भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 188
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १५९ ---|---

करते हुए अपने-आपको उत्कृष्ट सिद्ध करना चाहता है, उसे भी ब्रह्महत्यारा कहा गया है। भूख-प्याससे जिनके शरीरको संताप हो रहा है, अतएव जो भोजन करनेके इच्छुक हैं, ऐसे ब्राह्मणोंके भोजनमें जो विघ्न डालता है, उसे ब्राह्मणघाती कहते हैं। जो सबकी चुगली करता है, सब लोगोंके छिद्र ढूँढ़नेमें ही लगा रहता है, सबके मनमें उद्वेग पैदा करता है तथा जिसमें क्रूरता भरी हुई है, ऐसा मनुष्य ब्रह्महत्यारा माना गया है। जो प्याससे पीड़ित हो जल पीनेके लिये जलाशयपर जाती हुई गौओंके मार्गमें विघ्न उपस्थित करता है, उसे गोघाती कहते हैं। ब्राह्मणोंने न्यायपूर्वक जिस धनका उपार्जन किया है, उसे छल-बलसे हर लेना ब्रह्महत्याके समान माना गया है।

माता-पिताका त्याग करना, झूठी गवाही देना, अपने मित्रका वध करना, अभक्ष्य-भक्षण करना, किसी स्वार्थवश वनजन्तुओंका वध करना, क्रोधमें आकर गाँव, वन और गोशालाओंमें आग लगा देना इत्यादि बड़े भयानक पाप मदिरापानके समान माने गये हैं। दरिद्र मनुष्योंका सर्वस्व हर लेना; मनुष्य, स्त्री, हाथी और घोड़ोंको चुरा लेना; गौ, भूमि, रत्न, सुवर्ण, ओषधियोंके रस, चन्दन, अगुरु, कपूर, कस्तूरी तथा रेशमी वस्त्रोंका अपहरण करना तथा हाथमें दी हुई धरोहरको हड़प लेना आदि पाप सुवर्णकी चोरीके समान माने गये हैं। पुत्र और मित्रकी स्त्रियों तथा बहिनोंके साथ सम्भोग करना, कन्याके साथ व्यभिचारका दुःसाहस करना, चाण्डालकी स्त्रियोंको अपने उपभोगमें लाना तथा अपने समान वर्णवाली स्त्रीके साथ भी व्यभिचार करना गुरुपत्नीगमनके समान माना गया है।

अहंकार, अधिक क्रोध, पाखण्ड, कृतघ्नता, अत्यन्त विषयासक्ति, कृपणता, शठता, ईर्ष्या तथा बिना किसी अपराधके ही पुत्र, मित्र, पत्नी, स्वामी और सेवकोंका परित्याग करना; साधु, बन्धु, तपस्वी, गाय, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री और शूद्रोंको मारना-पीटना, भगवान् शिवके आवास-स्थानपर लगे हुए वृक्षों और पुष्पवाटिका आदिको नष्ट करना, जो यज्ञके अधिकारी नहीं हैं, उनका यज्ञ कराना, जिनसे याचना करनी उचित नहीं, उनसे याचना करना; यज्ञ, बगीचा, पोखरा, पत्नी और सन्तानको बेचना; तीर्थयात्रा, उपवास, व्रत तथा मन्दिरनिर्माण आदिके पुण्योंका विक्रय करना; स्त्रीके धनसे जीविका चलाना, स्त्रियोंके अत्यन्त वशीभूत रहना, स्त्रियोंकी रक्षा न करना, ऋण न चुकाना, झूठ बोलकर जीविका चलाना, साध्वी कन्याकी बातोंमें दोष निकालना, विष तथा मारणयन्त्रोंका प्रयोग करना, किसीका मूलोच्छेद कर डालना, उच्चाटन एवं अभिचार कर्म करना, राग और द्वेषके कार्य करना, समयपर संस्कार न कराना, स्वीकार किये हुए व्रतका परित्याग करना, सब प्रकारके आहारोंका सेवन करना, असत्-शास्त्रोंके अनुसार चलना, सूखे तर्कका सहारा लेना; देवता, अग्नि, गुरु, साधु, गौ, ब्राह्मण, राजाओं तथा चक्रवर्ती नरेशोंकी उनके सामने या परोक्षमें निन्दा करना—ये सब उपपातक हैं। जिन्होंने श्राद्ध और देवयज्ञका परित्याग कर दिया है, अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंको सर्वथा छोड़ दिया है; जो दुराचारी, नास्तिक, पापी और सदा झूठ बोलनेवाले हैं; जो पर्वके समय अथवा दिनमें, जलमें, विपरीत योनिमें, पशु-योनिमें, रजस्वलाओंमें अथवा अयोनिमें मैथुन करता है; जो सबसे अप्रिय बोलते हैं, क्रूर हैं, प्रतिज्ञाको तोड़नेवाले हैं, तालाब और कुँओंको नष्ट करनेवाले हैं; जो रसका विक्रय करते हैं तथा एक ही पंक्तिमें बैठे हुए लोगोंको भोजन कराते समय पंक्ति-भेद करते हैं, वे लोग इन सभी पापोंके कारण उपपातकी माने गये हैं।

जो इनकी अपेक्षा कुछ न्यून श्रेणीके पापोंसे युक्त हैं, वे पापी कहलाते हैं। अब उनका वर्णन