संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अपनेको संसार-बन्धनसे मुक्त कर चुके हैं। इसलिये जिसका हार्दिक अनुराग जिस देवताके प्रति स्पष्टरूपसे प्रकट हो, वह उसीका भजन करे। इससे वह पापरहित हो सकता है, यही मेरा सर्वोत्तम मत है।१
करन्धमने पूछा—विप्रवर! वे कौनसे पाप हैं, जिनके द्वारा मोहित चित्तवाले मनुष्यका मन न तो देवतामें लगता है और न धर्ममें ही?
महाकालने कहा—राजन्! अपनी चित्तवृत्तियोंके भेदसे अधर्मके भेद जानने चाहिये। अधर्म तीन प्रकारके हैं—स्थूल, सूक्ष्म और अत्यन्त सूक्ष्म। ये ही अपने करोड़ों भेदोंके द्वारा अनेक प्रकारके हो जाते हैं। इनमेंसे जो स्थूल पापसमुदाय नरककी प्राप्ति करानेवाले हैं, उनका संक्षेपसे वर्णन किया जाता है। उन पापोंका अनुष्ठान मन, वाणी और कर्मोंद्वारा होता है। उनमेंसे मानसिक पापके चार भेद हैं,—पर-स्त्रीचिन्तन, दूसरोंके धन हड़प लेनेका संकल्प, अपने मनसे किसीका भी अनिष्टचिन्तन तथा न करनेयोग्य कार्योंके लिये मनमें आग्रह रखना। इसी प्रकार वाचिक पापकर्मके भी चार भेद हैं—असंगत वचन बोलना, झूठ बोलना, अप्रिय भाषण करना तथा दूसरोंकी निन्दा और चुगली करना। शारीरिक पापकर्म भी चार प्रकारके हैं—अभक्ष्य-भक्षण, हिंसा, मिथ्या भोगोंका सेवन तथा पराये धनका अपहरण।२ इस प्रकार मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले ये बारह प्रकारके पाप-कर्म बताये गये। इनके भेदोंका पुनः वर्णन करूँगा, जिनका फल अनन्त है। जो संसार-समुद्रसे तारनेवाले महादेवजीसे द्वेष रखते हैं, वे महान् पातकोंसे युक्त होनेके कारण नरकाग्नियोंमें जलते हैं। निरन्तर फल देनेवाले छः महापातक बताये जाते हैं—(१) जो मन्दिर आदिमें भगवान् शंकरको देखकर न तो नमस्कार करते हैं और (२) न उनकी स्तुति ही करते हैं, (३) अपितु भगवान्के सामने निःशंक हो मनमानी चेष्टा करते हुए खड़े होते और क्रीडा-विलास आदि करते हैं, (४) भगवान् शिव तथा गुरुजनके समीप पूजा, नमस्कार आदि आवश्यक शिष्टाचारोंका पालन नहीं करते, (५) शिवशास्त्रोंमें बताये हुए सदाचारको नहीं मानते, (६) और शिवभक्तोंसे द्वेष रखते हैं। ये छहों प्रकारके मनुष्य महापातकी समझे जाते हैं। जो पापात्मा अपने गुरुका, कष्टमें पड़े हुए व्यक्तिका, असमर्थ पुरुषका, विदेश गये हुए व्यक्तिका तथा शत्रुओंद्वारा अपमानित मनुष्यका परित्याग करता है अथवा उनके स्त्री-पुत्र एवं मित्रोंकी अवहेलना करता है, उसका यह कृत्य गुरुनिन्दाके समान महापातक समझना चाहिये। ब्रह्महत्यारा, मदिरा पीनेवाला, (सुवर्णकी) चोरी करनेवाला, गुरु-पत्नीगामी—ये चार महापातकी हैं। जो इनके पास संसर्ग रखता है, वह पाँचवाँ महापातकी है।३ जो लोग क्रोधसे, द्वेषसे, भयसे अथवा लोभसे ब्राह्मणपर उसके मर्मको अत्यन्त पीड़ा पहुँचानेवाले महान् दोषका आरोप करते हैं, वे ब्रह्महत्यारे कहे गये हैं। जो याचना करनेवाले अकिंचन ब्राह्मणको बुलाकर पीछे 'नहीं है' ऐसा कहते हुए देना अस्वीकार कर देता है, वह भी ब्रह्महत्या करनेवाला माना गया है। जो सभामें उदासीनभावसे बैठे हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणको अपने विद्या-अभिमानसे निस्तेज करनेकी चेष्टा करता है, वह ब्राह्मणघाती बताया गया है। जो गुरुजनोंके साथ बलपूर्वक विरोध करके अपने झूठे गुणोंका बखान
१- तस्माद्यस्य मनोरागो यस्मिन् देवे भवेत्स्फुटम्। स तं भजेद्विपापः स्यान्ममेदं मतमुत्तमम्॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १४)
२- परस्त्रीद्रव्यसंकल्पश्चेतसानिष्टचिन्तनम् । अकार्याभिनिवेशश्च चतुर्थं कर्म मानसम्॥
असम्बद्धप्रलापित्वमसत्यं चाप्रियं च यत्। परोपवादं पैशुन्यं चतुर्था कर्म वाचिकम्॥
अभक्ष्यभक्षणं हिंसा मिथ्याकामस्य सेवनम्। परस्वानामुपादानं चतुर्था कर्म कायिकम्॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १८–२०)
३- ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः। महापातकिनस्त्वेते तत्संसर्गी च पञ्चमः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। २८)