संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १५१
महाकालने कहा—नृपश्रेष्ठ! यह सत्य है कि पितर अपने-अपने कर्मोंके अधीन होते हैं, परंतु देवता, असुर और यक्ष आदिके तीन अमूर्त तथा चारों वर्णोंके चार मूर्त—ये सात प्रकारके पितर माने गये हैं। ये नित्य पितर हैं, ये कर्मोंके अधीन नहीं, वे सबको सब कुछ देनेमें समर्थ हैं। वे सातों पितर भी सब वरदान आदि देते हैं। उनके अधीन अत्यन्त प्रबल इकतीस गण होते हैं। राजन्! इस लोकमें किया हुआ श्राद्ध उन्हीं मानव पितरोंको तृप्त करता है। वे तृप्त होकर श्राद्धकर्ताके पूर्वजोंको जहाँ कहीं भी उनकी स्थिति हो, जाकर तृप्त करते हैं। इस प्रकार अपने पितरोंके पास श्राद्धमें दी हुई वस्तु पहुँचती है और वे श्राद्ध ग्रहण करनेवाले नित्य पितर ही श्राद्धकर्ताओंको श्रेष्ठ वरदान देते हैं।
राजाने पूछा—विप्रवर! जैसे भूत आदिको उन्हींके नामसे 'इदं भूतादिभ्यः' कहकर कोई वस्तु दी जाती है, उसी प्रकार देवता आदिको संक्षेपसे क्यों नहीं दिया जाता? मन्त्र आदिके प्रयोगद्वारा विस्तार क्यों किया जाता है?
महाकालने कहा—राजन्! सदा सबके लिये उचित प्रतिष्ठा करनी चाहिये। उचित प्रतिष्ठाके बिना दी हुई कोई वस्तु वे देवता आदि ग्रहण नहीं करते। घरके दरवाजेपर बैठा हुआ कुत्ता जिस प्रकार ग्रास (फेंका हुआ टुकड़ा) ग्रहण करता है, क्या कोई श्रेष्ठ पुरुष भी उसी प्रकार ग्रहण करता है? इसी प्रकार भूत आदिकी भाँति देवता कभी अपना भाग ग्रहण नहीं करते। वे पवित्र भोगोंका सेवन करनेवाले तथा निर्मल हैं। अतः अश्रद्धालु पुरुषके द्वारा बिना मन्त्रके दिया हुआ जो कोई हव्य भाग होता है, उसे वे स्वीकार नहीं करते। यहाँ मन्त्रोंके विषयमें श्रुति भी इस प्रकार कहती है—
मन्त्रा दैवता यद्यद्विद्वान्मन्त्रवत्करोति देवताभिरेव तत्करोति यद्ददाति देवताभिरेव तद्ददाति यत्प्रतिगृह्णाति देवताभिरेव तत्प्रतिगृह्णाति तस्मान्नामन्त्रवत्प्रतिगृह्णीयात् नामन्त्रवत्प्रतिपद्यते।
'सब मन्त्र ही देवता हैं, विद्वान् पुरुष जो-जो कार्य मन्त्रके साथ करता है, उसे वह देवताओंके द्वारा ही सम्पन्न करता है। मन्त्रोच्चारणपूर्वक जो कुछ देता है, वह देवताओंद्वारा ही देता है। मन्त्रपूर्वक जो कुछ ग्रहण करता है, वह देवताओंद्वारा ही ग्रहण करता है। इसलिये मन्त्रोच्चारण किये बिना मिला हुआ प्रतिग्रह न स्वीकार करे। बिना मन्त्रके जो कुछ किया जाता है, वह प्रतिष्ठित नहीं होता।'
इस कारण पौराणिक और वैदिक मन्त्रोंद्वारा ही सदा दान करना चाहिये।
राजाने पूछा—कुश, तिल, अक्षत और जल-इन सबको हाथमें लेकर क्यों दान दिया जाता है? मैं इसका कारण जानना चाहता हूँ।
महाकालने कहा—राजन्! प्राचीन कालमें मनुष्योंने बहुतसे दान किये, और उन सबको असुरोंने बलपूर्वक भीतर प्रवेश करके ग्रहण कर लिया। तब देवताओं और पितरोंने ब्रह्माजीसे कहा—'स्वामिन्! हमारे देखते-देखते दैत्यलोग सब दान ग्रहण कर लेते हैं। अतः आप उनसे हमारी रक्षा करें, नहीं तो हम नष्ट हो जायँगे।' तब ब्रह्माजीने सोच-विचारकर दानकी रक्षाके लिये एक उपाय निकाला। पितरोंको तिलके साथ दान दिया जाय, देवताओंको अक्षतके साथ दिया जाय तथा जल और कुशका सम्बन्ध सर्वत्र रहे। ऐसा करनेपर दैत्य उस दानको नहीं ग्रहण कर सकते। इन सबके बिना जो दान किया जाता है, उसपर दैत्यलोग बलपूर्वक अधिकार कर लेते हैं, और देवता तथा पितर दुःखपूर्वक उच्छ्वास लेते हुए लौट जाते हैं। वैसे दानसे दाताको कोई फल नहीं मिलता। इसलिये सभी युगोंमें इसी प्रकार (तिल, अक्षत, कुश और जलके साथ) दान दिया जाता है।
राजा करन्धम बोले—ब्रह्मन्! मैं चारों युगोंकी व्यवस्थाको यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ।
महाकालने कहा—राजन्! कृतयुगको तुम