संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 182, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १५३
पालन करते थे। वर्णाश्रम-धर्मकी प्रतिष्ठा थी। त्रेतामें सब ओर यज्ञकी ही चर्चा होने लगी। अज्ञानी मनुष्य भगवान् सदाशिवके ध्यानमय मोक्षमार्गको छोड़कर रागवश वेदोंकी यज्ञसम्बन्धिनी पुष्पित (प्रशंसापूर्ण) वाणीका आश्रय ले यज्ञद्वारा स्वर्गप्राप्तिके साधनमें संलग्न हो गये। तदनन्तर द्वापर आनेपर मनुष्योंमें बुद्धि-भेद उत्पन्न होता है। मन, वाणी और क्रियाद्वारा बड़ी कठिनाईसे जीविका चलने लगती है। सबमें लोभ और अधैर्य बढ़ जाता है। भगवान् शंकरका आश्रय छोड़ देनेसे सबमें धर्मसंकरता आ जाती है तथा वर्ण और आश्रम-धर्मकी मर्यादा टूटने लगती है। द्वापरमें ऐसी अवस्था आनेपर भगवान् वेदव्यास प्रकट होते हैं और वे द्वापरके अन्तिम भागमें एक ही वेदके चार विभाग करते हैं। द्विजोंके हितके लिये व्यासजीके द्वारा एक ही वेद चार चरणोंमें प्रकट किया जाता है। इन्हीं वेदोंके अर्थका विस्तार होनेसे इतिहास और पुराणोंके अनेक भेद होते हैं—ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, भागवतपुराण, नारदीय पुराण, सातवाँ मार्कण्डेयपुराण, आठवाँ अग्निपुराण नवाँ भविष्यपुराण, दसवाँ ब्रह्मवैवर्तपुराण, ग्यारहवाँ लिंगपुराण, बारहवाँ वाराहपुराण, तेरहवाँ स्कन्दपुराण, चौदहवाँ वामनपुराण, पंद्रहवाँ कूर्मपुराण, सोलहवाँ मत्स्यपुराण, तत्पश्चात् गरुड़पुराण और ब्रह्माण्डपुराण। ये अट्ठारह पुराण हैं।
अब इस वाराहकल्पमें होनेवाले व्यासोंके नाम सुनो—ऋतु, सत्य, भार्गव, अंगिरा, सविता, मृत्यु, शतक्रतु, बुद्धिमान् वसिष्ठ, सारस्वत, त्रिधामा, वेदज्ञ मुनिवर त्रिवृत, शततेजा, स्वयं भगवान् नारायण, करक, आरुणि, कृतंजय, भरद्वाज, कविश्रेष्ठ गौतम, मुनिवर वाजश्रवा, शुष्मायण मुनि, तृणविन्दु, ऋक्ष, शक्ति, पराशर, जातुकर्ण्य, विष्णुरूप साक्षात् द्वैपायन मुनि तथा अश्वत्थामा—ये भूत और भविष्य व्यास सूचित किये गये। द्वापरमें लोककल्याणके लिये धर्मशास्त्रके भी अनेक भेद होते हैं। मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप तथा वसिष्ठ—ये धर्मशास्त्रके प्रवर्तक ऋषि हैं।
तत्पश्चात् द्वापरकी सन्ध्यामें और कलियुगके प्रारम्भकालमें जब शैव योग नष्ट होने लगता है, तब योगसे आनन्दित होनेवाले मुनि प्रकट होते हैं। श्वेतवाराहकल्पके कलियुगमें सर्वप्रथम भगवान् रुद्र ही योगेश्वररूपमें प्रकट होते हैं। तदनन्तर सुतार, तारण, सुहोत्र, कंकण, लौगाक्षि, महामुनि जैगीषव्य, भाव्य, दधिवाहन, ऋषभ, मुनिवर धर्म, उग्र, अत्रि, बालक गौतम, वेदशीर्ष, गोकर्ण, शिखण्डी, गुहावासी, जटामाली, अट्टहास, दारुक, लांगली, संयमी, शूली, डिण्डी, मुण्डीश्वर, सहिष्णु, सोमशर्मा, लकुलीश तथा कायावरोहण इत्यादि योगेश्वर क्रमशः होनेवाले हैं। ये कलियुगमें संक्षेपसे शैव-धर्मका उपदेश करेंगे। राजन्! इस प्रकार कलियुगमें शास्त्रोंका संक्षेप बताया जाता है।
अब कलियुगकी प्रवृत्ति सुनो, जो हर्ष और उद्वेगमें डालनेवाली है। कलियुगमें तमोगुणसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले मनुष्य माया (छल-कपट आदि), असूया (दोषदृष्टि) तथा तपस्वी महात्माओंकी हत्या भी करते हैं। कलिमें मन और इन्द्रियोंको मथ डालनेवाला राग प्रकट होता है। सदा भुखमरीका भय सताता रहता है, भयंकर अनावृष्टिका भय भी प्राप्त होता है। सब देशोंमें नाना प्रकारके उलट-फेर होते रहते हैं। सदा अधर्म-सेवन करनेके कारण मनुष्योंके लिये वेदका प्रमाण मान्य नहीं रह जाता। प्रायः लोग अधार्मिक, अनाचारी, अत्यन्त क्रोधी और तेजहीन होते हैं। लोभके वशीभूत होकर झूठ बोलते हैं, उनमें अधिकांश नारियोंका-सा स्वभाव आ जाता है, उनकी सन्तान दुष्ट होती हैं। ब्राह्मणोंके दूषित यज्ञ-याग, दोषयुक्त स्वाध्याय, दूषित आचरण तथा असत् शास्त्रोंके सेवनरूप कर्मदोषसे समस्त प्रजाका विनाश होता है। क्षत्रिय और ब्राह्मण नाशको प्राप्त होते हैं और