भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 167

१३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

स्थिति जिस प्रकार है, वह बतलाता हूँ सुनो,- पृथ्वीको लाँघकर मेघमण्डलपर्यन्त जो वायु स्थित है, उसका नाम 'प्रवह' है। वह अत्यन्त शक्तिमान् है और वही बादलोंको इधर-उधर उड़ाकर ले जाता है। धूम तथा गर्मीसे उत्पन्न होनेवाले मेघोंको वह प्रवह वायु ही समुद्रजलसे परिपूर्ण करती है, जिससे वे मेघ काली घटाके रूपमें परिणत हो अतिशय वर्षा करनेवाले होते हैं। वायुकी दूसरी शाखाका नाम 'आवह' है, जो सूर्यमण्डलमें बँधा हुआ है। उसीके द्वारा ध्रुवसे आबद्ध होकर सूर्यमण्डल घुमाया जाता है। तीसरी शाखाका नाम 'उद्वह' है, जो चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित है। इसीके द्वारा ध्रुवसे सम्बद्ध होकर यह चन्द्रमण्डल घुमाया जाता है। चौथी शाखाका नाम 'संवह' है, जो नक्षत्रमण्डलमें स्थित है। उसीके द्वारा वायुमयी डोरियोंसे ध्रुवमें आबद्ध होकर सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल घूमता रहता है। पाँचवीं शाखाका नाम 'विवह' है, वह ग्रहमण्डलमें स्थित है। उसीके द्वारा यह ग्रहचक्र ध्रुवसे सम्बद्ध होकर घूमा करता है। वायुकी छठी शाखाका नाम 'परिवह' है, जो सप्तर्षिमण्डलमें स्थित है। इसीके द्वारा ध्रुवसे सम्बद्ध हो सप्तर्षि आकाशमें भ्रमण करते हैं। वायुके सातवें स्कन्धका नाम 'परावह' है, जो ध्रुवमें आबद्ध है। उसीके द्वारा ध्रुवचक्र तथा अन्यान्य मण्डल दृढ़तापूर्वक एक स्थानपर स्थापित हैं। ध्रुवसे ऊपर जो स्थान है, वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होते हैं और न नक्षत्र एवं तारे ही उदित होते हैं। वहाँके लोग अपने ही तेज और अपनी ही शक्तिसे सदा स्थिर रहते हैं। इस प्रकार ऊर्ध्वलोकोंका वर्णन किया गया है। अब पातालका वर्णन सुनो।

अर्जुन! भूमिकी ऊँचाई सत्तर हजार योजन है। इसके भीतर सात पाताल हैं, जो एक-दूसरेसे दस-दस हजार योजनकी दूरीपर हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- अतल, वितल, नितल, रसातल, तलातल, सुतल तथा पाताल। कुरुनन्दन! वहाँकी भूमियाँ सुन्दर महलोंसे सुशोभित हैं। वे क्रमशः कृष्ण, शुक्ल, अरुण, पीत, कंकरीली, पथरीली तथा सुवर्णमयी हैं। उन पातालोंमें दानव, दैत्य और नाग सैकड़ों संघ बनाकर रहते हैं। वहाँपर न गर्मी है, न सर्दी है, न वर्षा है, न कोई कष्ट। सातवें पातालमें 'हाटकेश्वर' शिवलिंग है, जिसकी स्थापना ब्रह्माजीके द्वारा हुई है। वहाँ अनेकानेक नागराज उस शिवलिंगकी आराधना करते हैं। पातालके नीचे बहुत अधिक जल है और उसके नीचे नरकोंकी स्थिति बतायी गयी है, जिनमें पापी जीव गिराये जाते हैं। महामते! उनका वर्णन सुनो-यों तो नरकोंकी संख्या पचपन करोड़ है; किंतु उनमें रौरवसे लेकर श्वभोजनतक इक्कीस प्रधान हैं।* उनके नाम इस प्रकार हैं- रौरव, शूकर, रोध, ताल, विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, विमोहक, रुधिरान्ध, वैतरणी, कृमिश, कृमिभोजन, असिपत्रवन, कृष्ण, भयंकर लालाभक्ष, पापमय पूयवह, वह्निज्वाल, अधःशिरा, संदंश, कालसूत्र, तमोमय-अवीचि, श्वभोजन और प्रतिभाशून्य अपर अवीचि तथा ऐसे ही और भी नरक बड़े भयंकर हैं। झूठी गवाही देनेवाला मनुष्य रौरव नरकमें पड़ता है। गौओं तथा ब्राह्मणोंको कहीं बंद करके रोक रखनेवाला पापी रोध नरकमें जाता है। मदिरा पीनेवाला शूकर नरकमें और नरहत्या करनेवाला ताल नरकमें पड़ता है। गुरु-पत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाला पुरुष तप्तकुम्भ नामक नरकमें गिराया जाता है तथा जो अपने भक्तकी हत्या करता है, उसे तप्तलोह नरकमें तपाया जाता है। गुरुजनोंका अपमान करनेवाला पापी महाज्वाल नरकमें डाला जाता है। वेद-


* यहाँ चौबीस नरकोंके नाम आये हैं। इनमें कालसूत्र, तमोमय-अवीचि और प्रतिभाशून्य अवीचि-ये तीन अप्रधान हैं। शेष इक्कीसको प्रधान समझना चाहिये।