संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १५५
द्वापरमें एक मासतक क्लेशसहनपूर्वक धर्मानुष्ठान करनेवाले बुद्धिमान् पुरुषको जो फल प्राप्त होता है वह कलियुगमें एक दिनके अनुष्ठानसे मिल जाता है। राजन्! कलियुगमें भगवान् विष्णु और शिवकी नियमपूर्वक उपासना करनेवाले जितने मनुष्य सिद्धिको प्राप्त होते हैं, उतने अन्य युगोंमें तीन युगोंतक उपासना करनेसे प्राप्त होते हैं।*
राजन्! अट्ठाईसवें कलियुगमें जो कुछ होनेवाला है, उसे सुनो। कलियुगके तीन हजार दो सौ नब्बे वर्ष व्यतीत होनेपर इस भूमण्डलमें वीरोंका अधिपति शूद्रक नामवाला राजा होगा, जो चर्चिता नगरीमें आराधना करके सिद्धि प्राप्त करेगा। शूद्रक पृथ्वीका भार उतारनेवाला राजा होगा। तदनन्तर कलियुगके तीन हजार तीन सौ दसवें वर्षमें नन्दवंशका राज्य होगा। चाणक्य नामवाला ब्राह्मण उन नन्दवंशियोंका संहार करेगा और शुक्लतीर्थमें वह अपने समस्त पापोंसे छुटकारा पानेके लिये प्रायश्चित्तकी अभिलाषा करेगा। इसके सिवा कलियुगके तीन हजार बीस वर्ष निकल जानेपर इस पृथ्वीपर राजा विक्रमादित्य होंगे। वे नवदुर्गाओंकी सिद्धि एवं कृपासे राज्य पायेंगे और दीनोंका उद्धार करेंगे। तदनन्तर तीन हजारसे सौ वर्ष और अधिक बीतनेपर शक नामक राजा होगा। उसके बाद कलियुगके तीन हजार छः सौ वर्ष बीतनेपर मगधदेशमें हेमसदनसे अंजनीके गर्भसे भगवान् विष्णुके अंशावतार स्वयं भगवान् बुद्ध प्रकट होंगे, जो धर्मका पालन करेंगे। महात्मा बुद्धके अनेक उत्तम चरित्र स्मरणीय होंगे। अपने भक्तोंके लिये अपनी यशोगाथा छोड़कर वे स्वर्ग-लोकको चले जायेंगे, भक्तजन उन्हें सर्वपापाहारी बुद्ध कहेंगे। तत्पश्चात् कलियुगके चार हजार चार सौ वर्ष बीतनेपर चन्द्रवंशमें महाराज प्रमितिका प्रादुर्भाव होगा। वे बहुत बड़ी सेनाके अधिपति तथा अत्यन्त बलवान् होंगे। करोड़ों म्लेच्छोंका वध करके सब ओरसे पाखण्डका निवारण करते हुए केवल विशुद्ध वैदिक धर्मकी स्थापना करेंगे। महाराज प्रमितिका देहावसान गंगा-यमुनाके मध्यवर्ती क्षेत्र प्रयागमें होगा।
तत्पश्चात् किसी समय कालके प्रभावसे जब प्रजा अत्यन्त पीड़ित होने लगेगी, तब भयंकर अधर्मका आश्रय लेकर शठतापूर्ण बर्ताव करेगी। कोई बन्धन न रहनेके कारण सब लोग लोभसे व्याप्त हो झुंड-के-झुंड निकलकर एक-दूसरेको लूटेंगे और मारेंगे। सभी श्रमसे पीड़ित हो अत्यन्त व्याकुल रहेंगे। उस समय वैदिक और स्मार्त धर्म नष्ट हो जानेपर सब एक-दूसरेके आघातसे नष्ट होंगे। धार्मिक और सामाजिक मर्यादाका उल्लंघन करेंगे। सबमें करुणा, स्नेह और लज्जाका अत्यन्त अभाव हो जायगा। सभी लोग नाटे कदके होंगे, उनकी पूरी आयु पचीस वर्षकी होगी। उनके मन और इन्द्रियाँ विषादसे व्याकुल होंगी और वे घर तथा स्त्रीका परित्याग करके हाहाकार करते हुए बाहर भटकेंगे। वर्षा न होनेसे सबकी जीविका मारी जायगी और सब लोग दुःखी हो कृषि और पशुपालनका काम छोड़कर पर्वतोंपर रहने लगेंगे। अपना देश छोड़कर नदी और समुद्रके तटपर निवास करेंगे, पर्वतोंकी गुफाओंमें रहेंगे, अत्यन्त दुःखी हो मांस और मूल-फलसे जीवन-निर्वाह करेंगे। पुराने चीथड़े, वल्कल और पत्ते तथा मृगचर्म धारण करेंगे। सभी अकर्मण्य तथा आवश्यक साधनोंसे भी रहित होंगे। उस समय शाल्य नामक म्लेच्छ धर्मका विनाश करनेके लिये उन सबका संहार करेगा। उत्तम, मध्यम और अधम सब प्रकारकी श्रेणियोंका विनाश करके वह अत्यन्त भयंकर कर्म करनेवाला होगा। तब उसका वध करनेके लिये सम्पूर्ण जगत्के स्वामी साक्षात् भगवान् विष्णु सम्भलग्राममें श्रीविष्णुयशाके पुत्र होकर अवतीर्ण होंगे और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ जाकर उस 'शाल्य' नामवाले म्लेच्छका संहार
* त्रेतायां वार्षिको धर्मो द्वापरे मासिकः स्मृतः। यथा क्लेशं चरन् प्राज्ञस्तदह्ना प्राप्यते कलौ॥
युगत्रयेण तावन्तः सिद्धिं गच्छन्ति पार्थिव। यावन्तः सिद्धिमायान्ति कलौ हरिहरव्रताः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३५। ११७-११८)