संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 176, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १४७
कथनमात्रके लिये सबको शिव माननेवाले नास्तिक लोग भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थोंको छोड़कर मिट्टी क्यों नहीं खाते? राख और धूल क्यों नहीं फाँकते? इसलिये संसारकी व्यवहार-सिद्धिके लिये एक मर्यादा स्थापित की गयी है, जो समयसे ही सफल होती है, अन्यथा नहीं। आप उस मर्यादाको श्रवण करें। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इस पांचभौतिक जगत्की सृष्टि की और उसे नाममय प्रपंचसे बाँध दिया। उस नाम-प्रपंचके चार भेद हैं—ध्वनि, वर्ण, पद और वाक्य। ये ही नामात्मक प्रपंचके चार आधारस्थान हैं। इनमें ध्वनि 'नाद' स्वरूप है। ॐकारपूर्वक सम्पूर्ण अक्षर ही 'वर्ण' कहलाते हैं। 'शिवम्' यह सुबन्त शब्द 'पद' है और 'शिवम् भजेत्' (शिवका भजन करे) यह विधि ही एक तिङन्तक्रियासे अन्वित होनेके कारण वाक्य कही गयी है। वह वाक्य भी तीन प्रकारका होता है; ऐसा श्रुतिका सिद्धान्त है। पहला प्रभुसम्मत, दूसरा सुहृत्सम्मत तथा तीसरा कान्तासम्मत। यही त्रिविध वाक्य माने गये हैं। जैसे स्वामी सेवकको यह आदेश देता है कि 'अमुक काम करो'—यह प्रभुसम्मत वाक्य है। उसी प्रकार श्रुति और स्मृति दोनों प्रभुसम्मत वाक्यका प्रयोग करती हैं—स्वामीकी भाँति आज्ञा देती हैं। इतिहास और पुराण आदि सुहृत्सम्मत कहे जाते हैं। ये सुहृदोंकी भाँति समझाकर मनुष्यको यथार्थ मार्गमें लगाते हैं तथा काव्यके जो सरस एवं व्यंग्यपूर्ण आलाप आदि हैं; उन्हें कान्तासम्मत कहते हैं*। प्रभुवाक्य बाहर और भीतरसे पवित्र करनेवाला माना गया है तथा सुहृद्वाक्य भी परम पवित्र है। स्वर्ग आदि उत्तम लोकोंकी प्राप्तिकी इच्छासे उसका पालन करना चाहिये। श्रुति कहती है कि भूलोकके सम्पूर्ण मनुष्योंको प्रभुसम्मत तथा सुहृत्सम्मत वाक्यका पालन करना चाहिये। आप यदि नास्तिकवादका सहारा लेकर सर्वत्र व्यावहारिक समानताकी बात करते हैं तो इसके अनुसार क्या वेद, शास्त्र और पुराण व्यर्थ ही हैं? क्या पूर्वकालमें सप्तर्षि आदि जो ब्राह्मण और क्षत्रिय हो गये हैं, वे सब मूर्ख ही थे? केवल आप ही चतुर हैं? जो वेद, वेदांग और वेदान्तका अनुसरण करनेवाले एवं सत्त्वगुणमें स्थित हैं, वे ऊपरके लोकोंमें गमन करते हैं। रजोगुणी मनुष्य मध्यवर्ती भूलोकमें निवास करते हैं और तमोगुणी जीव नीचेके लोकों अथवा नरकोंमें रहते हैं। सात्त्विक आहार तथा सात्त्विक आचार-विचारसे मनुष्य स्वर्गगामी होता है (अतः सदाचारका ध्यान रखना आवश्यक है)। हम आपकी बातोंमें दोष ढूँढ़ते हों, ऐसी बात भी नहीं। हम यह नहीं कहना चाहते कि सम्पूर्ण भूतोंमें भगवान् शिव नहीं हैं। भगवान् तो सम्पूर्ण भूतोंमें हैं ही; किंतु इस विषयमें मैं जो उपमा दे रहा हूँ; उसे ध्यान देकर सुनिये—जैसे सुवर्णके बने हुए बहुतसे आभूषण होते हैं; उनमेंसे कोई तो विशुद्ध सुवर्णके होते हैं; और कुछ खोटे भी होते हैं। खरे, खोटे सभी आभूषणोंमें सुवर्ण तो है ही। इसी प्रकार ऊँच-नीच, शुद्ध-अशुद्ध सबमें भगवान् सदाशिव विराजमान हैं। जैसे खोटा सुवर्ण शोधित होनेपर शुद्ध सुवर्णके साथ एकताको प्राप्त होता है, उसी प्रकार इस शरीरको भी व्रत, तपस्या और सदाचार आदिके द्वारा शोधित करके शुद्ध बना लेनेपर मनुष्य निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है। अतः बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि वह हीन या अपवित्र वस्तुको किसी प्रकार भी ग्रहण न करे। यदि वह अपने इस शरीरका शोधन
* जैसे प्रियतमा अपने प्रियतमको कोई आदेश नहीं देती, अपने हाव-भाव भ्रूभंग अथवा सरस आलापसे अपनी इच्छामात्र सूचित कर देती है और प्रियतम उसकी पूर्तिके लिये स्वयं यत्नशील हो जाता है, इसी प्रकार रामायण आदि काव्य अपने सरस वर्णनोंद्वारा सहृदयोंका मनोरंजन करते हुए स्वतः हृदयमें यह भाव भर देते हैं कि हमें श्रीराम आदिके आदर्शपर चलना चाहिये, रावण आदिके आदर्शपर नहीं।