संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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रातमें भगवान्के समीप जागरण करता है, वह फिर इस भूमिमें जन्म नहीं लेता। पूर्वकालकी बात है। इस श्रेष्ठ तीर्थमें एक ऐतरेय नामक ब्राह्मण रहते थे। उन परम भाग्यशाली ब्राह्मण-देवताने यहीं भगवान् वासुदेवकी कृपासिद्धि प्राप्त की थी।
अर्जुनने पूछा—मुने! ऐतरेय किसके पुत्र थे? उनका निवास-स्थान कहाँ था? परम बुद्धिमान् ऐतरेयने किस प्रकार भगवान् वासुदेवके प्रसादसे सिद्धि प्राप्त की?
नारदजीने कहा—कुन्तीनन्दन! यहीं मेरे द्वारा स्थापित स्थानमें जो हारीत मुनि रहते थे, उन्हींके वंशमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण उत्पन्न हुए, जो माण्डूकि नामसे विख्यात थे। वे वेद-वेदांगोंके पारंगत पण्डित थे। उनके ‘इतरा' नामवाली पत्नी थी, जो नारीके समस्त सद्गुणोंसे सुशोभित थी। उसके गर्भसे जो पुत्र हुआ, उसीका नाम ‘ऐतरेय’ था। ऐतरेय बाल्यावस्थासे ही निरन्तर द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय )-का जप करता था, उसे पूर्वजन्ममें ही इस मन्त्रकी शिक्षा मिली थी। वह न तो किसीकी बात सुनता था न स्वयं कुछ बोलता था और न अध्ययन ही करता था। इससे सबको निश्चय हो गया कि यह बालक गूँगा है। पिताने अनेक उपायोंसे उसको समझाया—बोध कराया, परंतु उसने लौकिक व्यवहारमें कभी मन नहीं लगाया। यह देख पिताने भी यही निश्चय कर लिया कि यह सर्वथा जड़ है। तब उन्होंने पिंगा नामवाली दूसरी स्त्रीसे विवाह किया और उससे चार पुत्र उत्पन्न किये जो वेद-वेदांगोंके विद्वान् हुए।
ऐतरेय भी प्रतिदिन तीनों समय भगवान् वासुदेवके मन्दिरमें जाकर उस उत्तम मन्त्रका जप करने लगे। वे दूसरे किसी कार्यमें परिश्रम नहीं करते थे। एक दिन उनकी माता इतरा अपनी सौतके पुत्रोंकी योग्यता देखकर सन्तप्तचित्त हो अपने पुत्रसे बोली—‘अरे! तू तो मुझे क्लेश देनेके लिये ही पैदा हुआ! मेरे जन्म और जीवनको धिक्कार है! संसारमें उस नारीका जन्म निश्चय ही व्यर्थ है, जो पतिके द्वारा तिरस्कृत हो और जिसका पुत्र गुणवान् न हो। वत्स! मैं बड़ी खोटे भाग्यवाली हूँ, अतः महीसागरसंगममें डूब मरूँगी। मेरा मर जाना ही अच्छा है। जीवित रहनेमें मुझे क्या लाभ है? मेरे मर जानेपर तू भी भगवान्का महामौनी भक्त होकर दीर्घकालतक आनन्द भोगना।'
नारदजी कहते हैं—माताकी यह बात सुनकर ऐतरेय ठाठाकर हँस पड़े। वे बड़े धर्मज्ञ थे। उन्होंने दो घड़ी भगवान्का ध्यान करके माताके चरणोंमें प्रणाम किया और कहा—‘माँ! तुम झूठे मोहमें पड़ी हुई हो। अज्ञानको ही ज्ञान मान बैठी हो। शुभे! जो शोचनीय नहीं है, उसीके लिये तुम शोक करती हो और जो वास्तवमें शोचनीय है उसके लिये तुम्हारे मनमें तनिक भी शोक नहीं होता। यह संसार मिथ्या है। इसमें तुम इस शरीरके लिये क्यों चिन्तित एवं मोहित हो रही हो? यह तो मूर्खोंका काम है! तुम-जैसी विदुषी स्त्रियोंको यह शोभा नहीं देता! संसारमें सारतत्त्व तो कुछ और ही है, किंतु अज्ञानसे मोहित मनुष्य किसी और ही असार वस्तुको सार समझते हैं। तुम इस मानव-शरीरको यदि सार मानती हो तो लो, इसकी भी असारता सुनो। यह जो मानव-शरीर है, यह गर्भसे लेकर मृत्युपर्यन्त सदा अत्यन्त कष्टप्रद है। यह शरीर एक प्रकारका घर है। हड्डियोंका समूह ही इसके भारको सँभालनेवाला खम्भा है। नाडीजालरूपी रस्सियोंसे ही इसे बाँधा गया है। रक्त और मांसरूपी मिट्टीसे इसको लीपा गया है। विष्ठा और मूत्ररूपी द्रव्योंके संग्रहका यह पात्र है। केश और रोमरूपी तृणसे इसको छाया गया है। सुन्दर रंगकी त्वचासे इसके ऊपर रंग किया गया है। मुख ही इसका प्रधान द्वार है। दो आँख, दो कान और दो नाकके छिद्र—ये ही छः इसकी खिड़कियाँ हैं। दोनों ओष्ठ ही इसके द्वारको ढकनेवाले किंवाड़ हैं। दाँत ही अर्गला (किंवाड़