संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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आदियुग समझो। उसके बाद त्रेतायुगकी स्थिति मानी गयी है। फिर द्वापर और कलियुग हैं। यही संक्षेपसे चारों युगोंका परिचय है। कृतयुग सत्त्वगुण-प्रधान है, त्रेता रजोगुणमय है, द्वापरमें रजोगुण और तमोगुण दोनोंकी प्रधानता है तथा कलियुगको साक्षात् तमोगुणका स्वरूप जानना चाहिये। अब चारों युगोंमें जो युगका प्रधान आचार है, उसका वर्णन करता हूँ—कृतयुगमें ध्यान प्रधान है, त्रेतामें यज्ञको ही प्रधान कहा जाता है, द्वापरमें सत्य बर्ताव ही प्रधान धर्म है तथा कलियुगमें दान ही सर्वोत्तम धर्म बताया गया है।* कृतयुगमें मानसी सृष्टि होती है। उस समय सबके जीवन-निर्वाहकी वृत्ति रस और उल्लाससे परिपूर्ण होती है। समस्त प्रजा तेजस्विनी होती है। सब प्राणी सदा तृप्त रहते हैं। सभी आनन्दमग्न तथा सुखभोगकी सुविधासे सम्पन्न होते हैं। उनमें कोई ऊँच और नीच नहीं होता। सम्पूर्ण प्रजा समानरूपसे शुभ कार्यमें तत्पर रहती है। कृतयुगमें सब लोगोंकी आयु समान होती है, सबको सुख उपलब्ध होता है; रूप और सौन्दर्य भी सबमें समान देखे जाते हैं। किसीमें अप्रसन्नता नहीं, उद्वेग नहीं, द्वेष नहीं और ग्लानि नहीं होती। उस समय वर्णाश्रम व्यवस्था होती है। वर्णसंकरका नाम नहीं होता। कुछ लोग पर्वतोंपर और उसके आसपास तथा कुछ लोग समुद्रके तटपर निवास करते हैं। सबपर दया करना उस समयकी प्रजाको विशेष प्रिय जान पड़ता है। सब मनुष्य एकमत होकर सदा भगवान् सदाशिवका ध्यान करते हैं। कृतयुगका चतुर्थ चरण आनेपर उनकी वह रसोल्लासवृत्ति नष्ट हो गयी। तब उनके लिये गृहका काम देनेवाले कल्पवृक्ष उत्पन्न हो गये। वे वृक्ष ही उनके लिये वस्त्र, आभूषण तथा फल उत्पन्न करने लगे। उन वृक्षोंपर ही उनके लिये पत्ते-पत्तेमें उत्तम गन्ध, उत्तम रंग और उत्तम रससे युक्त अत्यन्त बलवर्धक मधु तैयार होने लगा। उसे मधुमक्खियोंने नहीं बनाया था। कृतयुगके अन्तिम | भागमें उसीसे प्रजा अपने जीवनका निर्वाह करती थी। उस मधुके सेवनसे सब लोग हृष्ट, पुष्ट, अधिक बलशाली तथा नीरोग रहते थे। तदनन्तर कुछ कालके बाद जब मनुष्योंकी रसनेन्द्रिय प्रबल हो गयी, तो युगका प्रभाव पड़नेसे सब लोगोंमें भगवान्के ध्यानकी प्रवृत्ति कम होने लगी और वे उन वृक्षों तथा बिना मक्खीके उत्पन्न हुए मधुपर भी बलपूर्वक अधिकार करने लगे। उनके इस लोभदोषजनित अनाचारसे वे कल्पवृक्ष कहीं-कहीं मधुके साथ ही अदृश्य हो गये। उस समय उन वृक्षोंकी सम्पत्ति जब बहुत थोड़ी रह गयी, तो प्रजाजनोंमें द्वन्द्व प्रकट हो गये। वे सर्दी, गर्मी तथा मानसिक क्लेशसे बहुत दुःखी हुए। तब उन्होंने अपनेको आच्छादित करनेके लिये घर बनाये। उस समय त्रेतायुगके प्रारम्भमें उनके लिये पुनः दूसरी सिद्धि प्रकट हुई। वर्षा होनेसे जल और पृथ्वीका संयोग हुआ, और उससे बिना जोते-बोये ग्राम्यमें (गाँवमें होनेवाले) तथा अरण्यमें (जंगलोंमें होनेवाले) चौदह प्रकारके अन्न उत्पन्न हुए। तदनन्तर ऋतुओंके अनुकूल फूल और फलसे भरे हुए वृक्षों और लताओंका प्रादुर्भाव हुआ। इस तरह अनेक प्रकारके धान्य, पुष्प और फलोंसे प्रजाका जीवन-निर्वाह होने लगा। तत्पश्चात् कालके प्रभावसे पुनः उनमें राग और लोभका संचार हुआ। फिर तो सब लोग अपनी-अपनी शक्तिके अनुसार हठपूर्वक बड़ी शीघ्रताके साथ नदियों, पर्वतों, क्षेत्रों, वृक्षों, लताओं और धान्योंको भी अपने अधिकारमें करने लगे। इस धर्मविपरीत आचरणसे चौदहों प्रकारके धान्य नष्ट हो गये; सभी ओषधियाँ धरतीमें प्रवेश कर गयीं। इससे प्रजाको बड़ी पीड़ा होने लगी। यह देख वेनकुमार राजा पृथुने सब प्राणियोंके हितके लिये पृथ्वीका दोहन किया। तबसे सब प्रजा वार्तानामक वृत्तिके द्वारा हल और फालसे जोत-बोकर उत्पन्न किये हुए अन्नसे जीवन-निर्वाह करने लगी। उस समय क्षत्रियलोग समस्त प्रजाका
* ध्यानं परं कृतयुगे त्रेतायां यज्ञ उच्यते। वृत्तं च द्वापरे सत्यं दानमेव कलौ युगे॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३५। ४५)