संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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शंकरका भावनाद्वारा साक्षात्कार करे। भगवान् शिव अपनी वामा और ज्येष्ठा आदि शक्तियोंसे संयुक्त हैं। उनके पाँच मुख और दस भुजाएँ हैं, प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र शोभा पा रहे हैं, उनके मस्तक चन्द्रमासे विभूषित हैं, भगवान्के वामांगमें गिरिराजनन्दिनी भगवती उमा विराजमान हैं तथा सिद्धगण बारंबार उनकी स्तुति कर रहे हैं। इस प्रकार भगवान् शिवका ध्यान करे।
राजन्! ध्यानके पश्चात् शंकरजीकी सेवामें पाद्य और अर्घ्य निवेदन करे। जल, अक्षत, कुशा, चन्दन, पुष्प, सरसों, दूध, दही और मधु—ये अर्घ्यके नौ अंग बताये गये हैं; इन सबको एकत्र करके अर्घ्य देना चाहिये। तत्पश्चात् श्रद्धासे आर्द्रचित्त हो शिवलिंगको स्नान कराना आरम्भ करे। पहले गडुवा हाथमें लेकर स्नान करावे, आधे गडुवेसे शिवलिङ्गको पहले नहलावे, फिर हाथसे रगड़कर मैल साफ करे, पुन: गडुवेके समूचे जलसे स्नान करावे, स्नानके पश्चात् पूजन करे और धूप दे। इसके बाद भक्तिपूर्वक भगवान् शिवको प्रणाम करके मूलमन्त्रसे उन्हें स्नान करावे। 'ॐ हूं विश्वमूर्तये शिवाय नम:' यह द्वादशाक्षर मूलमन्त्र है। इसी मूलमन्त्रसे जल और धूपसे किये हुए पूजनके अतिरिक्त जल, दूध, दही, मधु, घृत और ईखके रसद्वारा पृथक्-पृथक् स्नान करावे। फिर सब गडुवोंके जलसे स्नान करावे। तदनन्तर गन्ध-द्रव्योंका लेपन करके श्रीविग्रहका रूखापन दूर करे। रूखापन दूर करके पुनः नहलावे और चन्दनका लेप करे। तत्पश्चात् भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे पूजन करे। उसकी विधि सुनो। आधार-पीठके अग्निकोणवाले पायेमें 'ॐ धर्माय नमः' इस मन्त्रसे धर्मकी पूजा करे, नैर्ऋत्य कोणवाले पायेमें 'ॐ ज्ञानाय नमः' इस मन्त्रके द्वारा ज्ञानका पूजन करे; इसी प्रकार वायव्य कोणमें 'ॐ वैराग्याय नमः', ईशान कोणवाले पायेमें 'ॐ ऐश्वर्याय नमः', पूर्व दिशावाले पायेमें 'ॐ अधर्माय नमः', दक्षिणमें 'ॐ अज्ञानाय नमः', पश्चिममें 'ॐ अवैराग्याय नमः', उत्तरमें 'ॐ अनैश्वर्याय नमः'—इन मन्त्रोंद्वारा क्रमशः वैराग्य आदिकी पूजा करे। फिर कमलकी कर्णिकामें ही अनन्त आदिकी इन मन्त्रोंसे पूजा करे— ॐ अनन्ताय नमः, ॐ पद्माय नमः, ॐ अर्कमण्डलाय नमः, ॐ सोममण्डलाय नमः, ॐ वह्निमण्डलाय नमः, ॐ वामाज्येष्ठादिपञ्चमन्त्रशक्तिभ्यो नमः, ॐ परमप्रकृत्यै देव्यै नमः। इसके बाद ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात नामक पाँच मुखोंवाले, रुद्र-साध्य-वसु-आदित्य तथा विश्वेदेवादि देवस्वरूप, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुजरूप स्थावर-जंगम मूर्ति परमेश्वर एवं विश्वमूर्ति शिवका नमस्कारपूर्वक पूजन करे। मन्त्र इस प्रकार है—
ॐ ईशान तत्पुरुषाघोरवामदेव-सद्योजातपञ्चवक्त्राय रुद्रसाध्यवस्वादित्य-विश्वेदेवादिदेवरूपायाण्डजस्वेदजोद्भिज्जजरायुज-रूपस्थावरजङ्गममूर्तये परमेश्वराय ॐ हूं विश्वमूर्तये शिवाय नमः।
तत्पश्चात् 'ॐ त्रिशूलधनुःखड्गपालकुठारेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे त्रिशूल आदिकी पूजा करे। तदनन्तर जलाधारके मुखभागमें 'ॐ चण्डीश्वराय नमः' इस मन्त्रके द्वारा चण्डीश्वरकी पूजा करे।
इस प्रकार विधिपूर्वक पूजन करके भगवान् शिवको अर्घ्य निवेदन करे। 'हे महादेवजी! जल, अक्षत, फूल और इन उत्तम फलोंसे युक्त यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये, पूजाकी पूर्तिके लिये मैं इसे समर्पित करता हूँ।' इस प्रकार अर्घ्य देनेके पश्चात् यदि अपनेमें शक्ति हो तो धनके द्वारा भी भगवान्का पूजन करे। इसके बाद क्रमशः धूप, दीप और नैवेद्य निवेदन करे, घण्टा बजावे और आरती करे। देवाधिदेव महादेवजीके ऊपर शंख आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ आरती घुमानी चाहिये। जो देवाधिदेव