भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 194
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १६५

झाडू देना, पानी छानना, राँधना, भोजन करना, सोना, उठना, जाना, छींकना, कार्यारम्भ करना, कार्यको समाप्त करना, मुँहसे अप्रिय वचन निकल जाना, पीना, सूँघना, स्पर्श करना, सुनना, बोलनेकी इच्छा करना, मैथुन करना तथा शौच कर्म—इन बीस कार्योंके होते या करते समय जो सदा भगवान् शंकरका नाम स्मरण करता है, उसीको शिवभक्त जानना चाहिये; शेष दूसरे लोग नाममात्रके शिवभक्त कहे गये हैं। शिवजीको प्रत्येक कार्यमें स्मरण करनेवाला वह शिवभक्त निश्चय ही शिव-स्वरूप होकर अन्तमें शिवको ही प्राप्त होता है।

विद्वान् पुरुष परायी स्त्रीसे बातचीत न करे; यदि कभी आवश्यकतावश उनसे वार्तालाप करे तो माताजी ! बहिनजी ! बेटी ! अथवा आर्ये ! इस प्रकार सम्बोधन करके बोले। हाथ और मुँह जूठे हों तो कोई बात न करे और न किसी वस्तुका स्पर्श ही करे। उच्छिष्ट दशामें सूर्य, चन्द्रमा, तारे, देवता और अपने मस्तककी ओर देखना भी मना है। बहन, बेटी अथवा माताके साथ भी एकान्तमें न बैठे; क्योंकि इन्द्रिय-समुदाय दुर्जय होता है; उनसे विद्वान् पुरुष भी मोहमें पड़ जाते हैं।* यदि गुरुदेव घरपर आ जायँ तो उनके लिये स्वयं उठकर यत्नपूर्वक आसनकी व्यवस्था करे और चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करे। विद्वान् मनुष्य उत्तर और पश्चिमकी ओर सिर करके कभी न सोवे। सिरहानेकी ओर दक्षिण दिशा अथवा पूर्वदिशाको रखकर शयन करना चाहिये। रजस्वला स्त्रीका दर्शन-स्पर्श न करे, उसके साथ बातचीत भी नहीं करनी चाहिये। जलके भीतर मल-मूत्र और मैथुन न करे। भगवान् शिवके भक्तको चाहिये कि वह अपने वैभवके अनुसार देवता, मनुष्य, ऋषि तथा पितरोंको उनका भाग समर्पित करके शेष अन्नका स्वयं भोजन करे। पवित्र हो आचमन करके पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके दोनों हाथोंको घुटनोंके भीतर रखकर मौन भावसे भोजन करे। उस समय भोजनमें ही मन लगाये रहे और अन्नके दोषकी चर्चा न करे। यदि वह अन्न किसी उच्छिष्ट आदि दोषसे दूषित हो गया हो तो उस दोषके प्रकट करनेमें कोई हानि नहीं है, ऐसे दोषके अतिरिक्त किसी अन्य दोषकी चर्चा नहीं करनी चाहिये। नग्न होकर न तो स्नान करे, न सोवे और न चले ही। यदि गुरुके द्वारा कोई अनुचित कार्य भी हो जाय, तो उसे अन्यत्र न कहे, वे क्रोधमें हों तो उन्हें मनावे। दूसरे लोगोंके मुखसे भी गुरुकी निन्दा न सुने। सैकड़ों कार्य छोड़कर भी धर्मकी कथा-वार्ता सुने। प्रतिदिन धर्म-चर्चा श्रवण करनेवाला मनुष्य अपने अन्तःकरणको उसी प्रकार शुद्ध कर लेता है, जैसे नित्यप्रति झाडू देने अथवा सफाई करनेसे घर और दर्पण स्वच्छ होते हैं। सायंकाल और प्रातःकाल अतिथिकी पूजा करके भोजन करना चाहिये। दोनों सन्ध्याओंके समय सोना, पढ़ना और भोजन करना निषिद्ध है। सन्ध्याकालमें मोहवश भोजन करनेवाला मनुष्य शराबीके तुल्य माना जाता है। स्नान करके मनुष्य अपने बालोंको न फटकारे। मार्गमें छींकने और थूकनेपर अपने दाहिने कानका स्पर्श करे तथा मन-ही-मन समस्त प्राणियोंसे इस अपराधके लिये क्षमा माँगे। नीलका रँगा हुआ वस्त्र न पहने, कपड़ेको उलटा करके न पहने, मलिन वस्त्र त्याज्य है तथा जिसके कोर या किनारा न हो, ऐसा वस्त्र भी धारण करनेयोग्य नहीं है।

हाथ, मुँह और दोनों पैर धोकर आसनपर बैठे। दोनों हाथ घुटनोंके भीतर रखकर तीन


* स्वस्रा दुहित्रा मात्रा वा नैकान्तासनमाचरेत्। दुर्जयो हीन्द्रियग्रामो मुह्यते पण्डितोऽपि सन्॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३६।१५७)