भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 161

१३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सिद्धिविनायकके नामसे स्थापना की। जो लोग प्रत्येक कार्यके आरम्भमें सदा उनकी पूजा करते हैं, उन सबको ये प्रबल विघ्नराज सिद्धि प्रदान करते हैं। इस प्रकार उस तीर्थके सिद्धसप्तककी जो लोग सदा पूजा, दर्शन और स्मरण करते हैं, वे सब दोषोंसे मुक्त हो जाते हैं। सिद्धेश्वर, सिद्ध-वट, सिद्धाम्बिका, सिद्धिविनायक, सिद्धेश क्षेत्राधिपति, सिद्धसर तथा सिद्धकूप—ये सात सिद्धसप्तक कहलाते हैं।

सिद्धेशके सम्बन्धमें देवताओंने भी ये गाथा गायी है—'जो मनुष्य सिद्धलिंगका पूजन करेगा, उसके द्वारा हम सब देवता यज्ञ, जप, स्तोत्र और तपस्याद्वारा सन्तुष्ट किये हुएके समान हो जायेंगे।'

यों कहकर वे सब देवता बड़े हर्षको प्राप्त हो स्कन्दके साथ उस क्षेत्रसे चले गये। स्कन्दने मारुतस्कन्ध नामसे प्रसिद्ध सप्तमस्कन्धको प्रस्थान किया। अर्जुन! इस प्रकार मैंने तुमसे महीसागरसंगम तीर्थके पाँच लिंगोंका वृत्तान्त कह सुनाया।

कुन्तीनन्दन! सृष्टिके पहले यहाँ सब कुछ अव्यक्त एवं प्रकाशशून्य था। उस अव्याकृत अवस्थामें प्रकृति और पुरुष—ये दो अजन्मा (जन्मरहित) एक-दूसरेसे मिलकर एक हुए, यह हम सुना करते हैं। तत्पश्चात् अपने स्वरूपभूत स्वभाव और कालकी प्रेरणा होनेपर पुरुषके ईक्षण (सृष्टिविषयक संकल्प) से क्षोभको प्राप्त हुई, प्रकृतिसे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति हुई। फिर महत्तत्त्वमें विकार आनेपर अहङ्कार प्रकट हुआ। मुनियोंने उस अहंकारको सात्त्विक, राजस और तामसभेदसे तीन प्रकारका बतलाया है। तामस अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न हुईं तथा उन तन्मात्राओंसे पाँच महाभूतोंकी उत्पत्ति हुई और रूप-रसादि पाँच विषय पाँच महाभूतोंके कार्य हैं। तैजस अर्थात् राजस अहंकारसे पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं। पूर्वोक्त दस इन्द्रियोंके देवता तथा ग्यारहवीं इन्द्रिय मन सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्न हुए हैं, ऐसा विद्वान् पुरुषोंका मत है। ये ही चौबीस तत्त्व पूर्वकालमें उत्पन्न हुए, फिर परम पुरुष भगवान् सदाशिवकी दृष्टि पड़नेपर ये सभी तत्त्व बुलबुलेके आकारमें परिणत हो गये; उस बुलबुलेसे सुन्दर अण्ड उत्पन्न हुआ, जिसका परिमाण सौ कोटि योजन है। इसीको ब्रह्माण्ड कहते हैं।

ब्रह्माण्डके आत्मा ब्रह्माजी बताये गये हैं, उन्होंने इसके तीन विभाग किये—ऊर्ध्वभाग, मध्यभाग और अधोभाग। ऊर्ध्वभाग स्वर्ग है, उसमें देवता निवास करते हैं। मध्यभाग भूलोक है, इसमें मनुष्य रहते हैं। अधोभागको पाताल कहते हैं, उसमें नाग और दैत्य निवास करते हैं। ये ही ब्रह्माण्डके तीन विभाग किये गये हैं। इनमेंसे एक-एक विभागके पुनः सात-सात भाग ब्रह्माजीने किये हैं। जो सात पाताल, सात द्वीप और सात स्वर्गलोकके रूपमें प्रसिद्ध हैं।

पहले मैं सात द्वीपोंका वर्णन करूँगा। उनकी कल्पना सुनो—पृथ्वीके मध्यमें जम्बूद्वीप है; इसका विस्तार एक लाख योजनका बतलाया जाता है। जम्बूद्वीपकी आकृति सूर्यमण्डलके समान है। वह उतने ही बड़े खारे पानीके समुद्रसे घिरा हुआ है।* जम्बूद्वीप और क्षारसमुद्रके बाद शाकद्वीप है, जिसका विस्तार जम्बूद्वीपसे दुगुना है। वह अपने ही बराबर प्रमाणवाले क्षीरसमुद्रसे, उसके बाद उससे दुगुना बड़ा पुष्करद्वीप है, जो दैत्योंको मदोन्मत्त कर देनेवाले उतने ही बड़े सुरासमुद्रसे घिरा हुआ है। उससे परे कुशद्वीपकी स्थिति मानी


* भागवत आदि अन्य पुराणोंके अनुसार द्वीपोंका क्रम इस प्रकार है—जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर। परंतु स्कन्दपुराणके कुमारिकाखण्डमें क्रमभेद प्राप्त होता है। इसमें यहाँ तो जम्बू, शाक, पुष्कर, कुश, क्रौंच, शाल्मलि तथा गोमेद (प्लक्ष) इस क्रमसे उल्लेख हुआ है, परंतु जहाँ इन द्वीपोंका विशेष वर्णन है, वहाँ पुष्करको सबके अन्तमें तथा प्लक्षद्वीपके बाद रखा है। मूलमें जैसा पाठ है, वैसा ही अर्थमें भी रखा गया है।