भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 190
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * । १६१

शिवपूजाकी विधि तथा सदाचारका निरूपण

करन्धम बोले—ब्रह्मन्! आप भगवान् शंकरकी पूजाका विधान संक्षेपसे बतानेकी कृपा करें, जिसका पालन करनेसे मनुष्य शिवके पूजनका पूरा फल प्राप्त कर सके।

महाकालने कहा—राजन्! सदा प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और सायंकालमें भगवान् शंकरका भजन करे। उनके दर्शन और स्पर्शसे मनुष्य निश्चय ही कृतार्थ हो जाता है। पहले स्नान करे अथवा यदि रोग आदि संकटसे ग्रस्त हो, तो केवल भस्मस्नान करे अथवा कण्ठतक जलसे स्नान करे। यह भी सम्भव न हो, तो केवल मन्त्रस्नान ही कर ले। स्नानके पश्चात् ऊनी वस्त्र पहने अथवा श्वेत वस्त्र धारण करे या किसी रंगमें रँगा हुआ नवीन वस्त्र पहने। मैला अथवा सिला हुआ वस्त्र न धारण करे। धौत वस्त्रके अतिरिक्त उत्तरीय वस्त्र भी धारण करना चाहिये, अन्यथा उसके बिना पूजन निष्फल होता है। जो पुरुष ललाटमें, हृदयमें और दोनों कंधोंपर भस्मका त्रिपुण्ड्र धारण करके प्रसन्नतापूर्वक महादेवजीकी पूजा करता है, वह अल्पकालमें भगवान् शिवका दर्शन पाता है। उपासक अपने सब दोषोंको मनसे निकालकर भगवान् शिवके मन्दिरमें प्रवेश करे। प्रवेश करके पहले महादेवजीको प्रणाम करे। तदनन्तर मन्दिरके गर्भगृहमें प्रवेश करे, फिर हाथ-पैर धोकर मन-ही-मन भगवान्‌का चिन्तन करते हुए उनके श्रीविग्रहपर चढ़े हुए निर्माल्यको हटावे। जो भगवान् शिवके मन्दिरमें भक्तिपूर्वक मार्जन करने (झाडू देने)-का कार्य करता है, भगवान् शंकर भी उसके अन्तःकरणका मार्जन (शोधन) कर देते हैं। तत्पश्चात् स्वच्छ जलसे गडुवोंको भर ले। सभी गडुवे बराबर और सुन्दर होने चाहिये। उनमें कोई छेद न रहे, वे फूटे न हों, सबकी बनावट अच्छी हो, सभी वस्त्रसे छाने हुए जलसे परिपूर्ण हों, उन्हें चन्दन और धूपसे सुवासित किया गया हो; ‘ॐ नमः शिवाय’ इस षडक्षर मन्त्रका जप करते हुए उन गडुवोंको धोया गया, भरा गया और लाया गया हो, ऐसे एक सौ आठ गडुवोंका जुगाड़ कर ले। इतना न हो तो अट्ठाईस अथवा अठारह गडुवोंका प्रबन्ध करे। कम-से-कम चार गडुवे अवश्य रखे, इतनेसे कम न करे। दूध, दही, घी, शहद तथा ईखका रस—इन सब सामग्रियोंको एकत्र करके भगवान् शिवके वामभागमें रख दे। तदनन्तर बाहर निकलकर पहले प्रतिहारों (द्वारपालों)-की पूजा करे, उन सबके वाचक मन्त्र क्रमशः बतलाये जाते हैं— ‘ॐ गं गणपतये नमः, ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नमः, ॐ गुं गुरुभ्यो नमः’ इन तीन मन्त्रोंसे आकाशमें पूजन-सामग्री समर्पित करे। तत्पश्चात् चारों दिशाओंमें क्रमशः कुलदेवता, नन्दी, महाकाल और धाता-विधाताकी पूजा करे, इनकी पूजाके मन्त्र इस प्रकार हैं— ‘ॐ कुं कुलदेवतायै नमः, ॐ नं नन्दिने नमः, ॐ मं महाकालाय नमः, ॐ धां धात्रे विधात्रे नमः।’

इस प्रकार बाहर पूजा करनेके पश्चात् भीतर प्रवेश करके शिवलिंगसे कुछ दक्षिण भागमें पवित्रतापूर्वक उत्तराभिमुख होकर बैठे। शरीरको समभावसे रखते हुए आसनपर आसीन हो क्षणभर भगवान्‌का ध्यान करे। कमलके आकारका सूर्यमण्डल है, उसके मध्यभागमें चन्द्रमण्डलकी स्थिति है, उसके भी मध्यभागमें अग्निमण्डल है जो धर्म* आदिसे घिरा हुआ है। इस प्रकार अग्निमण्डलका चिन्तन करके उसके मध्यभागमें विश्वरूप भगवान्


* धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य।