संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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वैश्य तथा शूद्रोंकी वृद्धि होती है। शूद्र लोग ब्राह्मणोंके साथ एक आसनपर सोते, बैठते और भोजन भी करते हैं। शूद्र ब्राह्मणोंके आचारको अपनाते हैं और ब्राह्मण शूद्रोंके समान आचरण करते हैं। चोर राजाओंकी वृत्तिमें स्थित होते हैं और राजालोग चोरोंके समान बर्ताव करते हैं। पतिव्रता स्त्रियाँ कम होने लगती हैं और कुलटाओंकी संख्या बढ़ती है। कलियुगमें भूमि प्रायः थोड़ा फल देनेवाली होती है, कहीं-कहीं वह अधिक उपजाऊ होती है। राजालोग निडर होकर पाप करते हैं, वे रक्षक नहीं वरं प्रजाकी सम्पत्ति हड़प लेनेवाले होते हैं। कलियुगमें प्रायः क्षत्रियेतर जातिके लोग राजा होते हैं। ब्राह्मण शूद्रकी वृत्तिसे जीविका चलानेवाले होंगे। शूद्र ब्राह्मणोंसे अभिवन्दित होकर स्वयं वाद-विवाद करनेवाले होंगे। वे द्विजोंको देखकर भी अपने आसनसे उठकर खड़े न होंगे। द्विज लोग मुँहपर हाथ रखकर नीच-से-नीच शूद्रके भी कानमें अत्यन्त विनयपूर्वक कोई बात कहेंगे; द्विजोंके सामने भी शूद्र ऊँचे आसनपर बैठे रहेंगे; यह बात जानकर भी राजा उन्हें दण्ड नहीं देगा। देखो, कालका कैसा प्रभाव है। अल्प विद्या और अल्प भाग्यवाले ब्राह्मण सुन्दर-सुन्दर फूलों तथा अन्य प्रकारके अलंकारोंसे शूद्रोंकी अर्चना करेंगे। कलियुगके ब्राह्मण पाखण्डियोंके न लेनेयोग्य दूषित दानको भी ग्रहण करते हैं और उसके कारण दुस्तर रौरव नरकमें पड़ते हैं। करोड़ों द्विज कलिकालमें तप और यज्ञका फल बेचनेवाले तथा अन्यायी होते हैं। मनुष्योंके सन्तानोंमें पुत्र थोड़े और कन्याएँ अधिक होती हैं। कलियुगमें मनुष्य वेदवाक्यों तथा वेदार्थोंकी निन्दा करते हैं। शूद्रोंने जिसे स्वयं रच लिया हो, वही शास्त्र एवं प्रमाण माना जायगा। हिंसक जीव प्रबल होंगे और गोवंशका क्षय होगा। दान आदि कोई भी धर्म अपने शुद्धरूपमें नहीं पालित होगा। | साधु पुरुषोंका अनेक प्रकारसे विनाश होगा। राजालोग प्रजाके रक्षक न होंगे। कलियुगका अन्तिम भाग उपस्थित होनेपर प्रत्येक जनपदके लोग अन्नका व्यापार करेंगे, ब्राह्मण वेद बेचनेवाले होंगे, स्त्रियाँ व्यभिचारसे अर्थोपार्जन करेंगी। घरोंमें स्त्रियोंकी प्रधानता होगी। वे अपवित्र कपड़े पहिननेवाली तथा कर्कशा होंगी। बहुत अधिक भोजनमें लिप्त होकर कृत्या (चुड़इलों)-की भाँति प्रतीत होंगी। कलियुगमें प्रायः सब लोग वाणिज्य-वृत्ति करनेवाले होंगे। इन्द्र छिटपुट वर्षा करनेवाले होंगे। मनुष्य दुराचार-सेवन आदि व्यर्थके पाखण्डोंसे घिरे होंगे और सब लोग एक-दूसरेसे याचना करेंगे। उस समय लोगोंको पाप करनेमें तनिक भी शंका नहीं होगी। जब कलियुगके संहारका समय आयगा उस समय मनुष्य पराया धन हड़पनेवाले, परस्त्रियोंका सतीत्व नष्ट करनेवाले तथा पंद्रह वर्षकी आयुवाले होंगे। चोरके घरमें भी चोरी करनेवाले तथा लुटेरेके घरमें भी लूट-मार करनेवाले होंगे। ज्ञान और कर्म दोनोंका अभाव हो जानेसे सब लोग उद्यम करना छोड़ देंगे। उस समय कीड़े, चूहे और सर्प मनुष्यको डसेंगे। वर्ण और आश्रम-धर्मके विरोधी जो अन्य पाखण्ड सुने जाते हैं, वे सब उस समय प्रकट होंगे और उनकी वृद्धि होगी। कलियुगमें स्त्री और पुत्रसे दुःख, शरीरका संहार, सदा रोगी रहना तथा पाप करनेमें आग्रह रखना आदि दोष क्रमशः बढ़ते ही जायँगे। राजन्! यद्यपि कलियुग समस्त दोषोंका भण्डार है, तथापि उसमें एक महान् गुण भी है, उसे सुनो—कलिकालमें थोड़े ही समय साधन करनेसे मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाते हैं।* सत्ययुग, त्रेता और द्वापर—इन तीन युगोंके लोग ऐसा कहते हैं कि जो मनुष्य कलियुगमें श्रद्धापरायण होकर वेदों, स्मृतियों और पुराणोंमें बताये हुए धर्मका अनुष्ठान करते हैं, वे धन्य हैं। त्रेतामें एक वर्षतक तथा
* कलेर्दोषनिधेश्चैव शृणु चैकं महागुणम्। यदल्पेन तु कालेन सिद्धिं गच्छन्ति मानवाः॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३५।१९५)