भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


करनेयोग्य बताया है। पलाशकी लकड़ीका आसन, खड़ाऊँ और दाँतून भी वर्जित हैं। विद्वान् पुरुष आसनको पैरसे न खींचे। एक ही साथ जल और अग्निको न ले जाय। गुरु, देवता तथा अग्निके सम्मुख पाँव न फैलावे। चौराहा, चैत्यवृक्ष, देवालय, संन्यासी, विद्यामें बढ़े हुए पुरुष, गुरु तथा वृद्धजन—इन सबको अपने दाहिने करके चलना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुषको आहार, विहार और मैथुन ओटमें रहकर ही करने चाहिये। इसी प्रकार अपनी वाणी और बुद्धिकी शक्ति, तपस्या, जीविका तथा आयुको अत्यन्त गुप्त रखना चाहिये।^१ दिनमें उत्तर दिशाकी ओर मुँह करके मल और मूत्रका त्याग करना चाहिये तथा रातमें दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके करना चाहिये। ऐसा करनेसे आयु नहीं घटती। अग्नि, सूर्य, गौ, व्रतधारी पुरुष, चन्द्रमा और जलके सम्मुख तथा सन्ध्याके समय मल-मूत्र त्याग करनेवाले मनुष्यकी बुद्धि नष्ट होती है।^२ भोजन, शयन, स्नान, मल-मूत्रका त्याग तथा सड़कोंपर भ्रमण करनेपर दोनों हाथ, दोनों पैर और मुँह इन पाँचोंको भलीभाँति धोकर आचमन करे। नदीमें, श्मशान-भूमिमें, राखपर, गोबरपर, जोते-बोये हुए खेतमें तथा हरी-भरी घासवाली भूमिमें मल-मूत्रका त्याग न करे। बुद्धिमान् पुरुष कुएँ आदिसे निकाले हुए जलके द्वारा ही शौचक्रिया करे। जलके भीतरसे, देवस्थानसे, बाँबीसे और चूहोंके स्थानसे निकाली हुई तथा शौचावशिष्ट फेंकी हुई—इन पाँच प्रकारकी मिट्टियोंको त्याग दे। विद्वान् पुरुष हाथको उतना ही धोये जितनेसे मलकी गन्ध और लेप दूर हो जाय। अपने-आपको ताड़ना न दे, दुःखमें न डाले, दोनों हाथोंसे अपना सिर न खुजलावे, स्त्रीकी रक्षा करे, उसके प्रति अकारण ईर्ष्या छोड़ दे, भगवान् सूर्यको अर्घ्य दिये बिना कोई कर्म न करे, प्राणियोंसे द्रोह न करके मनमें भगवान् शंकरका चिन्तन करते हुए धनका उपार्जन करे। अत्यन्त कृपण न होवे, किसीके प्रति ईर्ष्या न रखे, कृतघ्न न होवे, दूसरोंसे द्रोह पैदा करनेवाले कार्यमें मन न लगावे, हाथ-पैरसे चंचल न हो, नेत्रोंसे भी चपलता न सूचित करे, सरल भावसे रहे, वाणीसे अथवा अंगोंकी चेष्टाओंसे भी अपनी चपलताका परिचय न दे, अशिष्ट पुरुषका संग न करे, व्यर्थ विवाद और अकारण वैर न करे, साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंसे अपना मनोरथ सिद्ध करे। दण्डका आश्रय तो तभी लेना चाहिये जब उसके सिवा दूसरा कोई उपाय न रह जाय। फटा-टूटा आसन, टूटी खाट और फूटे बर्तनको त्याग दे। नृपश्रेष्ठ! अग्नि और शिवलिंग—इन दोनोंके बीचसे न निकले। दो अग्नि, दो ब्राह्मण, पति और पत्नी, सूर्य और चन्द्रमाकी प्रतिमा तथा भगवान् शंकर और नन्दिकेश्वर-वृषभ इनके बीचमें होकर न जाय; क्योंकि इनके बीचसे जानेवाला मनुष्य पापका भागी होता है। विद्वान् पुरुष एक वस्त्र धारण करके न तो भोजन करे, न अग्निमें आहुति दे, न ब्राह्मणोंकी पूजा करे और न देवताओंकी अर्चना ही करे। कूटना, पीसना,


१- पादौ प्रसारयेन्नैव गुरुदेवाग्निसम्मुखे। चतुष्पथं चैत्यतरुं देवागारं तथा यतिम्॥
विद्याधिकं गुरुं वृद्धं कुर्यादेतान् प्रदक्षिणान्।
आहारनीहारविहारयोगास्सुसंवृता धर्मविदानुकार्याः।
वाग्बुद्धिवीर्याणि तपस्तथैव दानायुषी गुप्ततमे च कार्ये॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १३३–१३५)

२- उभे मूत्रपुरीषे तु दिवा कुर्यादुदङ्मुखः। दक्षिणाभिमुखो रात्रौ ह्येवमायुर्न रिष्यते॥
प्रत्यग्निं प्रतिसूर्यञ्च प्रतिगां व्रतिनं प्रति। प्रतिसोमोदकं सन्ध्यां प्रज्ञा नश्यति मेहतः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १३६-१३७)