भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१३६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

धुरी डेढ़ करोड़, साढ़े सात लाख योजनकी है। उसीमें सूर्यके रथका पहिया लगा है। उस पहियेमें तीन नाभि, पाँच अरे और छः नेमि बताये गये हैं। सूर्यके रथका जो दूसरा धुरा है, उसका माप साढ़े पैंतालीस हजार योजन है। धुरेका जो प्रमाण है, वही दोनों युगाद्धोंका भी है। उस रथका जो छोटा धुरा और युगार्द्ध है, वह ध्रुवके आधारपर स्थित है और दूसरे बायें धुरेमें जो पहिया लगा है, वह मानसोत्तर पर्वतपर स्थित है। वेदके जो सात छन्द हैं, वे ही सूर्यरथके सात अश्व हैं। उनके नाम सुनो—गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पङ्क्ति—ये छन्द ही सूर्यके घोड़े बताये गये हैं। सदा विद्यमान रहनेवाले सूर्यका न तो कभी अस्त होता और न उदय ही होता है। सूर्यका दिखायी देना ही उदय है और उनका दृष्टिसे ओझल हो जाना ही अस्त है।

इन्द्र, यम, वरुण और कुबेर—इनमेंसे किसी एककी पुरीमें प्रकाशित होते हुए सूर्यदेव शेष तीन पुरियों और दो विकोणों (कोनों)-को प्रकाशित करते हैं और जब किसी कोनकी दिशामें स्थित होते हैं तब वे शेष तीन कोनों और दो पुरियोंको प्रकाशित करते हैं। उत्तरायणके प्रारम्भमें सूर्य मकर राशिमें जाते हैं, उसके पश्चात् वे कुम्भ और मीन राशियोंमें एक राशिसे दूसरी राशिपर होते हुए जाते हैं। इन तीनों राशियोंको भोग लेनेपर सूर्यदेव दिन और रात दोनोंको बराबर करते हुए विषुवत् रेखापर पहुँचते हैं। उसके बादसे प्रतिदिन रात्रि घटने लगती है और दिन बढ़ने लगता है। फिर मेष तथा वृष राशिका अतिक्रमण करके मिथुनके अन्तमें उत्तरायणके अन्तिम सीमापर उपस्थित होते हैं और कर्क राशिपर पहुँचकर दक्षिणायनका आरम्भ करते हैं। जैसे कुम्हारके चाकके सिरे बैठा हुआ जीव बड़ी शीघ्रतासे घूमता है उसी प्रकार सूर्य भी दक्षिणायनको पार करनेमें शीघ्रतासे चलते हैं। वे वायुवेगसे चलते हुए अत्यन्त वेगवान् होनेके कारण बहुत दूरकी भूमि भी थोड़ेमें पार कर लेते हैं। कुलालचक्रके मध्यमें स्थित जीव जिस प्रकार मन्द गतिसे चलता है, उसी प्रकार उत्तरायणमें सूर्य मन्द गतिसे चलते हैं, अतः वे थोड़ी-सी भूमिको भी चिरकालमें पार करते हैं।

सन्ध्याकाल आनेपर मन्देह नामक राक्षस भगवान् सूर्यको खा जानेकी इच्छा करते हैं। उन राक्षसोंको प्रजापतिका यह शाप है कि उनका शरीर तो अक्षय रहेगा, परंतु मृत्यु प्रतिदिन होगी। अतः सन्ध्याकालमें उन राक्षसोंके साथ सूर्यका बड़ा भयानक युद्ध होता है। उस समय द्विजलोग गायत्री मन्त्रसे पवित्र किये जलका जो अर्घ्य देते हैं, उससे वे पापी राक्षस जल जाते हैं। इसलिये सदा सन्ध्योपासना करनी चाहिये। जो सन्ध्योपासना नहीं करते, वे कृतघ्न होनेके कारण रौरव नरकमें पड़ते हैं।

प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न सूर्य, ऋषि, गन्धर्व, राक्षस, अप्सरा, यक्ष तथा सर्प—इन सातोंसे संयुक्त भगवान् सूर्यका रथ गमन करता है। धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, विवस्वान्, इन्द्र, पूषा, सविता, भग, त्वष्टा तथा विष्णु ये बारह आदित्य, चैत्र आदि मासोंमें सूर्यमण्डलमें अधिकारी माने गये हैं।

सूर्यके स्थानसे लाख योजन दूर चन्द्रमाका मण्डल स्थित है, चन्द्रमाका भी रथ तीन पहियोंवाला बताया जाता है, उसमें बायीं और दाहिनी ओर कुन्दके समान श्वेत दस घोड़े जुते होते हैं। चन्द्रमासे पूरे एक लाख योजन ऊपर सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल प्रकाशित होता है। नक्षत्रोंकी संख्या अस्सी समुद्र चौदह अरब और बीस करोड़ बतायी गयी है। नक्षत्रमण्डलसे दो लाख योजन ऊपर बुधका स्थान है। चन्द्रनन्दन बुधका रथ वायु तथा अग्निद्रव्यसे बना हुआ है, उसमें वायुके समान वेगवाले आठ पीले रंगके घोड़े जुते रहते हैं। बुधसे भी दो लाख योजन ऊपर शुक्राचार्यका स्थान माना गया है, उनके रथमें भी आठ घोड़े जोते जाते हैं। शुक्रसे लाख योजन ऊपर मंगल हैं, इनका रथ सुवर्णके समान कान्तिवाले आठ घोड़ोंसे युक्त होता है। मंगलसे दो लाख योजन ऊपर