संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १६७
और ज्ञानयोगके द्वारा योगीश्वर श्रीहरिको सन्तुष्ट करनेके लिये सौ वर्षोंतक आराधना करता रहा। सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने वशमें करके वासुदेवमय होकर सब प्राणियोंपर कृपा रखते हुए अष्टाक्षरमन्त्रके जपमें लगा रहा। इस प्रकार मेरे आराधना करनेपर गरुड़पर बैठे हुए भगवान् श्रीहरिने कोटि-कोटि गणोंके साथ आकर मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दिया। तब मैंने श्रीहरिको विधिपूर्वक अर्घ्य दे, प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़े हुए कहा—'प्रभो! पूर्वकालमें
श्वेतद्वीप नामक धाममें मैंने आपके अजन्मा, सनातन, नर-नारायणात्मक स्वरूपका दर्शन किया है। जनार्दन! उसी रूपकी एक कला यहाँ स्थापित कीजिये। भगवन्! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरी यह प्रार्थना स्वीकार करें।' मेरे इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् गरुड़ध्वजने कहा—'ब्रह्मपुत्र नारद! तुम्हारे हृदयमें जिस आकांक्षाका उदय हुआ है, वह उसी रूपमें पूर्ण हो। मुझे इस तीर्थमें सदैव निवास करना है।' यों कहकर श्रीविष्णु-प्रतिमामें अपनी कला स्थापित करके भगवान् विष्णु जब चले गये, तब मैंने सम्पूर्ण विश्वपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे उनके श्रीअर्चाविग्रहकी स्थापना की। अतः साक्षात् श्वेतद्वीपनिवासी श्रीहरि यहाँ विराजमान हैं, जो कि सबसे वृद्ध हैं, अतः वे इस तीर्थमें वृद्ध वासुदेवके नामसे विख्यात हुए हैं।
कार्तिकमासके शुक्लपक्षमें जो कल्याणमयी एकादशी आती है, उस दिन झरने अथवा नदी आदिके जलमें विधिपूर्वक स्नान करके जो पुरुष पंचोपचारद्वारा भक्तिभावसे श्रीहरिका पूजन करता है तथा उपवास और जागरण करते हुए श्रीहरिके आगे संगीत एवं वाद्यका आयोजन करता है, अथवा दम्भ और क्रोध त्याग कर श्रीविष्णुकी महिमा एवं लीलाकी कथा कहता है तथा मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए प्रसन्नचित्त हो यथाशक्ति दान देता है, वह ब्रह्महत्यारा क्यों न हो, अनेक जन्मोंकी समस्त पापराशिसे मुक्त हो जाता है। इसके सिवा वह अन्तमें गरुड़-सम्बन्धी विमानके द्वारा साक्षात् वैकुण्ठधामको प्राप्त होता है।
श्रद्धापूर्वक, प्रसन्नतापूर्वक, उत्साहके साथ, आन्तरिक अभिलाषासे, अहंकार छोड़कर, भगवान्को स्नान करा उन्हें धूप और चन्दन चढ़ाकर, पुष्प और नैवेद्य समर्पण करके, अर्घ्यदान देकर, प्रत्येक प्रहरमें अत्यन्त भक्तिभावसे भगवान्की आरती उतारकर, चँवर डुलानेका आनन्द लेते हुए, भेरी बजाते हुए, पुराण-कथा-श्रवणपूर्वक, भक्तियुक्त नृत्य करके, नींदसे दूर रहकर, क्षुधा-पिपासा तथा रसास्वादनकी इच्छासे रहित होकर, भगवच्चरणारविन्दोंकी सुगन्धको सूँघते हुए, भगवत्प्रिय रात्रि-संगीतका आयोजन करके, भगवत्तीर्थमें जाकर, प्राणायामपूर्वक, ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक, स्तोत्रपाठके साथ, भगवान्के चरणोदकको ग्रहण करते हुए, सत्यभाषणपूर्वक, सत्संगका लाभ उठाते हुए तथा पुण्यवार्ता (कथा-उपदेश आदि)-के सहित—इन पचीस विशेषताओंके साथ जो मनुष्य एकादशीकी