संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १३१
भागी होता है। जो पूर्णिमा और अमावास्याको महीसागरसंगममें श्राद्ध करके स्तम्भेश्वरका पूजन करता है, उसके पितर तृप्त होते हैं। तृप्त होकर उत्तम आशीर्वाद देते हैं तथा वह पुरुष सब पापोंका नाश करके भगवान् रुद्रके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। यह बात स्वयं भगवान् शंकरने कार्तिकेयकी प्रशंसाके लिये पहले कही थी। इस प्रकार स्कन्दद्वारा स्थापित किये हुए चौथे उत्तम लिंगको सब देवताओोंने प्रणाम किया और 'साधु साधु' कहकर उनके इस कार्यकी प्रशंसा की।
इस प्रकार भगवान् शंकरके पुत्र स्कन्दद्वारा पृथ्वीपर स्थापित किये हुए उन शिवलिंगोंका दर्शन करके विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता आपसमें इस प्रकार कहने लगे—'अहो ! ये कुमार धन्य हैं, जिन्होंने परम दुर्लभ महीसागरसंगममें चार शिवलिंग स्थापित किये। हम लोग भी यहाँ आत्मशुद्धिके लिये, भगवान् शंकर और कुमार कार्तिकेयकी प्रसन्नताके लिये, सत्कर्मका अनुष्ठान करनेके लिये तथा अपने परम लाभके लिये शिवलिंगोंकी परम्परा स्थापित करें। ऐसी सलाह करके सबने भगवान् महेश्वरसे आज्ञा प्राप्त की। आज्ञा मिल जानेपर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा बनाये हुए एक उत्तम शिवलिंगको एकान्त स्थानमें स्थापित किया। जिनका प्रयोजन सिद्ध हो चुका था, ऐसे ब्रह्मा आदि देवताओोंने उस लिंगकी स्थापना की थी, इसलिये उसका नाम 'सिद्धेश्वर' रखा गया। फिर सब देवताओोंने मिलकर वहाँ एक उत्तम सरोवर खोदा और उन महात्माओोंने समस्त तीर्थोंके उत्तम जलसे उस जलाशयको भर दिया। इसी समय पातालसे शेषनागके पुत्र कुमुदने आकर शेष आदि सर्पगणोंसे कहा—'तारकासुरके साथ जब युद्ध हो रहा था, उस समय प्रलम्ब नामक दानव कुमारके भयसे भागकर पातालमें जा घुसा था। वह इस समय आपलोगोंके धन, पुत्र, पत्नी, कन्या और गृहोंका विध्वंस कर रहा है।'
यह सुनकर कुमार कार्तिकेयने शक्ति हाथमें ली और 'प्रलम्ब नामक दैत्य मारा जाय' ऐसा संकल्प करके उसे पातालकी ओर छोड़ दिया। स्कन्दके हाथसे छूटी हुई वह शक्ति पृथ्वीको चीरकर बड़े वेगसे पातालमें जा पहुँची और दस करोड़ दैत्योंसे युक्त प्रलम्बको भस्म करके जलकी लहरोंके साथ पुनः लौट आयी। शक्तिने पातालको जाते समय जो बिल बना दिया, उस मार्गसे पातालगंगाका पापहारी जल आकर वहाँ पूर्ण हो गया। स्कन्दने उसका नाम 'सिद्धकूप' रखा। जो मनुष्य उपवासपूर्वक कृष्णपक्षकी अष्टमी और चतुर्दशीको सिद्धकूपमें स्नान करता और अनन्य भावसे भगवान् सिद्धेश्वरका पूजन करता है, उसका अनेक जन्मोंका पाप भाग जाता है। जो सिद्धकुण्डमें श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर भगवान् शंकरकी भक्तिके योग्य हो जाता है।
उस तीर्थमें अक्षयवट भी है, उसके ऊपर सन्तुष्ट हो भगवान् शंकरने यों वरदान दिया—'यह वटवृक्ष प्रयागके अक्षय वटके समान है। जो यहाँ श्राद्ध करता है, उसके पिण्ड देनेसे सब पितरोंको अक्षय दान प्राप्त होता है।'
तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओोंने स्कन्दके साथ जाकर महाशक्ति भगवती सिद्धाम्बिकासे प्रार्थना की—'देवि! तुम यहीं रहकर इस क्षेत्रकी दुष्ट जीवोंसे रक्षा करो। शुभे! अष्टमी और चतुर्दशीको जो लोग तुम्हारी पूजा करते हैं, उनकी सब प्रकारकी आपत्तियोंसे तुम्हें रक्षा करनी चाहिये।' उनके इस प्रकार कहनेपर सिद्धाम्बिकाने 'तथास्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की। तत्पश्चात् सिद्धेश्वर लिंगसे उत्तर भागमें देवताओोंने भगवती सिद्धाम्बाको स्थापित किया। उस तीर्थमें भी देवसमूहने सिद्धेश्वर क्षेत्रकी रक्षाके लिये क्षेत्रपतिके रूपमें चतुःषष्ठि महेश्वरकी स्थापना की। उसके बाद उन्होंने सिद्धिके लिये वहाँ शिवजीके पुत्र गणेशकी