संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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बार आचमन करे, दो बार मुँह पोछे। फिर जलसे मुँह, आँख, कान, नाक तथा अपने मस्तकका स्पर्श करे। पुनः दो बार आचमन करके सब कर्म करे। छींक और थूक आनेपर, दाँतमें अन्न आदि लगे रहनेपर तथा पतितोंके साथ बातचीत करनेपर अवश्य आचमन करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको सदा तीनों वेदोंका स्वाध्याय करना चाहिये तथा धर्मपूर्वक धनका उपार्जन करके आत्मकल्याणके लिये यत्नपूर्वक भगवान्का यजन करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि वह नीच श्रेणीके मनुष्योंके लिये भी कभी अनादरसूचक 'तू' का प्रयोग न करे। गुरुजनोंके लिये तू कह देना या उनका वध कर डालना दोनों बराबर है। सत्य बोले, मित्र-भावसे रहे, सदा ऐसी बात बोले जो दूसरोंको सान्त्वना देनेवाली हो। परलोकमें जो हितकर हो, उसी कार्यमें गम्भीर बुद्धिवाले पुरुषोंको अपना शरीर और मन लगाना चाहिये। स्वच्छ इन्द्रियोंवाले पुरुषोंको तीर्थस्नान, उपवास, व्रत, सत्पात्रको दिये गये दान, होम, जप, यज्ञ, शिव-पूजा तथा देवताओंकी विशेष पूजा आदिके द्वारा सदा अपने अन्तःकरणका शोधन करना चाहिये। राजन्! जिस कार्यको करते समय अपने आत्माको घृणा न हो तथा जो महात्मा पुरुषके लिये गोपनीय (छिपानेयोग्य) न हो, वह कार्य अनासक्तभावसे अवश्य करना चाहिये। यह मैंने तुमसे संक्षिप्तरूपमें सदाचारका किंचिन्मात्र वर्णन किया है। शेष बातें तुम्हें स्मृतियों और पुराणोंसे सुननी चाहिये। इस प्रकार भगवान् शिवकी प्रीतिके लिये धर्माचरण करनेवाले सद्गृहस्थको इहलोकमें धर्म, अर्थ और कामकी प्राप्ति होकर परलोकमें उसका परम कल्याण होता है।
**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! जब महाकालजी इस प्रकार भाँति-भाँतिके धर्मोंका उपदेश कर रहे थे, उस समय आकाशमें बड़ा भारी शब्द हुआ। तदनन्तर महाकाल भगवान् शिवके परमधामको चले गये। कुरुनन्दन! इस प्रकार इस महालिंगका आविर्भाव हुआ है। महाकालका यह कूप और सरोवर भी परम पवित्र एवं सिद्धिदायक है। कुन्तीनन्दन! जो मनुष्य यहाँ इस लिंगकी आराधनामें संलग्न होते हैं, महाकाल उन्हें अपने हृदयसे लगाकर भगवान् शिवकी सेवामें प्रस्तुत करते हैं। अर्जुन! इस प्रकार महीसागरसंगम तीर्थमें ये सात लिंग प्रकट हुए। जो श्रेष्ठ मानव इस प्रसंगको पढ़ते और सुनते हैं, वे भी धन्य हैं।
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नारदजीके द्वारा भगवान् वासुदेवकी स्थापना, ऐतरेयका अपनी मातासे संसारदुःखका वर्णन, भगवान्का प्रत्यक्ष प्रकट होकर ऐतरेयको वरदान देना तथा वासुदेवके ध्यानसे ऐतरेयकी मुक्ति
**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! तदनन्तर महीसागर-संगममें जब मैंने स्थानकी स्थापना कर ली, तब कालान्तरमें मन-ही-मन विचार किया कि यह तीर्थ भगवान् वासुदेवके बिना शोभा नहीं पा रहा है। ठीक उसी तरह, जैसे बिना सूर्यके संसार सुशोभित नहीं होता। भगवान् विष्णु भूषणके भी भूषण हैं। जिस तीर्थमें, जिस घरमें, जिस हृदयमें तथा जिस शास्त्रमें मेरे स्वामी भगवान् विष्णु नहीं हैं, वह सब असत् है। इसलिये वरदायक भगवान् पुरुषोत्तमको प्रसन्न करके सम्पूर्ण विश्वपर अनुग्रह करनेकी कामनासे इस तीर्थमें उन्हें साक्षात् कलासहित ले आऊँगा। ऐसा विचारकर मैं वहीं ठहर गया