संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १३७
देवपुरोहित बृहस्पतिका स्थान माना जाता है, उनका रथ सुवर्णका बना हुआ है, उसमें श्वेत वर्णके आठ घोड़े जोते जाते हैं। बृहस्पतिसे दो लाख योजन ऊपर शनैश्चरका स्थान है। उनका रथ आकाशसे उत्पन्न हुए आठ चितकबरे घोड़ोंद्वारा जोता जाता है। राहुके रथमें भ्रमरके समान रंगवाले आठ घोड़े हैं, वे एक ही बार जोत दिये गये हैं और सदा उनके धूसर रथको खींचते रहते हैं। उनकी स्थिति सूर्यलोकके नीचे मानी गयी है। शनैश्चरसे एक लाख योजन ऊपर सप्तर्षियोंका मण्डल है और उनसे भी लाख योजन ऊपर ध्रुवकी स्थिति है। ध्रुव समस्त ज्योतिर्मण्डलके मेंह (केन्द्र) हैं। वे भी शिशुमारचक्रके पुच्छके अग्रभागमें स्थित हैं, जिन्हें भगवान् वासुदेवका सर्वोत्तम एवं अविनाशी भक्त कहते हैं। अर्जुन! यह सारा ज्योतिर्मण्डल वायुरूपी डोरसे ध्रुवमें बँधा है। सूर्यमण्डलका विस्तार नौ हजार योजन है, उससे दूना चन्द्रमाका मण्डल बताया गया है। मण्डलाकार राहु इन दोनोंके बराबर होकर पृथ्वीकी निर्मल छाया ग्रहण करके उनके नीचे चलता है। शुक्राचार्यका मण्डल चन्द्रमाके सोलहवें भागके बराबर है। बृहस्पतिमण्डलका विस्तार शुक्राचार्यसे एक चौथाई कम है। इसी प्रकार मंगल, शनैश्चर और बुध—ये बृहस्पतिकी अपेक्षा भी एक चौथाई कम हैं। नक्षत्रमण्डलका परिमाण पाँच सौ, चार सौ, तीन सौ, दो सौ तथा एक सौसे लेकर कम-से-कम एक योजन, आध योजनतकका है, इससे छोटा कोई नक्षत्र नहीं है।
पृथ्वीपर स्थित सभी लोक, जहाँ पैदल जाया जा सकता है, भूलोक कहलाता है। भूमि और सूर्यके मध्यवर्ती लोकको भुवर्लोक कहते हैं। ध्रुव तथा सूर्यलोकके बीच जो चौदह लाख योजनका अवकाश है, उसे लोकस्थितिका विचार करनेवाले विज्ञ पुरुषोंने स्वर्गलोक कहा है। ध्रुवसे ऊपर एक करोड़ योजनतक महर्लोक बताया गया है। उससे ऊपर दो करोड़ योजनतक जनलोक है, जहाँ सनकादि निवास करते हैं। उससे ऊपर चार करोड़ योजनतक तपोलोक माना गया है, जहाँ वैराज नामवाले देवता सन्तापरहित होकर निवास करते हैं। तपोलोकसे ऊपर उसकी अपेक्षा छः गुने विस्तारवाला सत्यलोक विराजमान है, जहाँ ऐसे लोग निवास करते हैं, जिनकी पुनर्मृत्यु नहीं होती (अर्थात् जो वहीं ज्ञान प्राप्त करके ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते हैं। इस संसारमें उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती)। सत्यलोक ही ब्रह्मलोक माना गया है। उसके ऊपर अठारह करोड़ पचीस लाख योजन परम कल्याणमय धाम प्रकाशित होता है; उसकी कहीं उपमा नहीं है, वह सर्वोपरि विराजमान है।
भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक—इन तीनोंको त्रैलोक्य कहते हैं। यह त्रैलोक्य कृतक (अनित्य) लोक है। जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक—ये तीनों अकृतक (नित्य) लोक हैं। कृतक और अकृतक लोकोंके मध्यमें महर्लोककी स्थिति मानी गयी है। कल्पके अन्तमें जब महाप्रलय होता है, उस समय त्रिलोकी सर्वथा नष्ट हो जाती है; महर्लोक जनशून्य तो हो जाता है, परंतु उसका अत्यन्त विनाश नहीं होता। ये पुण्यकर्मोंद्वारा प्राप्त होनेवाले सात लोक बताये गये हैं; वेदादि शास्त्रोंमें कहे हुए यज्ञ, दान, जप, होम, तीर्थ और व्रतसमुदाय तथा अन्यान्य साधनोंसे पूर्वोक्त सातों लोक साध्य माने गये हैं। इन सबसे ऊपर ब्रह्माण्डके शीर्षभागसे शीतल कल्याणमयी जलधाराके रूपमें श्रीगंगाजी उतरती हैं और समस्त लोकोंको आप्लावित करके मेरुपर्वतपर आती हैं। वहाँसे क्रमशः सम्पूर्ण भूतल और पाताललोकमें प्रवेश करती हैं। ब्रह्माण्डके शिखरपर स्थित हुई गंगादेवी सदैव उसके द्वारपर निवास करती हैं। कोटि-कोटि देवियों तथा पिंगल नामक रुद्रसे घिरी हुई महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न श्रीगंगादेवी सदा ब्रह्माण्डकी रक्षा तथा दुष्टगणोंका संहार करती हैं।
अर्जुन! वायुकी सात शाखाएँ हैं, उनकी