संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १४९
करने लगे। तब कालभीतिने प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक यह स्तुति प्रारम्भ की—
'जो पापके काल, संसाररूपी पंकके काल, कालके काल तथा कालमार्गके भी काल हैं; जिनके कण्ठमें काला चिह्न सुशोभित होता है तथा जो संसारके कालरूप हैं, उन भगवान् महाकालकी मैं शरण लेता हूँ। श्रुति आपको सम्पूर्ण विद्याओंका ईश्वर बताकर स्तुति करती है। आप समस्त भूतोंके ईश्वर तथा प्रपितामह हैं; ऐसी महिमावाले आप महेश्वरको नमस्कार है। वेद जिसकी स्तुति करता है, उस 'तत्पुरुष' नामवाले आपको हम जानते हैं और आपका ही चिन्तन करते हैं। देवेश्वर! आप हमें शरण दीजिये; आपको बारंबार नमस्कार है।'
अर्जुन! कालभीतिके इस प्रकार स्तुति करनेपर महादेवजीने उस लिंगसे निकलकर प्रत्यक्ष दर्शन दिया और अपने तेजसे त्रिलोकीको प्रकाशित करते हुए कहा—'ब्रह्मन्! तुमने इस महातीर्थमें रहकर मेरी जो अतिशय आराधना की है, उससे मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। वत्स! काल तुम्हारे ऊपर किसी प्रकार भी शासन नहीं कर सकता। मैं ही तुम्हारी धर्मनिष्ठा देखनेके लिये मनुष्यरूपमें यहाँ प्रकट हुआ था। यह धर्ममार्ग धन्य है, जिसका तुम्हारे-जैसे धर्मज्ञोंद्वारा पालन होता है। मैंने यह गड्ढा और तालाब सब तीर्थोंके जलसे ही भरा है। यह परम पवित्र जल है और तुम्हारे लिये मैंने इसका संग्रह किया है। तुमने जो मेरी स्तुति की है, उसमें वैदिक मन्त्रोंका रहस्य भरा हुआ है। तुम मुझसे कोई मनोवांछित वर माँगो। तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है।'
कालभीतिने कहा—भगवान् शंकर! यदि आप मुझपर सन्तुष्ट हैं, तो मैं धन्य हूँ। मुझपर आपका महान् अनुग्रह है। आपके सन्तोषसे ही सब धर्म सफल होते हैं। अन्यथा वे केवल श्रम देनेवाले ही माने गये हैं। प्रभो! यदि आप सन्तुष्ट हैं तो सदा यहाँ निवास करें। आपके इस शुभ लिंगपर जो भी दान, पूजन आदि किया जाय, वह सब अक्षय हो। देव! पाँच हजार मन्त्र जपनेसे जो फल होता है, वही फल मनुष्योंको इस शिवलिंगका दर्शन करनेसे प्राप्त हो जाय। महेश्वर! आपने काल-मार्गसे मुझे छुटकारा दिलाया है, इसलिये यह शिवलिंग महाकालके नामसे प्रसिद्ध हो। जो मनुष्य इस कूपमें स्नान करके पितरोंका तर्पण करे, उसे सब तीर्थोंका फल प्राप्त हो और उसके पितरोंको अक्षय गतिकी प्राप्ति हो।
कालभीतिकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर प्रसन्न हो बोले—जहाँ स्वयम्भू-लिंग हो, वहाँ मैं नित्य निवास करता हूँ। स्वयम्भू-लिंग, रत्नमय-लिंग, धातुज-लिंग, प्रस्तरनिर्मित लिंग तथा चन्दन आदि लेपजनित-लिंग हैं। इनमें क्रमशः अन्तिम लिंगकी अपेक्षा पूर्व-पूर्ववाले लिंग दस-गुना अधिक फल देनेवाले होते हैं। आकाशमें तारकामय-लिंग, पातालमें हाटकेश्वर-लिंग तथा भूमण्डलपर स्वयम्भू-लिंग—ये तीनों शुभ होते हैं। तुमने विशेषरूपसे जिसके लिये प्रार्थना की है, वह सब पूर्ण होगा। यहाँ फूल, फल, पूजा, नैवेद्य और स्तुति निवेदन करना तथा दान या दूसरा कोई भी शुभ कर्म करना, सब