भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 189
१६०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सुनो। जो गौ, ब्राह्मण, कन्या, स्वामी, मित्र तथा तपस्वीजनोंके कार्योंमें अन्तर डालते हैं, वे पापी माने गये हैं। जो दूसरोंकी सम्पत्तिसे जलते हैं, नीच जातिकी स्त्रीका सेवन करते हैं, गोशाला, अग्नि, जल, सड़क तथा वृक्षोंकी छायामें, वृक्षोंपर, बगीचों और मन्दिरोंमें जो लोग मल-मूत्र आदिका त्याग करते हैं, वे पापी हैं। मतवाले होकर किलकारियाँ भरते हैं; वंचकवेष, वंचनापूर्ण कार्य तथा वंचकोंके-से आचरण करते हैं; झूठ और कपटके ही व्यवहारमें लगे रहते हैं, कपटपूर्ण शासन करते हैं और कूटनीतिका आश्रय लेकर युद्ध करते हैं, वे सब पापी हैं। जो अपने सेवकोंके प्रति अत्यन्त निष्ठुर और पशुओंका दमन करनेवाला (उनके अण्डकोष छेदन करनेवाला) है; जो झूठी बातें बोलता और स्त्री, पुत्र, मित्र, बाल, वृद्ध, दुर्बल, रोगी, भृत्यवर्ग, अतिथिवर्ग तथा भाई-बन्धुओंको भूखे छोड़कर अकेला ही भोजन करता है; स्वयं तो मिठाई खाता और ब्राह्मणोंको दूसरी वस्तुएँ देता है, उसका पाक व्यर्थ जानना चाहिये, अर्थात् उसके किये हुए दान और यज्ञ आदिका कोई फल नहीं मिलता, वह ब्रह्मवादी विद्वानोंद्वारा निन्दित होता है। जो अजितेन्द्रिय मनुष्य स्वयं ही कोई नियम लेकर फिर उन्हें त्याग देते हैं, प्रतिदिन गौओंको मारते और उन्हें बार-बार त्रास देते हैं, जो दुर्बलोंका पोषण नहीं करते, पशुओंके ऊपर अधिक भार लादकर उन्हें पीड़ा देते हैं, उनकी पीठमें घाव हो जानेपर भी उन्हें सवारीमें जोतते हैं, उनको भोजन न देकर स्वयं खाते हैं और रोगी होनेपर भी उनकी दवा नहीं करते, वे सब पापी हैं। जो सामुद्रिक शास्त्रको जीविकाका साधन बनाता है, शूद्रकुलमें उत्पन्न स्त्रीको अपनी भार्या बनाकर रखता है और जो धर्मात्मा होनेका ढोंग रचता है, वे सब-के-सब पापी माने गये हैं। जो राजा शास्त्रीय आज्ञाका उल्लंघन करके प्रजासे मनमाना कर लेता है, सदा दण्ड देनेकी ही रुचि रखता है अथवा जो अपराधीको भी दण्ड देनेकी रुचि नहीं रखता तथा जिसके राज्यमें प्रजा घूस लेनेवाले अधिकारियों और चोरोंसे पीड़ित होती है, वह नरककी आगमें पकाया जाता है। जो चोरीसे दूर रहनेवालेको चोर समझता है और वास्तविक चोरको चोर नहीं मानता, वह आलस्यदोषसे दूषित तथा दुर्व्यसनोंमें आसक्त राजा नरकमें जाता है। १ पुराणवेत्ता विद्वान् इस प्रकारके और भी बहुत-से पाप बताते हैं। दूसरोंकी कोई भी वस्तु, वह सरसोंके बराबर भी छोटी क्यों न हो, अपहरण करनेपर मनुष्य पापी एवं नरकमें गिरनेका अधिकारी होता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। इस प्रकारके पाप बन जानेपर मनुष्य प्राणत्यागके पश्चात् नरकका कष्ट भोगनेके लिये पूर्वशरीरकी ही भाँति एक यातनादेह प्राप्त करता है। अतः नरकमें डालनेवाले इन तीनों ही प्रकारके पापकर्मों २को त्याग देना चाहिये और श्रद्धापूर्वक भगवान् सदाशिवकी शरण लेनी चाहिये। संसर्गवश, कौतूहलवश अथवा लोभसे भी भगवान् शंकरके प्रति किये हुए नमस्कार, स्तुति, पूजा तथा नाम-संकीर्तन कभी विफल नहीं होते।


१. यश्च शास्त्रमतिक्रम्य स्वेच्छया चाहरेत्करम्। सदा दण्डरुचिर्यश्च यो वा दण्डरुचिर्न हि॥
उत्कोचकैरधिकृतैस्तस्करैश्च प्रपीड्यते। यस्य राज्ञः प्रजा राष्ट्रे पच्यते नरकेषु सः॥
अचौरं चौरवत्पश्येच्चौरं वाचौररूपिणम्। आलस्योपहतो राजा व्यसनी नरकं व्रजेत्॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। ७२-७५)

२. स्थूल, सूक्ष्म और अत्यन्त सूक्ष्म अथवा महापातक, उपपातक तथा सामान्य पाप—ये ही त्रिविध पाप हैं।