भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

१५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

अक्षय होगा। बेटा! माघके कृष्ण-पक्षकी चतुर्दशीको शिव-योगमें जो लिंगार्चनके पहले कूपमें स्नान करके पितरोंका तर्पण करेगा, उसे सब तीर्थोंके फलकी प्राप्ति होगी तथा उसके पितरोंकी अक्षय गति होगी। उसी दिनकी रात्रिमें जो प्रत्येक प्रहरमें महाकालका पूजन करेगा, उसे सब लिंगोंके समीप जागरण करनेका फल प्राप्त होगा। द्विजोत्तम! जो पुरुष सदा जितेन्द्रिय रहकर शिवलिंगमें मेरी पूजा करेगा, भोग और मोक्ष उससे कभी दूर नहीं रहेंगे। जो चतुर्दशी, अष्टमी, सोमवार तथा पर्वके दिन इस सरोवरमें स्नान करके इस शिवलिंगकी पूजा करेगा, वह शिवको ही प्राप्त होगा। यहाँ किया हुआ जप, तप और रुद्र-जप सब अक्षय होगा। तुम नन्दीके साथ मेरे दूसरे द्वारपाल बनोगे। वत्स! काल-मार्गपर विजय पानेसे तुम चिरकालतक महाकालके नामसे प्रसिद्ध होओगे। यहाँ शीघ्र ही राजर्षि करन्धम आनेवाले हैं, उन्हें धर्मका उपदेश करके तुम मेरे लोकमें चले आओ।'

यों कहकर भगवान् रुद्र उस लिंगमें ही लीन हो गये और महाकाल भी प्रसन्न होकर वहाँ बड़ी भारी तपस्या करने लगे।


महाकालद्वारा करन्धमके प्रश्नानुसार श्राद्ध तथा युगव्यवस्थाका वर्णन

**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! तदनन्तर महाकालका चरित्र सुनकर राजा करन्धम वहाँ आये। उन्होंने महीसागरसंगमके जलमें स्नान तथा महाकालका दर्शन करके अपने जीवनको सफल माना। पचास हजार मन्त्रोंका जप करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही जिनके दर्शनमात्रसे मिल जाता है, उन्हीं भगवान् महाकालकी विशेष पूजा, अर्चा करके राजाने उनको प्रणाम किया और उनकी स्तुति करके उन्हींके समीप बैठे। तत्पश्चात् भगवान् शिवके वचनका स्मरण करके मुसकराते हुए महाकालजीने राजाकी अगवानी की और स्वागत-सत्कारपूर्वक उन्हें अर्घ्य प्रदान किया। फिर कुशलप्रश्नके पश्चात् जब राजा सुखपूर्वक बैठे, तो उन्होंने महाकालजीसे पूछा—'भगवन्! मेरे मनमें सदा यह संशय बना रहता है कि मनुष्योंद्वारा पितरोंका जो तर्पण किया जाता है, उसमें जल तो जलमें ही चला जाता है; फिर हमारे पूर्वज उससे तृप्त कैसे होते हैं? इसी प्रकार पिण्ड आदिका सब दान भी यहीं देखा जाता है। अतः हम यह कैसे मान लें कि यह पितर आदिके उपभोगमें आता है?'

**महाकालने कहा—**राजन्! पितरों और देवताओंकी योनि ही ऐसी होती है कि ये दूरकी कही हुई बातें सुन लेते, दूरकी पूजा भी ग्रहण कर लेते और दूरकी स्तुतिसे भी सन्तुष्ट होते हैं। इसके सिवा वे भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ जानते और सर्वत्र पहुँचते हैं। पाँचों तन्मात्राएँ, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति—इन नौ तत्त्वोंका बना हुआ उनका शरीर होता है। इसके भीतर दसवें तत्त्वके रूपमें साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं। इसलिये देवता और पितर गन्ध तथा रस-तत्त्वसे तृप्त होते हैं। शब्दतत्त्वसे रहते हैं तथा स्पर्शतत्त्वको ग्रहण करते हैं और किसीको पवित्र देखकर उनके मनमें बड़ा सन्तोष होता है। जैसे पशुओंका भोजन तृण और मनुष्योंका भोजन अन्न कहलाता है, वैसे ही देवयोनियोंका भोजन अन्नका सार-तत्त्व है। सम्पूर्ण देवताओंकी शक्तियाँ अचिन्त्य एवं ज्ञानगम्य हैं। अतः वे अन्न और जलका सार-तत्त्व ही ग्रहण करते हैं, शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं स्थित देखी जाती है।

**करन्धमने पूछा—**श्राद्धका अन्न तो पितरोंको दिया जाता है, परंतु वे अपने कर्मके अधीन होते हैं। यदि वे स्वर्ग अथवा नरकमें हों, तो श्राद्धका उपभोग कैसे कर सकते हैं? और वैसी दशामें वे वरदान देनेमें भी कैसे समर्थ हो सकते हैं?