संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कर ले तो शुद्ध होनेपर निश्चय ही स्वर्गलोकको प्राप्त हो सकता है। जो पुरुष व्रत, उपवास करके शुद्ध हो गया है, वह भी यदि सबसे प्रतिग्रह लेने लगे तो थोड़े ही दिनोंमें अवश्य पतित हो जाता है।^१ इसलिये मैं स्पष्ट कह देना चाहता हूँ कि आपका यह जल मैं किसी तरह भी ग्रहण नहीं करूँगा। यह कार्य भला हो या बुरा, मेरे लिये वेद ही परम प्रमाण है।
कालभीतिके ऐसा कहनेपर आगन्तुक मनुष्य हँसने लगा। उसने दाहिने अंगूठेसे भूमिको खुरेदते हुए एक बहुत बड़ा एवं उत्तम गड्ढा तैयार कर दिया। फिर उसीमें वह सारा जल ढुलका दिया। उससे वह गड्ढा भर गया। फिर भी जल शेष रह गया; तब उसने पैरसे ही खुरेदकर एक तालाब बना दिया और शेष बचे हुए जलसे उसको भर दिया। यह परम अद्भुत कार्य देखकर भी ब्राह्मण देवताको कोई आश्चर्य नहीं हुआ; क्योंकि भूत, प्रेत आदिकी उपासना करनेवाले लोगोंमें अनेक प्रकारकी विचित्र बातें होती हैं। उस विचित्रताके चक्करमें आकर अपने सनातन वैदिक मार्गका परित्याग कभी नहीं करना चाहिये^२।
आगन्तुक मनुष्य बोला—ब्राह्मणदेव! आप हैं तो बड़े भारी मूर्ख; परंतु बातें पण्डितों-जैसी करते हैं। क्या आपने पुराणवेत्ता विद्वानोंके मुखसे कहा हुआ यह श्लोक नहीं सुना है?
कूपोऽन्यस्य घटोऽन्यस्य रज्जुरन्यस्य भारत।
पाययत्येकः पिबत्येकः सर्वे ते समभागिनः ॥
भारत! कुआँ दूसरेका, घड़ा दूसरेका और रस्सी दूसरेकी है; एक पानी पिलाता है और एक पीता है; वे सब समान फलके भागी होते हैं। ऐसा ही मेरा भी जल है और तुम धर्मके ज्ञाता हो; फिर क्यों इसे नहीं पीयोगे?
नारदजी कहते हैं—अर्जुन! तदनन्तर कालभीतिने उक्त श्लोकके विषयमें अनेक प्रकारसे विचार किया, किंतु किस प्रकार सब लोग समान फलके भागी होते हैं; इसका निश्चय न कर सके। फिर घट आदि साधनोंद्वारा जो समान फलभागी होनेकी बात कही गयी थी, उसपर विशेष विचार किया और इस निश्चयपर पहुँचे कि यदि एक कार्यमें अनेक सहायक हों तो सब समान फलके भागी होते हैं। जैसे एक नौका निर्माण करानेमें यदि अनेक पुरुषोंने धन लगाया हो तो उन सबका उसमें समान भाग होता है। इस प्रकार कर्ताको प्राप्त होनेवाला सब फल सहकारियोंमें बँटकर समान हो जाता है। इस प्रकार पुनः-पुनः विचार करके कालभीतिने उस मनुष्यसे कहा—'भद्रपुरुष! आपका यह कहना ठीक है। कूप और तालाबके जल ग्रहण करनेमें दोष नहीं है तथापि आपने तो अपने घड़ेके जलसे ही इस गड्ढेको भरा है, यह बात प्रत्यक्ष देख करके भी मेरे-जैसा मनुष्य कैसे इस जलको पी सकता है। अतः यह अच्छा हो या बुरा; मैं किसी प्रकार भी इसे नहीं पीऊँगा।' कालभीतिके इस प्रकार दृढ़ निश्चय कर लेनेपर वह पुरुष हँसकर क्षणभरमें वहाँसे अन्तर्धान हो गया। इससे कालभीतिको बड़ा विस्मय हुआ। ये बार-बार सोचने लगे कि यह क्या वृत्तान्त है। इतनेहीमें उस बिल्ववृक्षके नीचे पृथ्वीसे सहसा एक परम सुन्दर शिवलिंग प्रकट हो गया, जो सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहा था। इन्द्रने उसके ऊपर पारिजातके फूलोंकी वर्षा की और देवता तथा मुनि नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा स्तुति
१- सर्वतो यः प्रतिग्राहा निराहारी च यः पुमान्। शुचिः स्यादल्पदिवसात् पतितोऽसौ भवेत् स्फुटम् ॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३४।८१)
२- यतो बहुविधं चित्रं भवेद्भूताद्युपासिषु । तच्चित्रेण न जह्याच्च श्रुतिमार्गं सनातनम् ॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३४।८६)