संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 174, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १४५
कालभीतिकी तपस्या तथा धर्मनिष्ठा, महाकालका प्रादुर्भाव और कालभीतिपर भगवान् शंकरकी कृपा
नारदजी कहते हैं—पूर्वकालकी बात है, काशीपुरीमें माण्टि नामसे प्रसिद्ध एक महायशस्वी ब्राह्मण हो गये हैं। वे जप करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ थे। महाभाग माण्टि रुद्रके मन्त्रोंका जप किया करते थे। उनके कोई पुत्र नहीं था। अतः पुत्रके लिये रुद्रमन्त्रोंका जप करते-करते उनके सौ वर्ष पूरे हो गये, इससे भगवान् शंकर बहुत प्रसन्न हुए और बोले—'माण्टे! तुम्हें एक बुद्धिमान् पुत्र उत्पन्न होगा, जिसका प्रभाव और पराक्रम मेरे ही समान होगा। वह तुम्हारे सम्पूर्ण कुलका उद्धार करेगा।' भगवान् शंकरका यह वरदान सुनकर माण्टिको बड़ा हर्ष हुआ। कुछ कालके अनन्तर महात्मा माण्टिकी पत्नीने गर्भ धारण किया, उन्हें गर्भ धारण किये चार वर्ष बीत गये; परंतु गर्भका बालक माताका उदर छोड़कर बाहर नहीं निकलता था। तब माण्टिने उससे कहा—'बेटा! विभिन्न योनियोंमें पड़े हुए जीव यह सोचा करते हैं कि हम कब मनुष्ययोनिमें जन्म लेंगे। जहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी भी प्राप्ति होती है, जिसमें किये हुए पूजनका महान् फल होता है तथा जहाँ पितरों और देवताओंके सन्तोषार्थ नाना प्रकारके धर्मानुष्ठानका अवसर प्राप्त होता है। ऐसे मनुष्यजन्मका, जिसे पानेकी अभिलाषा देवता भी करते हैं, तुम अनादर करके माताके उदरमें ही क्यों स्थित हो रहे हो?'
गर्भने कहा—पिताजी! मैं भी यह सब कुछ जानता हूँ। वास्तवमें यह मनुष्यजन्म परम दुर्लभ है; किंतु मैं कालके मार्गसे सदा ही बहुत डरता हूँ। विद्वान् पुरुषको उसी वस्तुके लिये यत्न करना चाहिये, जो दुःखयुक्त न हो। यदि मेरा यह मन भयानक एवं गम्भीर कालसे ताड़ित होकर भाँति-भाँतिके दोषोंको न प्राप्त हो, तो मैं परम दुर्लभ मनुष्यजन्मको शीघ्र प्राप्त कर सकता हूँ।
यह सुनकर उसके पिता माण्टि भगवान् सदाशिवकी शरणमें गये और बोले—'देव महेश्वर! मेरी रक्षा कीजिये, भगवन्! आपने ही मुझे पुत्र दिया है और आप ही जन्म कराइये।' तब माण्टिकी अतिशय भक्तिसे सन्तुष्ट हो भगवान् महेश्वर अपनी विभूतियोंसे बोले—'ज्ञान! धर्म! वैराग्य तथा ऐश्वर्य! और अज्ञान! अधर्म! अवैराग्य तथा अनैश्वर्य! तुम सब लोग शीघ्र जाओ और माण्टिके पुत्रको समझाओ।' तब वे विभूतियाँ उस गर्भको समझाती हुई बोलीं—'महामते माण्टिकुमार! तुम्हें अपने मनमें भय नहीं करना चाहिये। हम चारों धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य तुम्हारे मनसे कभी अलग न होंगे।' तत्पश्चात् अधर्म आदि बोले—'हम तुम्हारे पास नहीं आयेंगे, तुम्हें नमस्कार है। तुमको हमसे कोई भय नहीं है।' इन विभूतियोंके द्वारा ऐसा आश्वासन मिलनेपर वह गर्भका बालक शीघ्र बाहर निकल आया। बाहर जन्म लेते ही वह काँपने और रोने लगा। तब विभूतियोंने कहा—'माण्टे! तुम्हारा पुत्र अब भी कालमार्गसे भयभीत होकर काँपता और रोता है; इसलिये यह कालभीति नामसे प्रसिद्ध होगा।' इस प्रकार वरदान देकर वे विभूतियाँ महादेवजीके समीप चली गयीं और वह बालक शुक्लपक्षके चन्द्रमाके समान प्रतिदिन बढ़ने लगा। संस्कारोंसे सुसंस्कृत होनेपर उस बुद्धिमान् बालकने पाशुपत मन्त्रकी दीक्षा ली और सद्योजातादि पाँच मन्त्रोंका जप करते हुए वह तीर्थयात्रामें तत्पर हो गया। अर्जुन! महीसागर-संगमरूप गुप्त क्षेत्रके गुणोंका वर्णन सुनकर कालभीति भी वहाँ गया और महीके जलमें स्नान करके एक करोड़ मन्त्रका जप किया। जप समाप्त करके जब वह लौटा तो थोड़ी ही दूरपर उसने बिल्वका वृक्ष देखा, वहाँ जप करते समय उस ब्राह्मणकी इन्द्रियाँ लयको प्राप्त हो गयीं। वह क्षणभरमें केवल परमानन्दस्वरूप