भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 175

१४६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


हो गया। उसके उस ब्रह्मानन्दकी तुलना स्वर्ग आदिके सुखोंसे कदापि नहीं हो सकती। दो घड़ीतक समाधिमें स्थित होनेके पश्चात् वह पुनः पूर्वावस्थामें आ गया।

यह देखकर कालभीतिको बड़ा विस्मय हुआ। वह मन-ही-मन कहने लगा कि—'यह महान् आनन्द तो मुझे न काशीमें मिला, न नैमिषारण्यमें, न प्रभास और केदारक्षेत्रमें प्राप्त हुआ, न अमरकण्टकमें ही। इस समय मेरी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ गंगाजीकी भाँति निर्विकार और स्वस्थ हैं तथा मेरा चित्त एक परम गोपनीय धर्मका आश्रय लेता है। अहो! इस तीर्थका प्रभाव तो यहाँ स्पष्ट रूपसे प्रकट है। कहते हैं, जो स्थान सब प्रकारके दोषोंसे रहित, पवित्र और सम्पूर्ण उपद्रवोंसे शून्य हो, वहाँ निवास करनेवाले पुरुषकी बुद्धि धर्मके कार्यमें सहस्रगुनी हो जाती है। इसलिये इस तीर्थके प्रभावसे मैं मन-ही-मन अनुभव करता हूँ कि यह स्थान काशी आदि प्रधान तीर्थोंसे भी श्रेष्ठ है। अतः मैं यहीं रहकर बड़ी भारी तपस्या करूँगा।' ऐसा विचार करके कालभीति उस बिल्ववृक्षके नीचे एक पैरके अँगूठेके अग्रभागसे खड़े हो मन्त्रोंका जप करने लगे। जपका नियम ग्रहण करनेके पश्चात् वे सौ वर्षतक जलकी एक-एक बूँद पीकर रहे। सौ वर्ष पूर्ण होनेपर उनके सामने एक मनुष्य जलसे भरा हुआ घड़ा लेकर आया, उसने कालभीतिको प्रणाम करके बड़े हर्षसे कहा—'महामते! आज आपका नियम पूरा हो गया, यह जल ग्रहण कीजिये।'

कालभीति बोले—आप किस वर्णके हैं तथा आपका आचार-व्यवहार कैसा है? यह सब यथार्थरूपसे बताइये। आपके जन्म और आचार जान लेनेपर मैं यह जल ग्रहण करूँगा, अन्यथा नहीं।

आगन्तुक मनुष्य बोला—मैं अपने माता-पिताको नहीं जानता, अपने-आपको सदा इसी रूपमें देखता हूँ, आचारों और धर्मोंसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं।

कालभीतिने कहा—यदि ऐसी बात है, तो मैं आपका जल कभी ग्रहण नहीं करूँगा। इस विषयमें मेरे गुरुने वैदिक सिद्धान्तके अनुसार जो उपदेश दिया है, वह सुनो—जिसके कुलका ज्ञान न हो, जिसके जन्ममें वीर्यशुद्धिका अभाव हो, उसका अन्न खाने और जल पीनेवाला साधुपुरुष तत्काल कष्टमें पड़ जाता है।* जो हीन वर्णका है तथा जो भगवान् शिवका भक्त नहीं है, इन दो प्रकारके मनुष्योंको दान देते समय उसे लेनेका अनधिकारी समझना चाहिये।

आगन्तुक मनुष्य बोला—तुम्हारी इस बातपर मुझे हँसी आती है। अहो! तुम बड़े अविवेकी हो, जब सब भूतोंमें सदा भगवान् शंकर ही निवास करते हैं, तो किसीके प्रति भी भली-बुरी बात नहीं कहनी चाहिये, क्योंकि इससे भगवान् शिवकी ही निन्दा होती है। जो अपने और दूसरेके बीच अन्तर मानता है, उस भेददर्शी पुरुषके लिये मृत्यु अत्यन्त घोर भय उपस्थित करती है, अथवा यदि शुद्धिका भी विचार किया जाय, तो बताओ इस जलमें क्या अपवित्रता है? यह घड़ा मिट्टीका बना हुआ है और अग्निसे पकाया गया है, फिर जलसे भर दिया गया है। इन सब वस्तुओंमें तो कोई अशुद्धि है नहीं। यदि कहें कि मेरे संसर्गसे अशुद्धि आ गयी है, तो यह भी स्पष्ट नहीं है, क्योंकि वैसी दशामें जब मैं इस पृथ्वीपर हूँ तो आप यहाँ क्यों रहते हैं? बताइये आप क्यों इस पृथ्वीपर चलते हैं? आकाशमें क्यों नहीं चलते? अतः इस प्रकार विचार करनेपर आपकी बात मूर्खोंकी-सी जान पड़ती है।

कालभीतिने कहा—यदि ऐसा कहा जाता है कि सम्पूर्ण भूतोंमें एक शिव ही हैं, तो


* न ज्ञायते कुलं यस्य बीजशुद्धिं विना ततः। तस्य खादन् पिबन् वापि साधुः सीदति तत्क्षणात्॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३४।५०)