम्नभागमें कालाग्निकी स्थिति है, कालाग्निके नीचे मण्डूक और मण्डूकके नीचे अनन्त हैं, जिनके मस्तकके अग्रभागमें यह सम्पूर्ण जगत् सरसोंकी भाँति प्रतीत होता है। इस प्रकार अनन्त प्रभावके कारण वे इस मानव-जगत्में अनन्त कहलाते हैं। पद्म, कुमुद, अंजन और वामन—ये दिग्गज भी वहीं स्थित हैं। इनके निम्नभागमें अण्डकटाह है, जहाँ एकवीरा नामवाली देवी विराजमान हैं। अण्डकटाहका परिमाण चौवालीस करोड़, नवासी लाख, अस्सी हजार है। उसमें कपालीशा देवी रहती हैं, जो कोटि-कोटि देवियोंसे घिरकर हाथमें दण्ड लिये वहाँ पहरा देती हैं। अनन्त नामवाले भगवान् संकर्षणके निःश्वासवायुसे प्रेरित होकर दाहक अग्नि प्रज्वलित हो उठती है। इस प्रकार ये भगवान् अनन्त ही कालाग्निको प्रेरित करते हैं, जिससे वह कल्पान्तके समय सम्पूर्ण जगत्को दग्ध कर डालती है। अर्जुन! इस प्रकार पातालके अधोभागमें स्थानका निर्माण हुआ है। जिन्होंने इस परम आश्चर्यमय ब्रह्माण्डकी स्थापना की है, उन ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेवजीको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ। विष्णुलोक और रुद्रलोक इस ब्रह्माण्डके बाहर बताया जाता है। सदा भगवान् विष्णु और शिवकी उपासना करनेवाले मुक्त पुरुष ही वहाँ जाते हैं। उस दिव्य धामका वर्णन केवल ब्रह्माजी ही कर सकते हैं। हमलोगोंकी वहाँ गति नहीं है। यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सब ओरसे कड़ाहद्वारा ढका हुआ है, ठीक उसी प्रकार जैसे कपित्थका बीज कड़ाहसे (उसके गोलाकार छिलकेसे) आच्छादित रहता है। यह समूचा अण्डकटाह अपनेसे दस गुने प्रमाणवाले जलसे घिरा है। वह जल भी दसगुने विस्तारवाले तेजसे, तेज वायुसे, वायु आकाशसे, आकाश