संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १६३
त्रिशूलधारी भगवान् शिवकी आरतीका दर्शन करता है, वह समस्त पातकोंसे मुक्त हो जाता है। फिर जो स्वयं ही भगवान्की आरती उतारेगा, उसके लिये तो कहना ही क्या है। जो भगवान् शिवके समीप नृत्य, संगीत तथा वाद्य—इन तीनोंका आयोजन करता है, उसपर भगवान् शिव बहुत सन्तुष्ट होते हैं; क्योंकि गीत और वाद्यका फल अनन्त होता है। तदनन्तर अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा महादेवजीकी स्तुति करके दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर प्रणाम करे और देवेश्वर शिवसे अपने अपराधोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करते हुए कहे—‘भगवान्! मुझसे जो सुकृत अथवा दुष्कृत हुआ है उसके लिये आप क्षमा करें।’
जो इस प्रकार भगवान् शंकरका विशेषतः इस महाकाललिंगका पूजन करता है, वह अपने पिता, पितामह और प्रपितामहका सब पापोंसे उद्धार करके चिरकालतक रुद्रलोकमें निवास करता है। इस विधिसे भगवान् महेश्वरका उपासक होकर और सदाचारमें स्थित रहनेका व्रत लेकर जो मनुष्य बन्धनसे छूटनेके लिये तन्मय होकर भगवान् शिवका पूजन करता है, वह सब पापोंसे छूटकर शिवलोकमें जाता है। जो इस प्रकार भगवान् शंकरकी पूजा करता है, उसने मानो समस्त संसारको तृप्त कर दिया। किंतु राजन्! यह सब पूजन उसीका सफल होता है, जो कभी सदाचारका उल्लंघन नहीं करता है। आचारसे धर्म सफल होता है, आचारसे ही मनुष्य स्वर्गका सुख भोगता है, आचारसे आयु प्राप्त होती है तथा आचार अशुभ लक्षणोंको नष्ट कर देता है। जो इस जगत्में सदाचारका उल्लंघन करके स्वेच्छाचारपूर्ण बर्ताव करता है, उस मनुष्यके यज्ञ, दान और तप इस लोकमें कल्याणकारक नहीं होते।<sup>१</sup> अतः सदाचारका भी कुछ संक्षिप्त परिचय दूँगा, उसे सुनो। गृहस्थको धर्म, अर्थ और काम—इन तीनोंके साधनके लिये यत्न करना चाहिये। इनकी सिद्धि होनेपर गृहस्थ पुरुषके लिये इहलोक और परलोकमें भी सिद्धि प्राप्त होती है।
ब्राह्ममुहूर्तमें उठे। उठकर धर्म और अर्थका चिन्तन करे। तत्पश्चात् शय्यासे उठकर मलत्यागके बाद कुल्ला-दाँतून कर ले। फिर स्नान करके द्विज सन्ध्योपासना करे। विद्वान् द्विजको उचित है कि वह शान्तचित्त, संयमी तथा पवित्र होकर पूर्व-सन्ध्याकी उपासना उस समय प्रारम्भ करे जब कि प्रातःकाल आकाशके तारे अभी कुछ दिखायी देते हों तथा पश्चिम-सन्ध्या सूर्यास्त होनेसे पहले ही प्रारम्भ करे। इस प्रकार न्यायपूर्वक सन्ध्योपासना करता रहे। आपत्ति कालके सिवा कभी भी सन्ध्या-कर्मका परित्याग नहीं करना चाहिये। राजन्! झूठ, असत्-प्रलाप तथा कठोरभाषण सदाके लिये त्याग दे। दुष्ट पुरुषोंकी सेवा, नास्तिकवाद तथा असत्-शास्त्रोंको भी सदाके लिये छोड़ दे।<sup>२</sup> दर्पणमें मुँह देखना, दाँतून करना, बाल सँवारना और देवताओंकी पूजा करना—इन सब कार्योंको महर्षियोंने पूर्वाह्नमें
१- आचारात् फलते धर्मो ह्याचारात् स्वर्गमश्नुते। आचाराल्लभते चायुराचारो हन्त्यलक्षणम्॥
यज्ञदानतपांसीह पुरुषस्य न भूतये। भवन्ति यः सदाचारं समुल्लङ्घ्य प्रवर्तते॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १२३—१२५)
२- ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चापि चिन्तयेत्। समुत्थाय त्वथाचम्य दन्तधावनपूर्वकम्॥
सन्ध्यामुपासीत बुधः शान्तान्तः प्रयतः शुचिः। पूर्वा सन्ध्यां सनक्षत्रां पश्चिमां सदिवाकराम्॥
उपासीत यथान्यायं नैनां जह्यादनापदि। वर्जयेदनृतं चासत् प्रलापं परुषं तथा॥
असत्सेवामसद्वादस्त्वसच्छास्त्रं च पार्थिव।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १२७—१३०)