संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १६५
झाडू देना, पानी छानना, राँधना, भोजन करना, सोना, उठना, जाना, छींकना, कार्यारम्भ करना, कार्यको समाप्त करना, मुँहसे अप्रिय वचन निकल जाना, पीना, सूँघना, स्पर्श करना, सुनना, बोलनेकी इच्छा करना, मैथुन करना तथा शौच कर्म—इन बीस कार्योंके होते या करते समय जो सदा भगवान् शंकरका नाम स्मरण करता है, उसीको शिवभक्त जानना चाहिये; शेष दूसरे लोग नाममात्रके शिवभक्त कहे गये हैं। शिवजीको प्रत्येक कार्यमें स्मरण करनेवाला वह शिवभक्त निश्चय ही शिव-स्वरूप होकर अन्तमें शिवको ही प्राप्त होता है।
विद्वान् पुरुष परायी स्त्रीसे बातचीत न करे; यदि कभी आवश्यकतावश उनसे वार्तालाप करे तो माताजी ! बहिनजी ! बेटी ! अथवा आर्ये ! इस प्रकार सम्बोधन करके बोले। हाथ और मुँह जूठे हों तो कोई बात न करे और न किसी वस्तुका स्पर्श ही करे। उच्छिष्ट दशामें सूर्य, चन्द्रमा, तारे, देवता और अपने मस्तककी ओर देखना भी मना है। बहन, बेटी अथवा माताके साथ भी एकान्तमें न बैठे; क्योंकि इन्द्रिय-समुदाय दुर्जय होता है; उनसे विद्वान् पुरुष भी मोहमें पड़ जाते हैं।* यदि गुरुदेव घरपर आ जायँ तो उनके लिये स्वयं उठकर यत्नपूर्वक आसनकी व्यवस्था करे और चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करे। विद्वान् मनुष्य उत्तर और पश्चिमकी ओर सिर करके कभी न सोवे। सिरहानेकी ओर दक्षिण दिशा अथवा पूर्वदिशाको रखकर शयन करना चाहिये। रजस्वला स्त्रीका दर्शन-स्पर्श न करे, उसके साथ बातचीत भी नहीं करनी चाहिये। जलके भीतर मल-मूत्र और मैथुन न करे। भगवान् शिवके भक्तको चाहिये कि वह अपने वैभवके अनुसार देवता, मनुष्य, ऋषि तथा पितरोंको उनका भाग समर्पित करके शेष अन्नका स्वयं भोजन करे। पवित्र हो आचमन करके पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके दोनों हाथोंको घुटनोंके भीतर रखकर मौन भावसे भोजन करे। उस समय भोजनमें ही मन लगाये रहे और अन्नके दोषकी चर्चा न करे। यदि वह अन्न किसी उच्छिष्ट आदि दोषसे दूषित हो गया हो तो उस दोषके प्रकट करनेमें कोई हानि नहीं है, ऐसे दोषके अतिरिक्त किसी अन्य दोषकी चर्चा नहीं करनी चाहिये। नग्न होकर न तो स्नान करे, न सोवे और न चले ही। यदि गुरुके द्वारा कोई अनुचित कार्य भी हो जाय, तो उसे अन्यत्र न कहे, वे क्रोधमें हों तो उन्हें मनावे। दूसरे लोगोंके मुखसे भी गुरुकी निन्दा न सुने। सैकड़ों कार्य छोड़कर भी धर्मकी कथा-वार्ता सुने। प्रतिदिन धर्म-चर्चा श्रवण करनेवाला मनुष्य अपने अन्तःकरणको उसी प्रकार शुद्ध कर लेता है, जैसे नित्यप्रति झाडू देने अथवा सफाई करनेसे घर और दर्पण स्वच्छ होते हैं। सायंकाल और प्रातःकाल अतिथिकी पूजा करके भोजन करना चाहिये। दोनों सन्ध्याओंके समय सोना, पढ़ना और भोजन करना निषिद्ध है। सन्ध्याकालमें मोहवश भोजन करनेवाला मनुष्य शराबीके तुल्य माना जाता है। स्नान करके मनुष्य अपने बालोंको न फटकारे। मार्गमें छींकने और थूकनेपर अपने दाहिने कानका स्पर्श करे तथा मन-ही-मन समस्त प्राणियोंसे इस अपराधके लिये क्षमा माँगे। नीलका रँगा हुआ वस्त्र न पहने, कपड़ेको उलटा करके न पहने, मलिन वस्त्र त्याज्य है तथा जिसके कोर या किनारा न हो, ऐसा वस्त्र भी धारण करनेयोग्य नहीं है।
हाथ, मुँह और दोनों पैर धोकर आसनपर बैठे। दोनों हाथ घुटनोंके भीतर रखकर तीन
* स्वस्रा दुहित्रा मात्रा वा नैकान्तासनमाचरेत्। दुर्जयो हीन्द्रियग्रामो मुह्यते पण्डितोऽपि सन्॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३६।१५७)
१६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
बार आचमन करे, दो बार मुँह पोछे। फिर जलसे मुँह, आँख, कान, नाक तथा अपने मस्तकका स्पर्श करे। पुनः दो बार आचमन करके सब कर्म करे। छींक और थूक आनेपर, दाँतमें अन्न आदि लगे रहनेपर तथा पतितोंके साथ बातचीत करनेपर अवश्य आचमन करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको सदा तीनों वेदोंका स्वाध्याय करना चाहिये तथा धर्मपूर्वक धनका उपार्जन करके आत्मकल्याणके लिये यत्नपूर्वक भगवान्का यजन करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि वह नीच श्रेणीके मनुष्योंके लिये भी कभी अनादरसूचक 'तू' का प्रयोग न करे। गुरुजनोंके लिये तू कह देना या उनका वध कर डालना दोनों बराबर है। सत्य बोले, मित्र-भावसे रहे, सदा ऐसी बात बोले जो दूसरोंको सान्त्वना देनेवाली हो। परलोकमें जो हितकर हो, उसी कार्यमें गम्भीर बुद्धिवाले पुरुषोंको अपना शरीर और मन लगाना चाहिये। स्वच्छ इन्द्रियोंवाले पुरुषोंको तीर्थस्नान, उपवास, व्रत, सत्पात्रको दिये गये दान, होम, जप, यज्ञ, शिव-पूजा तथा देवताओंकी विशेष पूजा आदिके द्वारा सदा अपने अन्तःकरणका शोधन करना चाहिये। राजन्! जिस कार्यको करते समय अपने आत्माको घृणा न हो तथा जो महात्मा पुरुषके लिये गोपनीय (छिपानेयोग्य) न हो, वह कार्य अनासक्तभावसे अवश्य करना चाहिये। यह मैंने तुमसे संक्षिप्तरूपमें सदाचारका किंचिन्मात्र वर्णन किया है। शेष बातें तुम्हें स्मृतियों और पुराणोंसे सुननी चाहिये। इस प्रकार भगवान् शिवकी प्रीतिके लिये धर्माचरण करनेवाले सद्गृहस्थको इहलोकमें धर्म, अर्थ और कामकी प्राप्ति होकर परलोकमें उसका परम कल्याण होता है।
**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! जब महाकालजी इस प्रकार भाँति-भाँतिके धर्मोंका उपदेश कर रहे थे, उस समय आकाशमें बड़ा भारी शब्द हुआ। तदनन्तर महाकाल भगवान् शिवके परमधामको चले गये। कुरुनन्दन! इस प्रकार इस महालिंगका आविर्भाव हुआ है। महाकालका यह कूप और सरोवर भी परम पवित्र एवं सिद्धिदायक है। कुन्तीनन्दन! जो मनुष्य यहाँ इस लिंगकी आराधनामें संलग्न होते हैं, महाकाल उन्हें अपने हृदयसे लगाकर भगवान् शिवकी सेवामें प्रस्तुत करते हैं। अर्जुन! इस प्रकार महीसागरसंगम तीर्थमें ये सात लिंग प्रकट हुए। जो श्रेष्ठ मानव इस प्रसंगको पढ़ते और सुनते हैं, वे भी धन्य हैं।
$\sim\sim\circ\sim\sim$
नारदजीके द्वारा भगवान् वासुदेवकी स्थापना, ऐतरेयका अपनी मातासे संसारदुःखका वर्णन, भगवान्का प्रत्यक्ष प्रकट होकर ऐतरेयको वरदान देना तथा वासुदेवके ध्यानसे ऐतरेयकी मुक्ति
**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! तदनन्तर महीसागर-संगममें जब मैंने स्थानकी स्थापना कर ली, तब कालान्तरमें मन-ही-मन विचार किया कि यह तीर्थ भगवान् वासुदेवके बिना शोभा नहीं पा रहा है। ठीक उसी तरह, जैसे बिना सूर्यके संसार सुशोभित नहीं होता। भगवान् विष्णु भूषणके भी भूषण हैं। जिस तीर्थमें, जिस घरमें, जिस हृदयमें तथा जिस शास्त्रमें मेरे स्वामी भगवान् विष्णु नहीं हैं, वह सब असत् है। इसलिये वरदायक भगवान् पुरुषोत्तमको प्रसन्न करके सम्पूर्ण विश्वपर अनुग्रह करनेकी कामनासे इस तीर्थमें उन्हें साक्षात् कलासहित ले आऊँगा। ऐसा विचारकर मैं वहीं ठहर गया
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १६७
और ज्ञानयोगके द्वारा योगीश्वर श्रीहरिको सन्तुष्ट करनेके लिये सौ वर्षोंतक आराधना करता रहा। सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने वशमें करके वासुदेवमय होकर सब प्राणियोंपर कृपा रखते हुए अष्टाक्षरमन्त्रके जपमें लगा रहा। इस प्रकार मेरे आराधना करनेपर गरुड़पर बैठे हुए भगवान् श्रीहरिने कोटि-कोटि गणोंके साथ आकर मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दिया। तब मैंने श्रीहरिको विधिपूर्वक अर्घ्य दे, प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़े हुए कहा—'प्रभो! पूर्वकालमें
श्वेतद्वीप नामक धाममें मैंने आपके अजन्मा, सनातन, नर-नारायणात्मक स्वरूपका दर्शन किया है। जनार्दन! उसी रूपकी एक कला यहाँ स्थापित कीजिये। भगवन्! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरी यह प्रार्थना स्वीकार करें।' मेरे इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् गरुड़ध्वजने कहा—'ब्रह्मपुत्र नारद! तुम्हारे हृदयमें जिस आकांक्षाका उदय हुआ है, वह उसी रूपमें पूर्ण हो। मुझे इस तीर्थमें सदैव निवास करना है।' यों कहकर श्रीविष्णु-प्रतिमामें अपनी कला स्थापित करके भगवान् विष्णु जब चले गये, तब मैंने सम्पूर्ण विश्वपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे उनके श्रीअर्चाविग्रहकी स्थापना की। अतः साक्षात् श्वेतद्वीपनिवासी श्रीहरि यहाँ विराजमान हैं, जो कि सबसे वृद्ध हैं, अतः वे इस तीर्थमें वृद्ध वासुदेवके नामसे विख्यात हुए हैं।
कार्तिकमासके शुक्लपक्षमें जो कल्याणमयी एकादशी आती है, उस दिन झरने अथवा नदी आदिके जलमें विधिपूर्वक स्नान करके जो पुरुष पंचोपचारद्वारा भक्तिभावसे श्रीहरिका पूजन करता है तथा उपवास और जागरण करते हुए श्रीहरिके आगे संगीत एवं वाद्यका आयोजन करता है, अथवा दम्भ और क्रोध त्याग कर श्रीविष्णुकी महिमा एवं लीलाकी कथा कहता है तथा मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए प्रसन्नचित्त हो यथाशक्ति दान देता है, वह ब्रह्महत्यारा क्यों न हो, अनेक जन्मोंकी समस्त पापराशिसे मुक्त हो जाता है। इसके सिवा वह अन्तमें गरुड़-सम्बन्धी विमानके द्वारा साक्षात् वैकुण्ठधामको प्राप्त होता है।
श्रद्धापूर्वक, प्रसन्नतापूर्वक, उत्साहके साथ, आन्तरिक अभिलाषासे, अहंकार छोड़कर, भगवान्को स्नान करा उन्हें धूप और चन्दन चढ़ाकर, पुष्प और नैवेद्य समर्पण करके, अर्घ्यदान देकर, प्रत्येक प्रहरमें अत्यन्त भक्तिभावसे भगवान्की आरती उतारकर, चँवर डुलानेका आनन्द लेते हुए, भेरी बजाते हुए, पुराण-कथा-श्रवणपूर्वक, भक्तियुक्त नृत्य करके, नींदसे दूर रहकर, क्षुधा-पिपासा तथा रसास्वादनकी इच्छासे रहित होकर, भगवच्चरणारविन्दोंकी सुगन्धको सूँघते हुए, भगवत्प्रिय रात्रि-संगीतका आयोजन करके, भगवत्तीर्थमें जाकर, प्राणायामपूर्वक, ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक, स्तोत्रपाठके साथ, भगवान्के चरणोदकको ग्रहण करते हुए, सत्यभाषणपूर्वक, सत्संगका लाभ उठाते हुए तथा पुण्यवार्ता (कथा-उपदेश आदि)-के सहित—इन पचीस विशेषताओंके साथ जो मनुष्य एकादशीकी
१६८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
रातमें भगवान्के समीप जागरण करता है, वह फिर इस भूमिमें जन्म नहीं लेता। पूर्वकालकी बात है। इस श्रेष्ठ तीर्थमें एक ऐतरेय नामक ब्राह्मण रहते थे। उन परम भाग्यशाली ब्राह्मण-देवताने यहीं भगवान् वासुदेवकी कृपासिद्धि प्राप्त की थी।
अर्जुनने पूछा—मुने! ऐतरेय किसके पुत्र थे? उनका निवास-स्थान कहाँ था? परम बुद्धिमान् ऐतरेयने किस प्रकार भगवान् वासुदेवके प्रसादसे सिद्धि प्राप्त की?
नारदजीने कहा—कुन्तीनन्दन! यहीं मेरे द्वारा स्थापित स्थानमें जो हारीत मुनि रहते थे, उन्हींके वंशमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण उत्पन्न हुए, जो माण्डूकि नामसे विख्यात थे। वे वेद-वेदांगोंके पारंगत पण्डित थे। उनके ‘इतरा' नामवाली पत्नी थी, जो नारीके समस्त सद्गुणोंसे सुशोभित थी। उसके गर्भसे जो पुत्र हुआ, उसीका नाम ‘ऐतरेय’ था। ऐतरेय बाल्यावस्थासे ही निरन्तर द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय )-का जप करता था, उसे पूर्वजन्ममें ही इस मन्त्रकी शिक्षा मिली थी। वह न तो किसीकी बात सुनता था न स्वयं कुछ बोलता था और न अध्ययन ही करता था। इससे सबको निश्चय हो गया कि यह बालक गूँगा है। पिताने अनेक उपायोंसे उसको समझाया—बोध कराया, परंतु उसने लौकिक व्यवहारमें कभी मन नहीं लगाया। यह देख पिताने भी यही निश्चय कर लिया कि यह सर्वथा जड़ है। तब उन्होंने पिंगा नामवाली दूसरी स्त्रीसे विवाह किया और उससे चार पुत्र उत्पन्न किये जो वेद-वेदांगोंके विद्वान् हुए।
ऐतरेय भी प्रतिदिन तीनों समय भगवान् वासुदेवके मन्दिरमें जाकर उस उत्तम मन्त्रका जप करने लगे। वे दूसरे किसी कार्यमें परिश्रम नहीं करते थे। एक दिन उनकी माता इतरा अपनी सौतके पुत्रोंकी योग्यता देखकर सन्तप्तचित्त हो अपने पुत्रसे बोली—‘अरे! तू तो मुझे क्लेश देनेके लिये ही पैदा हुआ! मेरे जन्म और जीवनको धिक्कार है! संसारमें उस नारीका जन्म निश्चय ही व्यर्थ है, जो पतिके द्वारा तिरस्कृत हो और जिसका पुत्र गुणवान् न हो। वत्स! मैं बड़ी खोटे भाग्यवाली हूँ, अतः महीसागरसंगममें डूब मरूँगी। मेरा मर जाना ही अच्छा है। जीवित रहनेमें मुझे क्या लाभ है? मेरे मर जानेपर तू भी भगवान्का महामौनी भक्त होकर दीर्घकालतक आनन्द भोगना।'
नारदजी कहते हैं—माताकी यह बात सुनकर ऐतरेय ठाठाकर हँस पड़े। वे बड़े धर्मज्ञ थे। उन्होंने दो घड़ी भगवान्का ध्यान करके माताके चरणोंमें प्रणाम किया और कहा—‘माँ! तुम झूठे मोहमें पड़ी हुई हो। अज्ञानको ही ज्ञान मान बैठी हो। शुभे! जो शोचनीय नहीं है, उसीके लिये तुम शोक करती हो और जो वास्तवमें शोचनीय है उसके लिये तुम्हारे मनमें तनिक भी शोक नहीं होता। यह संसार मिथ्या है। इसमें तुम इस शरीरके लिये क्यों चिन्तित एवं मोहित हो रही हो? यह तो मूर्खोंका काम है! तुम-जैसी विदुषी स्त्रियोंको यह शोभा नहीं देता! संसारमें सारतत्त्व तो कुछ और ही है, किंतु अज्ञानसे मोहित मनुष्य किसी और ही असार वस्तुको सार समझते हैं। तुम इस मानव-शरीरको यदि सार मानती हो तो लो, इसकी भी असारता सुनो। यह जो मानव-शरीर है, यह गर्भसे लेकर मृत्युपर्यन्त सदा अत्यन्त कष्टप्रद है। यह शरीर एक प्रकारका घर है। हड्डियोंका समूह ही इसके भारको सँभालनेवाला खम्भा है। नाडीजालरूपी रस्सियोंसे ही इसे बाँधा गया है। रक्त और मांसरूपी मिट्टीसे इसको लीपा गया है। विष्ठा और मूत्ररूपी द्रव्योंके संग्रहका यह पात्र है। केश और रोमरूपी तृणसे इसको छाया गया है। सुन्दर रंगकी त्वचासे इसके ऊपर रंग किया गया है। मुख ही इसका प्रधान द्वार है। दो आँख, दो कान और दो नाकके छिद्र—ये ही छः इसकी खिड़कियाँ हैं। दोनों ओष्ठ ही इसके द्वारको ढकनेवाले किंवाड़ हैं। दाँत ही अर्गला (किंवाड़
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १६९
बंद करनेवाली किल्ली) हैं। नाड़ी और पसीने ही नाली और जलप्रवाह हैं। यह सदा कालकी मुखाग्निमें स्थित है। ऐसे इस देहरूपी गेहमें जीव नामवाला गृहस्थ निवास करता है। इस घरमें त्रिगुणमयी प्रकृति ही उसकी पत्नी है तथा क्रोध, अहंकार, काम, ईर्ष्या और लोभ आदि ही उक्त गृहस्थकी सन्तान हैं। हाय ! कितने कष्टकी बात है कि जीव इस देह-गेहकी मोहमायासे मूढ होकर तदनुकूल बर्ताव करता है। उसका जिस-जिस विषयमें जैसे मोह होता है, वह सब बताता हूँ, सुनो। जैसे पर्वतसे झरने गिरते रहते हैं, उसी प्रकार शरीरसे भी कफ और मूत्र आदि बहते रहते हैं, उसी देहके लिये जीव मोहित होता है। विष्ठा और मूत्रसे भरे हुए चर्मपात्रकी भाँति यह शरीर समस्त अपवित्र वस्तुओंका भण्डार है और इसका एक प्रदेश (एक अंश) भी पवित्र नहीं है। अपने शरीरसे निकले हुए मल-मूत्र आदिके जो प्रवाह हैं, उनका स्पर्श हो जानेपर मिट्टी और जलसे हाथ शुद्ध किया जाता है; तथापि उन्हीं अपवित्र वस्तुओंके भण्डाररूप इस देहसे न जाने क्यों मनुष्यको वैराग्य नहीं होता? सुगन्धित तेल और जल आदिके द्वारा यत्नपूर्वक भलीभाँति संस्कार (सफाई) करनेपर भी यह शरीर अपनी स्वाभाविक अपवित्रताको नहीं छोड़ता है; ठीक उसी तरह, जैसे कुत्तेकी टेढ़ी पूँछको कितना ही सीधा किया जाय, वह अपना टेढ़ापन नहीं छोड़ पाती। अपनी देहकी अपवित्र गन्धसे जो मनुष्य विरक्त नहीं होता, उसे वैराग्यके लिये अन्य किस साधनका उपदेश दिया जाय? दुर्गन्ध तथा मल-मूत्रके लेपको दूर करनेके लिये ही शारीरिक शुद्धिका विधान किया गया है। इन दोनों (गन्ध और लेप)-का निवारण हो जानेके पश्चात् आन्तरिक भावकी शुद्धि होनेसे मनुष्य शुद्ध होता है। भाव-शुद्धि ही सबसे बढ़कर पवित्रता है। वही सब कर्मोंमें प्रमाणभूत है। आलिंगन पत्नीका भी किया जाता है और पुत्रीका भी, परंतु दोनोंमें भावका महान् अन्तर है। प्यारी पत्नीका आलिंगन किसी और भावसे किया जाता है एवं पुत्रीका दूसरे भावसे। एक ही स्त्रीके स्तनोंको पुत्र दूसरे भावसे स्मरण करता है और पति दूसरे भावसे। अतः अपने चित्तको ही शुद्ध करना चाहिये। बाह्यशुद्धिके दूसरे-दूसरे साधनोंसे क्या लेना है? भावदृष्टिसे जिसका अन्तःकरण अत्यन्त शुद्ध है, वह स्वर्ग और मोक्षको भी प्राप्त कर लेता है।
ज्ञानरूपी निर्मल जल तथा वैराग्यरूपी मृत्तिकासे ही पुरुषके अविद्या एवं रागमय मल-मूत्रके लेप और दुर्गन्धका शोधन होता है। इस प्रकार इस शरीरको स्वभावतः अशुद्ध माना गया है। जैसे केलेके वृक्षमें केवल वल्कल ही सार है, उसी प्रकार इस देहमें केवल त्वचामात्र सार है, वास्तवमें तो यह सर्वथा निःसार है। जो बुद्धिमान् अपने शरीरको इस प्रकार दोषयुक्त जानकर उदासीन हो जाता है—उसकी ओरसे अनुराग शिथिल कर लेता है—वही इस संसार-बन्धनसे छूटकर निकल पाता है। किंतु जो दृढ़तापूर्वक इस शरीरको पकड़े हुए रहता है—इसका मोह नहीं छोड़ता, वह संसारमें ही पड़ा रह जाता है। इस प्रकार यह मानव-जन्म लोगोंके अज्ञानदोषसे तथा नाना कर्मवशात् दुःखस्वरूप और महान् कष्टप्रद बताया गया है। जैसे बड़े भारी पर्वतसे दबा हुआ कोई प्राणी बड़े कष्टसे पीड़ित रहता है, उसी प्रकार गर्भकी झिल्लीमें बँधा हुआ मनुष्य महान् कष्टसे वहाँ ठहर पाता है। जैसे समुद्रमें गिरा हुआ कोई मनुष्य अत्यन्त व्याकुल होकर बड़े भारी दुःखसे घिर जाता है, उसी प्रकार गर्भगत जलसे भीगे हुए अंगोंवाला गर्भस्थ शिशु अत्यन्त व्याकुल रहता है। जैसे किसीको लोहेके घड़ेमें रखकर आगसे पकाया जाता है, वैसे ही गर्भरूपी घटमें डाला हुआ जीव जठरानलकी आँचसे पकता रहता है। यदि आगके समान दहकती हुई सुइयोंसे
१७० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
किसीको निरन्तर छेदा जाय तो उसे जितनी पीड़ा हो सकती है, उससे आठ गुनी पीड़ा गर्भमें भोगनी पड़ती है। इस प्रकार स्थावर-जंगम सभी प्राणियोंको अपने-अपने गर्भके अनुरूप यह महान् गर्भ-दुःख प्राप्त होता है; ऐसा कहा गया है।
गर्भमें स्थित होनेपर सभीको अपने पूर्वजन्मोंका स्मरण हो आता है। उस समय जीव इस प्रकार सोचता है—'अहो! मैं मरकर पुनः उत्पन्न हुआ और उत्पन्न होकर पुनः मृत्युको प्राप्त हुआ। जन्म ले-लेकर मैंने सहस्रों योनियोंका दर्शन किया है। इस समय जन्म धारण करते ही मेरे पूर्वसंस्कार जाग उठे हैं; अतः अब मैं ऐसे कल्याणकारी साधनका अनुष्ठान करूँगा, जिससे पुनः मेरा गर्भवास न हो। संसार-बन्धनको दूर करनेवाले भगवदीय तत्त्वज्ञानका मैं चिन्तन करूँगा।' इस प्रकार उस दुःखसे छूटनेके उपायपर विचार करता हुआ गर्भस्थ जीव चिन्तामग्न रहता है। जब उसका जन्म होने लगता है, उस समय तो उसे गर्भकी अपेक्षा भी कोटिगुना अधिक दुःख होता है। गर्भवासके समय जो सद्बुद्धि जाग्रत् हुई रहती है, वह जन्म हो जानेपर नष्ट हो जाती है। बाहरकी हवा लगते ही मूढ़ता आ जाती है। मोहग्रस्त होनेपर शीघ्र ही उसकी स्मरणशक्तिका नाश हो जाता है। स्मरणशक्ति नष्ट होनेपर पूर्वकर्मवशात् जीवका पुनः उसी जन्म (-के शरीर आदि)-में अनुराग हो जाता है। इस प्रकार राग और मोहके वशीभूत हुआ वह संसारमें न करनेयोग्य पापादि कर्मोंमें लग जाता है। उनमें फँसकर न तो वह अपनेको जानता है, न दूसरोंको जानता है और न किसी देवताको ही कुछ समझता है। अपने परम कल्याणकी बाततक नहीं सुनता। आँख रहते हुए भी नहीं देखता। समतल मार्गपर धीरे-धीरे चलते हुए भी वह पग-पगपर लड़खड़ाता है। विद्वानोंके समझानेपर भी, बुद्धि रहते हुए भी वह नहीं समझ पाता, इसीलिये राग और मोहके वशीभूत होकर संसारमें क्लेश उठाता रहता है। जन्म लेनेपर गर्भकालमें जाग्रत् हुई पूर्वजन्मकी स्मृति अथवा गर्भके दुःखोंकी स्मृति नहीं रहती, इसलिये महर्षियोंने गर्भदुःखका निरूपण करनेके लिये शास्त्रोंका प्रतिपादन किया है। वे शास्त्र स्वर्ग और मोक्षके उत्तम साधन हैं। सब कार्यों और प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाले इस शास्त्रज्ञानके रहते हुए भी लोग उससे अपने कल्याणका साधन नहीं करते। यह अत्यन्त अद्भुत बात है।
बाल्यावस्थामें इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ अव्यक्त रहती हैं, इसलिये जीव उस समयके महान् दुःखको बतानेकी इच्छा होनेपर भी बता नहीं सकता और न उस दुःखके निवारणके लिये कुछ कर ही सकता है। फिर जब दाँत उठने लगता है तब उसे महान् कष्ट भोगना पड़ता है। मौल रोग (सिरदर्द), नाना प्रकारके बालरोग तथा पूतना आदि बालग्रह आदिसे भी बालकको बड़ी पीड़ा होती है। भूख-प्यासकी पीड़ासे उसके सब अंग व्याकुल रहते हैं तथा वह कहीं खाट आदिपर पड़ा हुआ रोता
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १७१
रहता है। इसके बाद जब वह कुछ बड़ा होता है, तब अक्षरोंके अध्ययन आदिसे और गुरुके शासनसे उसको महान् दुःख होता है।
युवावस्थामें रागोन्मत्त पुरुषकी सम्पूर्ण इन्द्रिय-वृत्तियाँ काम तथा रागकी पीड़ासे सदा मतवाली रहती हैं। अतः उसे भी कहाँसे सुख प्राप्त हो सकता है। मोहवश पुरुषको यदि कहीं अनुराग हो जाता है तो ईर्ष्याके कारण उसे बड़ा भारी दुःख होता है। जो उन्मत्त और क्रोधी है उसका कहीं भी राग होना केवल दुःखका ही कारण है। रातमें कामाग्निजनित खेदसे पुरुषको निद्रा नहीं आती। दिनमें भी द्रव्योपार्जनकी चिन्ता लगी रहनेके कारण उसे सुख नहीं मिल सकता। स्त्रियाँ सब दोषोंका आश्रय हैं; यह बात भलीभाँति जान लेनेपर भी जो लोग उनमें मैथुनसे सुख मानते हैं, उनका वह सुख मल-मूत्र-त्यागके सदृश ही माना गया है। सम्मान अपमानसे, प्रियजनोंका संयोग वियोगसे तथा जवानी वृद्धावस्थासे ग्रस्त है। निर्विघ्न सुख कहाँ है?
युवावस्थाका शरीर एक दिन जरा अवस्थासे जर्जर कर दिया जानेपर सम्पूर्ण कार्योंके लिये असमर्थ हो जाता है। उसके बदनमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, सिरके बाल सफेद हो जाते हैं और शरीर बहुत ढीला-ढाला हो जाता है। स्त्री और पुरुषका वही रूप, जो जवानीके दिनोंमें एक-दूसरेका आधार था, जराग्रस्त हो जानेपर दोनोंमेंसे किसीको भी प्रिय नहीं लगता। बुढ़ापेसे दबा हुआ पुरुष असमर्थ होनेके कारण पत्नी-पुत्र आदि बन्धु-बान्धवों तथा दुराचारी सेवकोंद्वारा भी अपमानित होता है। वृद्धावस्थामें रोगातुर पुरुष धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका साधन करनेमें असमर्थ हो जाता है; इसलिये युवावस्थामें ही धर्मका आचरण करना चाहिये।
वात, पित्त और कफकी विषमता ही व्याधि कहलाती है। इस शरीरको वात आदिका समूह बताया गया है। इसलिये अपना यह शरीर व्याधिमय है; ऐसा जानना चाहिये। इस शरीरमें अनेक प्रकारके रोगोंद्वारा बहुतेरे दुःख प्रवेश कर जाते हैं। उनका पता अपने-आपको भी नहीं लगता, फिर दूसरोंको तो लग ही कैसे सकता है। इस देहमें एक सौ एक व्याधियाँ स्थित हैं। इनमेंसे एक व्याधि तो कालके साथ रहती है और शेष आगन्तुक मानी गयी हैं। जो आगन्तुक बतायी गयी हैं, वे तो दवा करनेसे तथा जप, होम और दानसे शान्त हो जाती हैं; परन्तु मृत्युरूप व्याधि कभी शान्त नहीं होती। नाना प्रकारकी व्याधियाँ, सर्प आदि प्राणी, विष और अभिचार (पुरश्चरण)—ये सब देहधारियोंकी मृत्युके द्वार बताये गये हैं। यदि जीवका काल आ पहुँचा है, तो सर्प और रोग आदिसे पीड़ित होनेपर उसे धन्वन्तरि भी जीवित नहीं रख सकते। कालसे पीड़ित मनुष्यको औषध, तपस्या, दान, मित्र तथा बन्धु-बान्धव—कोई भी बचा नहीं सकते। रसायन, तपस्या, जप, योग, सिद्ध-महात्मा तथा पण्डित—ये सब मिलकर भी कालजनित मृत्युको नहीं टाल सकते। समस्त प्राणियोंके लिये मृत्युके समान कोई दुःख नहीं है, मृत्युके समान कोई भय नहीं है तथा मृत्युके समान कोई त्रास नहीं है। सती भार्या, उत्तम पुत्र, श्रेष्ठ मित्र, राज्य, ऐश्वर्य और सुख—ये सभी स्नेहपाशमें बँधे हुए हैं। मृत्यु इन सबका उच्छेद कर डालती है। माँ! क्या तुम नहीं देखती कि हजारों मनुष्योंमेंसे पाँच भी शायद ही ऐसे होंगे, जो पूरे सौ वर्षोंतक जीनेवाले हों। कोई-ही-कोई अस्सी वर्ष और सत्तर वर्षकी अवस्थामें मरते हैं। प्रायः साठ वर्षतककी ही लोगोंकी परमायु हो गयी है; किंतु वह भी सबके लिये निश्चित नहीं है। जिस देहधारीको अपने पूर्वकर्मानुसार जितनी आयु प्राप्त होती है, उसका आधा भाग तो मृत्युरूपिणी रात्रि हर लेती है। बाल्यावस्था, अबोधावस्था तथा वृद्धावस्थाके
| १७२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
द्वारा बीस वर्ष और व्यतीत हो जाते हैं—जो धर्म, अर्थ और काम—किसीके भी उपयोगमें नहीं आते। शेष आयुका आधा भाग मनुष्यपर आनेवाले बहुत-से भय तथा अनेक प्रकारके रोग और शोक आदि हर लेते हैं। इन सबसे जो शेष रह जाता है, वही मनुष्यका जीवन है।
इस जीवनकी समाप्ति होनेपर मनुष्य अत्यन्त भयंकर मृत्युको प्राप्त होता है। मृत्युके बाद वह पुनः करोड़ों योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है। कर्मोंकी गणनाके अनुसार देह-भेदसे जो जीवका एक शरीरसे वियोग होता है, उसे 'मृत्यु' नाम दिया गया है, वास्तवमें उससे जीवका विनाश नहीं होता। मृत्युके समय महान् मोहको प्राप्त हुए जीवके मर्मस्थान जब विदीर्ण होने लगते हैं, उस दशामें उसे जो बड़ा भारी कष्ट भोगना पड़ता है, उसकी इस संसारमें कहीं उपमा नहीं है। जैसे साँप मेंढकको निगल जाता है, उसी प्रकार मृत्यु जब मनुष्यको निगलने लगती है, उस समय वह हा तात! हा मातः! हा कान्ते! इत्यादि रूपसे पुकारता हुआ अत्यन्त दुःखी हो-होकर रोता है। भाई-बन्धुओंसे साथ छूट रहा है, प्रेमीजन उसे चारों ओरसे घेरकर खड़े हैं। वह सूखते हुए मुखसे गरम-गरम लंबी साँस खींचता है। चारपाईपर चारों ओर बार-बार करवट बदलता है। पीड़ासे मोहित होकर बड़े वेगसे इधर-उधर हाथ फेंकता है। खाटसे भूमिपर और भूमिसे खाटपर तथा फिर भूमिपर आना चाहता है। उसके वस्त्र खुल गये हैं, लज्जा छूट चुकी है, विष्ठा और मूत्रमें सना हुआ है। कण्ठ, ओष्ठ और तालू सूख जानेके कारण बार-बार पानी माँगता है। अपने धन-वैभवके लिये इस बातकी चिन्ता करता है कि मेरे मर जानेपर ये किसके हाथमें पड़ेंगे। पुनः कालपाशसे खींचे जानेपर उसका गला घुरघुराने लगता है और पार्श्ववर्ती लोगोंके देखते-देखते मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जैसे तृणजलौका जलमें बहते हुए तिनकेके अन्ततक पहुँचकर जब दूसरा तिनका थाम लेती है, तब पहलेको छोड़ देती है। उसी प्रकार जीव एक देहसे दूसरी देहमें क्रमशः प्रवेश करता है। भावी शरीरमें अंशतः प्रवेश करके पूर्वशरीरका त्याग करता है।
विवेकी पुरुषके लिये किसीसे कुछ माँगना मृत्युसे भी अधिक दुःखदायी होता है। मृत्युका दुःख तो क्षणभरमें समाप्त हो जाता है, परंतु याचनाजनित दुःखका कभी अन्त नहीं होता। मैंने तो इस समय यह अनुभव किया है कि मृत मनुष्य जीवित रहकर याचना करनेवालेकी अपेक्षा श्रेष्ठ है; क्योंकि अब वह फिर दूसरे किसीके सामने हाथ नहीं फैला सकता। तृष्णा ही लघुताका कारण है। आदिमें दुःख है, मध्यमें दुःख है तथा अन्तमें भी दारुण दुःख प्राप्त होता है। दुःखोंकी यह परंपरा समस्त प्राणियोंको स्वभावतः प्राप्त होती है। क्षुधाको सब रोगोंसे महान् रोग माना गया है। वह अन्नरूपी ओषधिका लेप करनेसे कुछ क्षणोंके लिये शान्त हो जाती है। क्षुधारूपी व्याधिकी तीव्र वेदना सम्पूर्ण बलका उच्छेद करनेवाली है। जैसे अन्य रोगोंसे लोग मरते हैं, उसी प्रकार क्षुधासे पीड़ित होनेपर भी मनुष्यकी मृत्यु हो जाती है। (यदि कहें धन-धान्यसम्पन्न राजा सुखी होंगे तो यह भी ठीक नहीं।) राजाको केवल यह अभिमान ही होता है कि मेरे घरमें इतना वैभव शोभा पा रहा है। वास्तवमें तो उनका सारा आभरण भाररूप है, समस्त आलेपन-द्रव्य मलमूत्र है, सम्पूर्ण संगीत-राग प्रलापमात्र है तथा नृत्य आदि भी पागलोंकी-सी चेष्टा है। विचार-दृष्टिसे देखनेपर इन राज्यभोगोंके द्वारा राजाओंको सुख कहाँ मिलता है? क्योंकि वे लोग तो एक-दूसरेको जीतनेके लिये सदा ही चिन्तित रहते हैं। प्रायः राज्यलक्ष्मीके मदसे उन्मत्त होनेके कारण नहुष आदि महाराज स्वर्गका साम्राज्य पाकर भी वहाँसे नीचे गिर गये हैं। राजलक्ष्मी अथवा धन-
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १७३
ऐश्वर्यसे भला कौन सुख पाता है? मनुष्य स्वर्गलोकमें जो पुण्यफल भोगते हैं, वह अपने मूलधनको गँवाकर ही भोगते हैं; क्योंकि वहाँ वे दूसरा नवीन कर्म नहीं कर सकते। यही स्वर्गमें अत्यन्त भयंकर दोष है। जैसे वृक्षकी जड़ काट देनेपर वह विवश होकर पृथ्वीपर गिर पड़ता है, उसी प्रकार पुण्यरूपी मूलका क्षय हो जानेपर स्वर्गवासी जीव पुनः पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं। इस तरह विचारपूर्वक देखा जाय तो स्वर्गमें भी देवताओंको कोई सुख नहीं है। नरकमें गये हुए पापी जीवोंका दुःख तो प्रसिद्ध ही है—उनका क्या वर्णन किया जाय। स्थावर-योनिमें पड़े हुए जीवोंको भी बहुत दुःख भोगने पड़ते हैं। दावानलसे जलना, पाला पड़नेसे गलना, धूप और हवासे सूखना, कुल्हाड़ीसे काटा जाना, उनके वल्कलों (छिलकों)-का उतारा जाना, प्रचण्ड आँधीके वेगसे पत्तों, डालियों और फलोंका गिराया जाना तथा हाथियों और अन्य जंगली जन्तुओंद्वारा कुचला जाना आदि उनके लिये महान् दुःख हैं।
सर्पों और बिच्छुओंको प्यास और भूखका कष्ट रहता है, उन्हें क्रोधका भी दारुण दुःख सहन करना पड़ता है। संसारमें प्रायः दुष्ट साँप-बिच्छुओंको मारा जाता है, उन्हें जालमें फँसाकर बंद रखा जाता है। माताजी! इस प्रकार उस योनिके जीवोंको बारंबार कष्ट उठाना पड़ता है। कीड़े आदिका अकस्मात् जन्म होता है और अचानक ही उनकी मौत भी हो जाती है; अतः उनका दुःख भी कम नहीं है। मृगों और पक्षियोंको वर्षा, सर्दी और धूपका महान् कष्ट तो है ही, भूख-प्यासके भारी दुःखसे भी मृग सदा संत्रस्त रहते हैं। पशु-समूहके जो दुःख हैं, उन्हें भी सुन लो। भूख-प्यास तथा सर्दी-गरमी आदिका कष्ट सहना, मारा जाना, बन्धनमें डाला जाना और डंडे आदिसे पीटा जाना, नाकका छेदा जाना, चाबुक और अंकुशकी मार पड़ना आदि उनके महान् क्लेश हैं। इनके अतिरिक्त बोझ ढोनेका भी उन्हें बड़ा भारी कष्ट है। कार्यकी शिक्षा देते समय भी उन्हें मारा-पीटा जाता है, फिर युद्ध आदिकी पीड़ा भी सहनी पड़ती है। अपने झुंडसे जो उनका वियोग होता है और वे वनसे जो अन्यत्र लाये जाते हैं—यह सब कष्ट अलग हैं।
दुर्भिक्ष, दुर्भाग्यका प्रकोप, मूर्खता, दरिद्रता, नीच-ऊँचका भाव, मृत्यु, राष्ट्रविप्लव (एक राज्यका नाश करके दूसरे राज्यकी स्थापना), पारस्परिक अपमानका दुःख, आपसमें एक-दूसरेसे धन-वैभव या मान-प्रतिष्ठामें बढ़ जानेका कष्ट, अपनी प्रभुताका सदा स्थिर न रहना, ऊँचे चढ़े हुए लोगोंका नीचे गिराया जाना इत्यादि महान् दुःखोंसे यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है। जैसे इस कंधेका भार उस कंधेपर कर देनेको मनुष्य विश्राम समझता है, उसी प्रकार इस लोकमें एक दुःख दूसरे दुःखसे ही शान्त होता है। अतः एक-दूसरेसे ऊँची स्थितिमें स्थित हुए इस सम्पूर्ण जगत्को दुःखोंसे भरा हुआ जानकर उसकी ओरसे अत्यन्त उद्विग्न हो जाना चाहिये। उद्वेगसे वैराग्य होता है, वैराग्यसे ज्ञान प्रकट होता है तथा ज्ञानसे परमात्मा विष्णुको जानकर मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
माँ! जैसे कौओंके अपवित्र स्थानमें विशुद्ध राजहंस नहीं रह सकता, उसी प्रकार ऐसे दुःखमय संसारमें मैं तो कभी रम नहीं सकता। मैया! जहाँ रहकर मैं बिना किसी विघ्न-बाधाके आनन्दपूर्वक रह सकता हूँ, वह स्थान भी बताता हूँ, सुनो। अविद्यारूपी वन तो बड़ा भयंकर है। उसमें नाना प्रकारके कर्ममय बड़े-बड़े वृक्ष खड़े हैं। वहाँ संकल्पोंके डाँस और मच्छर बहुत हैं। शोक और हर्ष ही वहाँकी सर्दी और धूप हैं। उस वनमें मोहका घना अन्धकार छाया रहता है। वहाँ
१७४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
लोभरूपी साँप और बिच्छू रहते हैं। विषयोंके अनेक मार्गोंसे वह प्रदेश व्याप्त है। काम और क्रोधरूपी बधिक तथा लुटेरे उसमें सदा डेरा डाले रहते हैं। उस महादुःखमय विशाल वनको लाँघकर अब मैं एक ऐसे महान् विपिनमें प्रवेश कर चुका हूँ, जहाँ पहुँचकर उसके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुष न शोक करते हैं, न हर्ष। वहाँ किसीसे भय नहीं है, किसीको भी भय नहीं है। उस विद्यारूपी वनमें सात बड़े भारी वृक्ष हैं। वहाँ सात ही पर्वत हैं, जिन्होंने तीनों लोकोंको धारण कर रखा है। सात ही हृद (कुण्ड) हैं और सात ही नदियाँ हैं, जो सदा ब्रह्मरूप जल बहाया करती हैं। तेज, अभयदान, अद्रोह, कौशल (दक्षता), अचपलता, अक्रोध और प्रिय वचन बोलना—ये ही सात पर्वत उस विद्यावनमें स्थित हैं। दृढ-निश्चय, सबके साथ समता, मन और इन्द्रियोंका संयम, गुणसंचय, ममताका अभाव, तपस्या तथा सन्तोष—ये सात हृद हैं। भगवान्के गुणोंका विशेष ज्ञान होनेसे जो उनके प्रति भक्ति होती है, वह विद्या-वनकी पहली नदी है। वैराग्य दूसरी, ममताका त्याग तीसरी, भगवदाराधन चौथी, भगवदर्पण पाँचवीं, ब्रह्मैकत्वबोध छठी तथा सिद्धि सातवीं नदी है। ये ही सात नदियाँ वहाँ स्थित बतायी गयी हैं। वैकुण्ठ धामके निकट इन सातों नदियोंका संगम होता है। जो आत्मतृप्त, शान्त तथा जितेन्द्रिय होते हैं, वे ही महात्मा उस मार्गसे परात्पर ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। कोई श्रेष्ठ ज्ञानीजन उन वृक्षोंको प्राप्त करते हैं, कोई पर्वतोंको, कोई हृदोंको तथा कोई उन सात सरिताओंको ही प्राप्त होते हैं।
माँ! मैं ग्रहण किये हुए व्रतको धारण करनेकी इच्छा रखकर यहाँ ब्रह्मचर्यका आचरण करता हूँ। इस ब्रह्मचर्यमें ब्रह्म ही समिधा, ब्रह्म ही अग्नि तथा ब्रह्म ही कुशास्तरण हैं। जल भी ब्रह्म हैं और गुरु भी ब्रह्म ही हैं—यही मेरा ब्रह्मचर्य है। विद्वान् पुरुष इसीको सूक्ष्म ब्रह्मचर्य मानते हैं। माता! अब मेरे गुरुका परिचय सुनो, जिन्होंने मुझे विद्या प्रदान की है। एक ही शिक्षक है, दूसरा कोई शिक्षक नहीं है। हृदयमें विराजमान अन्तर्यामी पुरुष ही शिक्षक होकर शिक्षा देता है। उसीसे प्रेरित होकर मैं झरनेसे बहकर जानेवाले जलकी भाँति जहाँ जिस कार्यमें नियुक्त होता हूँ, वहाँ वैसा ही करता हूँ। एक ही गुरु हैं, उनके सिवा दूसरा कोई गुरु नहीं है। जो हृदयमें विराजमान हैं, वे ही गुरु हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। उन्हीं गुरुस्वरूप भगवान् मुकुन्दकी अवहेलना करके सम्पूर्ण दानव पराभवको प्राप्त हुए हैं।* एक ही बन्धु है, उसके सिवा दूसरा बन्धु नहीं है। जो हृदयमें विराजमान है, वह परमात्मा ही बन्धु है, मैं उसे नमस्कार करता हूँ। उसीसे शिक्षा प्राप्त करके सात बन्धुमान् भाई सप्तर्षि आकाशमें प्रकाशित हो रहे हैं। ऐसे ही ब्रह्मचर्यका भलीभाँति सेवन करना चाहिये। अब मेरा गार्हस्थ्य कैसा है, यह भी सुन लो। माताजी! प्रकृति ही मेरी पत्नी है, किन्तु मैं कभी उसका चिन्तन नहीं करता; वही सदा मेरा चिन्तन किया करती है। वह मेरे सब प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाली है। नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान, मन तथा बुद्धि—यह सात प्रकारकी अग्नि सदा मेरी अग्निशालामें प्रज्वलित होती रहती हैं। गन्ध, रस, रूप, शब्द, स्पर्श, मन्तव्य और बोधव्य—ये ही सात मेरी समिधाएँ हैं। होता भी नारायण हैं और ध्यानसे साक्षात् नारायण ही उपस्थित हो उस हविष्यका उपयोग भी करते हैं। ऐसे यज्ञद्वारा मैं अपनी इस गृहस्थीमें उन परमेश्वर विष्णुका यजन (आराधन) करता हूँ। किसी भी वस्तुकी कामना नहीं रखता, तथापि मेरे सम्पूर्ण काम स्वतः सिद्ध हैं। मैं
* एको गुरुर्नास्ति ततो द्वितीयो यो हृद्गतस्तमहं वै नमामि।
पञ्चावमन्यैव गुरुं मुकुन्दं पराभूता दानवास्सर्व एव॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३७। ६२)
| * माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १७५ |
|---|
सांसारिक सम्पूर्ण दोषोंसे द्वेष नहीं करता, तथापि कोई भी दोष मुझमें प्रकट नहीं होता! जैसे कमलके पत्तेपर जलकी बूँदका लेप नहीं होता, उसी प्रकार मेरा स्वभाव राग-द्वेष आदिसे लिप्त नहीं होता। मैं नित्य हूँ, बहुतोंके स्वभावोंका साक्षी हूँ, अनित्य भोग मुझपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। जैसे सूर्यकी किरणें आकाशमें लिप्त नहीं होतीं, वैसे ही मेरे भगवदर्थ किये गये निष्काम कर्मोंमें भोगसमूह नहीं लिप्त होते (मेरे कर्मोंका फल भोग-सामग्रीके रूपमें नहीं उपस्थित होता, वे कर्म तो भगवत्प्राप्ति करानेवाले होते हैं), माता! ऐसे मुझ पुत्रसे तुम दुःखी न होओ। मैं तुम्हें उस पदपर पहुँचाऊँगा, जहाँ सैकड़ों यज्ञ करके भी पहुँचना असम्भव है।'
अपने पुत्रकी यह बात सुनकर इतराको बड़ा विस्मय हुआ। वह सोचने लगी, 'अहो! यदि मेरा पुत्र ऐसा दृढ़निष्ठावाला विद्वान् है, तब तो संसारमें जब इसकी ख्याति होगी, उस समय मेरा भी महान् यश फैलेगा।' माता इस प्रकारकी बातें सोच ही रही थी कि शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णु उस अर्चा-विग्रहसे साक्षात् प्रकट हो गये। वे उस द्विजपुत्रकी बातोंसे अत्यन्त प्रसन्न थे। भगवान्की दिव्य कान्ति करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान थी। वे अपनी प्रभासे सम्पूर्ण जगत्को उद्भासित कर रहे थे। भगवान्को देखते ही ऐतरेय धरतीपर दण्डकी भाँति पड़ गये। उनके शरीरमें रोमांच हो आया। नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहने लगे। वाणी गद्गद हो गयी। बुद्धिमान् ऐतरेयने मस्तकपर अंजलि बाँधकर भगवान्का इस प्रकार स्तवन प्रारम्भ किया—
"आप भगवान् वासुदेवका हम ध्यान और नमस्कार करते हैं। आप ही प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा संकर्षण हैं, आपको नमस्कार है। आप केवल विज्ञानस्वरूप तथा परमानन्दमूर्ति हैं, आपको नमस्कार है। आप आत्माराम, शान्त तथा आप समस्त इन्द्रियोंके स्वामी (हृषीकेश) हैं, सबसे महान् तथा अनन्त शक्तियोंसे सम्पन्न हैं; आपको नमस्कार है। मनसहित वाणीके थककर निवृत्त हो जानेपर जो एकमात्र अपनी कृपासे ही सुलभ होनेवाले हैं, नाम और रूपसे रहित चैतन्यघन ही जिनका स्वरूप है, वे सत् और असत्से परे विराजमान परमात्मा हम सबकी रक्षा करें। आप परम सत्य तथा निर्मल हैं, हम आपकी उपासना करते हैं। जो षड्विध ऐश्वर्यसे युक्त परम पुरुष महानुभाव एवं समस्त महाविभूतियोंके अधिपति हैं, उन भगवान्को नमस्कार है। परमेष्ठिन्! आप सबसे उत्कृष्ट हैं, सम्पूर्ण भक्तसमुदाय आपके युगल चरणारविन्दोंकी बड़े लाड़-प्यारसे सेवा करते हैं। आपको नमस्कार है। अग्नि आपका मुख है, पृथ्वी आपके दोनों चरण हैं, आकाश मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं, सम्पूर्ण लोक आपका शरीर है तथा चारों दिशाएँ आपकी चार भुजाएँ हैं। भगवन्! आपको नमस्कार है। हे स्तुति करनेयोग्य परमात्मन्! हे नाथ! इस पृथ्वीपर कोई भी ऐसे प्रदेश नहीं हैं, जिनमें मेरा जन्म न हुआ हो, जहाँ मेरी मृत्यु न हुई हो। मैं समझता हूँ, यदि मेरे माता-पिताओंकी गणना की जाय, तो यह विशाल पृथ्वी परमाणुओंकी स्थितिमें पहुँच जायगी—असंख्य जन्मोंके मेरे माता-पिताओंकी गणना करनेके लिये पृथ्वीके परमाणु बराबर टुकड़े करने पड़ेंगे। देवदेव! मेरे जो मित्र, शत्रु, अनुजीवी तथा भाई-बन्धु इस संसारमें हो गये हैं, उन सबकी गणना करनेमें मैं सर्वथा असमर्थ हूँ। नाथ! मैंने अपना मन बार-बार आपके चरणोंमें समर्पित किया, परंतु मेरा दुर्जय शत्रु काम अपने क्रोध आदि सहायकोंके द्वारा उसे हठात् अपने वशमें कर लेता है। भगवन्! अब आप ही बताइये, ऐसी दशामें मैं क्या करूँ? सर्वव्यापी परमेश्वर! मैं बहुत ही पीड़ित हूँ। संसाररूपी गड्ढेमें गिरे हुए इस दीनपर आप दया कीजिये। दुर्गतिमें पड़ा
अर्चाविग्रहसे प्रकट होकर भगवान् विष्णु ऐतरेयको दर्शन दे रहे हैं
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १७७ ---|---
हुआ प्राणी भी महात्माओंकी शरणमें आ जानेपर कष्ट नहीं भोगता। रोगी मनुष्योंको शरण देनेवाला वैद्य है, महासागरमें डूबे हुए मनुष्यका सहारा नौका है, बालकको आश्रय देनेवाले माता और पिता हैं, परंतु भगवन् ! अत्यन्त घोर संसार-बन्धनसे दुःखी हुए मनुष्यको शरण देनेवाले केवल आप ही हैं।* सर्वस्वरूप सर्वेश्वर ! प्रसन्न होइये, आप ही सबके कारण हैं। पारमार्थिक सारतत्त्व भी आप ही हैं। महान् दुःख-समूहसे भरे हुए, संसाररूपी गड्ढेसे स्वयं ही हाथ पकड़कर मुझे निकालिये। हे अच्युत ! हे उरुक्रम ! यह संसार भूख और प्याससे; वात, पित्त और कफ—इन तीन धातुओंसे; सर्दी, गरमी, आँधी और वर्षासे, आपसमें ही एक-दूसरेसे तथा कभी तृप्त न होनेवाली कामाग्नि तथा क्रोधाग्निसे बारंबार पीड़ित होता है। इसे इस दशामें देखकर मेरा मन बहुत दुःखी हो रहा है। मैंने अपनी शक्तिके अनुसार सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाले परमेश्वर भगवान् आप वासुदेवका स्तवन किया है। इससे सबका कल्याण हो, सम्पूर्ण जगत्के समस्त दोष नष्ट हो जायँ। आज मेरे द्वारा जगद्दाता वासुदेवकी स्तुति हुई है; इससे इस पृथ्वीपर, अन्तरिक्षमें, स्वर्गलोकमें तथा रसातलमें भी जो कोई प्राणी रहते हों, वे सिद्धिको प्राप्त हों। मेरे द्वारा स्तुति-पाठ करते समय जो लोग इसको सुनते हैं, इस स्तोत्रका उच्चारण करते समय जो मुझे देखते हैं, वे देवता, असुर, मनुष्य तथा पशु-पक्षी कोई भी क्यों न हों, सभी भगवान् विष्णुके तत्त्वका ज्ञान प्राप्त करें। इनके सिवा जो गूँगे तथा अन्यान्य इन्द्रियोंसे रहित हैं, जो देख-सुन नहीं सकते वे, तथा पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े आदि भी आज भगवत्तत्त्वज्ञानके भागी हो जायँ। संसारमें दुःखोंका नाश हो जाय, समस्त प्रजाके हृदयसे लोभ आदि दोषसमुदाय निकल जायँ। अपनेमें, अपने भाई और पुत्रमें जैसा प्रेम और आत्मीयताका भाव होता है, सब लोगोंका सबके प्रति वैसा ही भाव हो जाय। जो संसाररूपी रोगके चिकित्सक, सम्पूर्ण दोषोंके निवारणमें चतुर तथा परमानन्दकी प्राप्तिके हेतुभूत हैं, वे भगवान् विष्णु सबके हृदयमें विराजमान हों और ऐसा होनेसे सब लोगोंके संसार-बन्धन शिथिल हो जायँ। सम्पूर्ण विश्वको धारण करनेवाले भगवान् वासुदेवका स्मरण करनेपर मन, वाणी और शरीरद्वारा आचरित मेरे समस्त पाप नष्ट हो जायँ। हे वासुदेव ! ऐसा उच्चारण करनेपर अथवा भगवान् विष्णुके भक्तकी महिमाका कीर्तन करनेपर, अथवा श्रीहरिका स्मरण करनेपर समस्त पापोंका नाश हो जाता है। यदि यह सत्य है, तो इस सत्यके प्रभावसे मेरा पाप नष्ट हो जाय। अखिलेश्वर ! आपके चरणोंमें पड़े हुए मुझ सेवकपर आप यह सोचकर कृपा कीजिये कि 'यह बेचारा मूढ़ है—कुछ जानता नहीं, इसकी बुद्धि बहुत थोड़ी है, इसके द्वारा उद्यम भी बहुत कम हो पाता है। विषयोंसे इसका मन सदा क्लेशमें पड़ा रहता है, इसीलिये वह मुझमें नहीं लग पाता।' देव ! आपकी स्तुति करनेमें ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं। भगवन् ! आप प्रसन्न होइये। हे विष्णो ! आप बड़े दयालु हैं, मुझ अनाथपर कृपा कीजिये। हे अनन्त ! हे पापहारी हरि ! आप पुरुषोत्तम हैं, संसार-सागरमें डूबे हुए मुझ दीनका उद्धार कीजिये।'
अर्जुन ! ऐतरेयके इस प्रकार स्तुति करनेपर विशालकाय भगवान् वासुदेवने आनन्दमग्न होकर कहा—'वत्स ऐतरेय ! मैं तुम्हारी भक्तिसे और
* सोऽहं भृशार्तः करुणां कुरु त्वं संसारगर्ते पतितस्य विष्णो।
महात्मनां संश्रयमभ्युपेतो नैवावसीदत्यपि दुर्गतोऽपि॥
परायणं रोगवतां हि वैद्यो महाब्धिमग्नस्य च नौर्नरस्य।
बालस्य मातापितरौ सुघोरसंसारखिन्नस्य हरे त्वमेकः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३७। ९१-९२)
१७८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
इस स्तुतिसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे कोई मनोवांछित एवं दुर्लभ वर माँगो।'
ऐतरेयने कहा—नाथ! हरे! मेरा अभीष्ट वर तो यही है कि घोर संसारसागरमें डूबते हुए मुझ असहायके लिये आप कर्णधार हो जायें।
भगवान् वासुदेव बोले—वत्स! तुम तो संसारसागरसे मुक्त ही हो। जो सदा इस स्तोत्रसे गुप्तक्षेत्रमें स्थित हुए मुझ वासुदेवका स्तवन करेगा, उसके सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जायगा। अतः यह 'अघनाशन' नामसे विख्यात होगा। जो एकादशीको उपवास करके मेरे आगे इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह शुद्धचित्त होकर मेरे परम धामको प्राप्त होगा। जैसे सब क्षेत्रोंमें यह गुप्तक्षेत्र मुझे अधिक प्रिय है, उसी प्रकार सब स्तोत्रोंमें यह स्तोत्र मुझे विशेष प्रिय है। जिन प्राणियोंके उद्देश्यसे महात्मा पुरुष इस स्तोत्रका जप करते हैं, वे सब प्राणी मेरी कृपासे शान्ति, ऐश्वर्य तथा उत्तम बुद्धि प्राप्त करेंगे। बेटा! तुम श्रद्धापूर्वक वैदिक धर्मोंका आचरण करो, उन्हें निष्कामभावसे मुझे समर्पित कर देनेपर उनके द्वारा तुम्हें बन्धन नहीं प्राप्त होगा। पत्नीका पाणिग्रहण करके तुम यज्ञोंद्वारा भगवान्की आराधना करो और अपनी माताकी प्रसन्नता बढ़ाओ। मुझमें तीव्र ध्यान करनेसे निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे। बुद्धि, मन, अहंकार, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ—ये तेरह ग्रह हैं। बोद्धव्य, मन्तव्य, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वचन, आदान, कर्म, गमन, मलोत्सर्ग और रतिजनित आनन्द—ये तेरह महाग्रह हैं। बेटा! अपने बुद्धि आदि शुद्ध (आसक्तिशून्य) ग्रहोंके द्वारा मेरा ध्यान करते हुए पूर्वोक्त महाग्रहोंको शुद्ध रूपमें ग्रहण करो, भगवत्प्रसाद मानकर स्वीकार करो। ऐसा करनेसे तुम मोक्ष प्राप्त कर लोगे। वीर! इस प्रकार भगवदर्पण बुद्धिसे कर्म करनेपर तुम नैष्कर्म्यभावको प्राप्त होओगे। ठीक उसी तरह, जैसे चतुर स्वर्णकार रससंबिद्ध ताँबेको सुवर्णके रूपमें उपलब्ध करता है। वर्णाश्रमोचित आचारवाला पुरुष भी यदि अपने सब कर्म मुझे समर्पित करके स्वयं मेरे ध्यानमें संलग्न हो जाता है, तो उसे भी यहाँ मोक्ष दुर्लभ नहीं है। इसलिये मेरे बताये अनुसार बर्ताव करते हुए नियमपरायण होकर तुम आनन्दपूर्वक रहो। अपनी सात पीढ़ियोंका उद्धार करके फिर मुझमें लीन हो जाओगे। यद्यपि वेदोंका अध्ययन तुमने नहीं किया है, तो भी सम्पूर्ण वेद तुम्हारी बुद्धिमें स्वयं प्रतिभासित होंगे। अब यहाँसे कोटितीर्थमें, जहाँ हरिमेधाका यज्ञ हो रहा है, जाओ। वहाँ तुम्हारी माताका सम्पूर्ण मनोरथ सफल होगा।
यों कहकर भगवान् विष्णु पुनः वासुदेव-विग्रहमें ही प्रवेश कर गये। उस समय ऐतरेयकी माता और ऐतरेय दोनों एकटक दृष्टिसे भगवान्की ओर देख रहे थे। तत्पश्चात् वासुदेव-विग्रहको नमस्कार करके विस्मय और आनन्दमें निमग्न हुए ऐतरेयने अपनी मातासे कहा—"माँ! मैं पूर्वजन्ममें शूद्र था, एक दिन सांसारिक दोषोंसे भयभीत हो एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मणकी शरणमें गया। वे बड़े दयालु थे। उन्होंने मुझे द्वादशाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया और कहा, 'सदा इस मन्त्रका जप किया कर।' उनकी इस आज्ञाके अनुसार मैं निरन्तर उस मन्त्रका जप करने लगा। उस जपके प्रभावसे तुम्हारे गर्भसे मेरा जन्म हुआ। मुझे पूर्वजन्मकी स्मृति हुई, भगवान् विष्णुके प्रति मेरे मनमें भक्तिका उदय हुआ और इस तीर्थमें सर्वदा निवास करनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ।" मातासे ऐसा कहकर ऐतरेय यज्ञमें गये और वहाँ यह श्लोक बोले—
नमस्तस्मै भगवते विष्णवेऽकुण्ठमेधसे।
यन्मायामोहितधियो भ्रमामः कर्मसागरे॥
'जिनकी बुद्धि कहीं कुण्ठित नहीं होती तथा जिनकी मायासे मोहितचित्त होकर हमलोग
* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १७९
कर्मोंके समुद्रमें भटक रहे हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है।'
इस श्लोकका आशय बहुत गम्भीर है। हरिमेधा आदि ब्राह्मणोंने जब इसे सुना, तब आसन और पूजा आदिके द्वारा ऐतरेयका बहुत सत्कार किया। तत्पश्चात् ऐतरेयने अपनी विद्यासे उन वेदार्थनिपुण ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया। फिर सबने उन्हें दक्षिणा दी। हरिमेधाने ऐतरेयको अपनी पुत्री भी दे दी। धन और पत्नीको ग्रहण करके ऐतरेय अपने घर आये। उन्होंने माताको आनन्दित किया और अनेकों निर्मल पुत्रोंको जन्म दिया। ऐतरेय सदा द्वादशी व्रतका पालन करते रहे। वे अनेक यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करके निरन्तर वासुदेवका ध्यान किया करते थे। इससे देहत्यागके पश्चात् उन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया। अर्जुन! ऐसी महिमावाले भगवान् वासुदेव यहाँ स्वयं विराजमान हैं। जो इनकी पूजा, अर्चा और स्तुति करता है, उसका सब पुण्य अक्षय माना गया है।
$\sim\sim ० \sim\sim$
भट्टादित्यकी स्थापना तथा नारदजीके द्वारा एक सौ आठ नामोंसे उनकी स्तुति
नारदजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन! भगवान् वासुदेवकी स्थापनाके पश्चात् मैंने पुनः मनुष्योंपर कृपा करनेकी इच्छासे प्रत्यक्ष देवता भगवान् सूर्यको इस तीर्थमें लानेका विचार किया। भगवान् सूर्य समस्त प्राणियोंके उद्गमस्थान हैं। वे इस लोक और परलोकमें भी सबका अभ्युदय करते हैं। श्रीसूर्यदेव सम्पूर्ण विश्वके आधार माने गये हैं। जो भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यका प्रतिदिन स्मरण, कीर्तन और पूजन करते हैं, वे निस्सन्देह कृतार्थ हो जाते हैं। जिसने इस संसारमें जन्म लेकर सहस्रों किरणोंवाले देवेश्वर भगवान् सूर्यका पूजन नहीं किया, उसने अपने आत्मासे ही द्रोह किया है। जो सदा भगवान् सूर्यकी भक्तिमें तत्पर और सर्वदा उन्हींमें मन लगाये रहनेवाले हैं, जो सदा सूर्यका ही स्मरण किया करते हैं, वे कभी दुःखके भागी नहीं होते हैं। भगवान् भास्करकी भक्ति दुर्लभ है, उनका पूजन दुर्लभ है, उनके लिये दान देनेका सौभाग्य दुर्लभ है तथा उनकी प्रसन्नताके लिये होम करना तो और भी दुर्लभ है। जिसकी जिह्वाके अग्रभागमें नमस्कार आदिसे युक्त 'रवि' ये दो अक्षर विराजते हैं, उसका जीवन सफल है। इस प्रकार भगवान् सूर्यके बड़े भारी माहात्म्यका चिन्तन करके मैंने पूरे सौ वर्षतक भक्तिपूर्वक सूर्यदेवकी आराधना की। मैं वायु पीकर रहता और सूर्यसम्बन्धी वैदिक मन्त्रोंके विशुद्ध जपसे भगवान् सूर्यकी स्तुति किया करता था। तब, अत्यन्त तेजके कारण जिनकी ओर देखना बहुत कठिन है, उन भगवान् सूर्यने योगबलसे दूसरी मूर्ति धारण करके आकाशमें
| १८० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
आकर मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दिया। तब मैंने हाथ जोड़कर भगवान्को नमस्कार किया और सामवेदके विविध मन्त्रोंद्वारा उनका स्तवन भी किया। इससे प्रसन्न होकर वर देनेवाले भगवान् सूर्यने कहा—'देवर्षे ! तुमने दीर्घकालतक तपस्याके द्वारा मेरी आराधना की है। अब कोई अभीष्ट वर माँगो।'
उनके ऐसा कहनेपर मैं हाथ जोड़कर बोला—भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना उचित समझते हैं, तो आपकी जो कामरूपिणी कला है, पूर्वकालमें राजा राजवर्धनने जिसकी आराधना की थी, उसी कलाके द्वारा आप सदा हमारी रक्षा करते रहें। तदनन्तर भगवान् सूर्यने सन्तुष्ट होकर जब 'तथास्तु' कह दिया, तब मैंने इस तीर्थमें भट्टादित्यके नामसे उनकी स्थापना की। मुझ भट्टके द्वारा स्थापित होनेके कारण भगवान् सूर्यका उक्त नाम प्रसिद्ध हुआ। तत्पश्चात् फूलोंसे भलीभाँति पूजा करनेपर मूर्तिमें भगवान् सूर्यका आवेश हुआ। यह देख मेरा सम्पूर्ण अंग भक्तिरसके उद्रेकमें डूब गया और मैंने सम्पूर्ण वेदोंके रहस्यभूत एक सौ आठ नामोंद्वारा सूर्यदेवका इस प्रकार स्तवन किया—
भगवान् सूर्य आप १ सप्तसप्ति (सात घोड़ोंसे युक्त रथपर विचरण करनेवाले), २ अचिन्त्यात्मा (जिनका स्वरूप चिन्तनमें नहीं आ सकता), ३ महाकारुणिकोत्तम (अत्यन्त करुणा करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ), ४ संजीवन (सबको भलीभाँति जीवित रखनेवाले), ५ जय (विजयी), ६ जीव (जीवन-दाता), ७ जीवनाथ (जीवोंके स्वामी) और ८ जगत्पति (संसारके स्वामी) हैं। आप ९ कालाश्रय (कालके आधार), १० कालकर्ता, ११ महायोगी, १२ महामति (परम बुद्धिमान्), १३ भूतान्तःकरण (समस्त भूतोंके अन्तरात्मा), १४ देव (द्युतिमान्), १५ कमलानन्दनन्दन (कमलोंका आनन्द बढ़ानेवाले), १६ सहस्रपाद् (किरणरूपी सहस्रों चरणोंसे सुशोभित), १७ वरद (वर देनेवाले), १८ दिव्यमण्डलमण्डित, १९ धर्मप्रिय, २० अर्चितात्मा (पूजित स्वरूपवाले), २१ सविता (सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक), २२ वायुवाहन (प्रवह वायुके सहारे आकाशमें विचरण करनेवाले अथवा वायुके ऊपर स्थित), २३ आदित्य (अदिति-पुत्र), २४ अक्रोधन (क्रोधरहित), २५ सूर्य, २६ रश्मिमाली (किरण-समूहसे सुशोभित), २७ विभावसु (विशेषरूपसे प्रकाशित होनेवाले), २८ दिनकृत (अपने उदयसे दिन प्रकट करनेवाले), २९ दिनहृत् (स्वयं अस्त होकर दिनको हर लेनेवाले), ३० मौनी (मौन रहनेवाले), ३१ सुरथ (सुन्दर रथवाले), ३२ रथिनां वर (रथियोंमें श्रेष्ठ), ३३ राज्ञां पति (राजाओंके अधिपति), ३४ स्वर्णरेता (सुवर्णरूप बीजवाले), ३५ पूषा (पोषण करनेवाले), ३६ त्वष्टा, ३७ दिवाकर, ३८ आकाशतिलक, ३९ धाता (धारण-पोषण करनेवाले), ४० संविभागी (दिन-रातका विभाग करनेवाले), ४१ मनोहर, ४२ प्राज्ञ (विद्वान्), ४३ प्रजापति (बुद्धिके स्वामी अथवा प्रेरक), ४४ धन्य, ४५ विष्णु (व्यापक), ४६ श्रीश (शोभा और संपत्तिके स्वामी), ४७ भिषग्वर (अपनी किरणोंद्वारा नाना प्रकारके रोगोंके निवारण करनेवाले श्रेष्ठ वैद्य), ४८ आलोककृत (प्रकाशक), ४९ लोक-नाथ, ५० लोकपालनमस्कृत, ५१ विदिताशय (सबके अभिप्रायको जाननेवाले), ५२ सुनय (उत्तम नीतिवाले), ५३ महात्मा, ५४ भक्तवत्सल, ५५ कीर्ति, ५६ कीर्तिकर, ५७ नित्य, ५८ रोचिष्णु (कान्तिमान्), ५९ कल्मषापह (पापोंका नाश करनेवाले), ६० जितानन्द (आनन्दको अपने अधीन रखनेवाले), ६१ महावीर्य (परम पराक्रमी), ६२ हंस (आकाशरूपी सरोवरमें हंसके समान विचरण करनेवाले अथवा परमात्मा), ६३ संहारकारक (प्रलयकालमें संवर्तकानलरूपसे प्रकट होकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको दग्ध करनेवाले), ६४ कृतकृत्य,
- माहेष्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १८१ ---|---
६५ असंग (अनासक्त), ६६ बहुज्ञ, ६७ वचसां पति (वाणीके अधिपति), ६८ विश्वपूज्य, ६९ मृत्युहारी, ७० घृणी (दयालु), ७१ धर्मकारण, ७२ प्रणतार्तिहर (शरणागतोंका कष्ट हर लेनेवाले), ७३ अरोग (रोगरहित), ७४ आयुष्मान्, ७५ सुखद, ७६ सुखी, ७७ मंगल, ७८ पुण्डरीकाक्ष (कमलके समान नेत्रोंवाले), ७९ व्रती (व्रतोंका पालन करनेवाले), ८० व्रतफलप्रद (व्रतोंका फल देनेवाले), ८१ शुचि (पवित्र), ८२ पूर्ण, ८३ मोक्ष-मार्ग, ८४ दाता, ८५ भोक्ता, ८६ धन्वन्तरि, ८७ प्रियाभास (जिनका प्रकाश लोकप्रिय है), ८८ धनुर्वेदवित् (धनुर्वेदके ज्ञाता), ८९ एकराट् (आकाशमें एकमात्र प्रकाशित होनेवाले), ९० जगत्पिता, ९१ धूमकेतु (अग्निरूप), ९२ विद्युत् (विशेष दीप्तिमान्), ९३ ध्वान्तहा (अन्धकारनाशक), ९४ गुरु, ९५ गोपति (किरणोंके स्वामी), ९६ कृतातिथ्य (सब लोग अर्घ्य देकर जिनका आतिथ्यसत्कार करते हैं), ९७ शुभाचार (पुण्यकर्मोंके प्रवर्तक), ९८ शुचिप्रिय (पवित्र आचार-विचारवाले जिन्हें अधिक प्रिय हैं), ९९ सामप्रिय (साम-गानके प्रेमी), १०० लोकबन्धु, १०१ नैकरूप (अनेक रूपवाले), १०२ युगादिकृत (युगादिके उत्पादक), १०३ धर्मसेतु (धर्म-मर्यादाके रक्षक), १०४ लोक-साक्षी (सब लोगोंके शुभाशुभ कर्मोंको देखनेवाले), १०५ खेट (आकाशमें विचरनेवाले), १०६ अर्क (अर्चनीय), १०७ सर्वद (सब कुछ देनेवाले) तथा १०८ प्रभु (सर्वशक्तिमान्) हैं। मेरे द्वारा इस प्रकार एक सौ आठ नामोंसे जिनकी भलीभाँति स्तुति की गयी है, वे सर्वलोकप्रिय भगवान् सूर्य समस्त लोकोंपर प्रसन्न हों।
इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने मुझसे कहा—देवर्षे! तुम्हारा प्रिय करनेकी इच्छासे मैं अपनी एक कलाद्वारा सदा इस स्थानमें निवास करूँगा। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक यहाँ मुझ भट्टादित्यकी पूजा करेगा, वह कामरूपधारी साक्षात् मुझ सहस्रांशुके पूजनसे प्राप्त होनेवाले फलको पा लेगा। जो मनुष्य मेरे उद्देश्यसे यहाँ थोड़ा या अधिक दान करेगा, उसे मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा और उसका पुण्य अक्षय होगा। जो मानव रविवारको अथवा षष्ठी या सप्तमी तिथिको लाल कमल, कल्हार, केशर, कनेर तथा सौ पत्तोंवाले महाकमलके पुष्पोंसे यहाँ मेरी पूजा करेंगे, वे जिन-जिन कामनाओंके लिये प्रार्थना करेंगे, उन सबको निश्चय ही प्राप्त कर लेंगे। भक्तिपूर्वक मेरा दर्शन करनेसे रोग और दरिद्रताका नाश होगा। प्रतिदिन मुझे प्रणाम करनेसे स्वर्गकी तथा नित्य प्रति मेरी स्तुति करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होगी।
## महात्मा नन्दभद्रके सारभूत विचार तथा उनके द्वारा सत्यव्रतके नास्तिकतापूर्ण विचारोंका खण्डन
**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! अब बहूदक स्थानकी एक अद्भुत कथा सुनो। कामरूपमें जो बहूदक नामक कुण्ड है, वह इस तीर्थमें आकर भलीभाँति प्रकट हुआ है। इसीलिये इसे बहूदक कहा गया है। महात्मा कपिलने बहुत वर्षोंतक तपस्या करके यहाँ एक बहुत सुन्दर शिवलिंगकी स्थापना की है, जो कपिलेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है। अर्जुन! नन्दभद्र नामके एक वणिक् थे, जो तीनों समय बड़े आदरके साथ कपिलेश्वर लिंगकी पूजा किया करते थे। वे साक्षात् दूसरे धर्मराजकी भाँति समस्त धर्मोंके विशेषज्ञ थे। धर्मोंके विषयमें जो कुछ कहा गया है, उसमें कोई भी ऐसी बात नहीं थी, जो नन्दभद्रको ज्ञात न हो। वे सबके सुहृद् थे और सदा सभीके हितसाधनमें संलग्न
१८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
रहते थे। उन्होंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा इस परोपकार-धर्मका ही आश्रय ले रखा था। संसारमें ऐसा कोई धर्म न तो प्रकट हुआ है और न होनेवाला है, जो सब अवस्थाओंमें सर्वथा निर्दोष हो। इस निश्चयपर पहुँचे हुए नन्दभद्रने इस विशाल धर्म-समुद्रका सब ओरसे मन्थन करके जो सारतत्त्व ग्रहण किया था, उसे बतलाता हूँ, सुनो। नन्दभद्र जीविकाके लिये वाणिज्यको ही श्रेष्ठ मानते थे और उसीको अपनाये हुए थे। उन्होंने थोड़े-से काठ और घास-फूससे अपने रहनेके लिये घर बना रखा था और सब लोगोंकी भलाईके लिये वे थोड़ा-सा ही लाभ लेकर व्यापार करते थे। उनके क्रय-विक्रयकी वस्तुओंमें मदिरा सर्वथा वर्जित थी। उनके यहाँ ग्राहकोंके साथ भेद-भाव नहीं किया जाता था। झूठ और कपटका तो वहाँ नाम भी न था। वस्तुओंके आदान-प्रदानमें वे सबके साथ समतापूर्ण बर्ताव करते थे। बिना छल-कपटके दूसरोंसे खरीदकी वस्तु लेकर उसे बिना किसी धोखाधड़ीके वे सब लोगोंके हाथ बेचते थे; यही उनका श्रेष्ठ व्रत था। कुछ लोग यज्ञकी प्रशंसा करते हैं, परंतु नन्दभद्र ऐसा नहीं मानते थे। उन्होंने यज्ञमें आये हुए कुछ दोषोंको लक्ष्य करके ही ऐसी धारणा बनायी थी, तथापि वे श्रद्धापूर्वक देवपूजन, नमस्कार, स्तुति, नैवेद्य-निवेदन आदि यज्ञकी सारभूत बातोंका सदा ही पालन करते थे। कोई-कोई संन्यासकी प्रशंसा करते हैं, परंतु नन्दभद्र उनसे भी सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि जो विषयोंका बाहरसे त्याग करके मनके द्वारा पुनः उनको ग्रहण करता है वह गृहस्थ और संन्यास अथवा इहलोक और परलोक दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर फटे हुए बादलकी भाँति नष्ट हो जाता है। संन्यासका जो सारभूत उत्तम तत्त्व है, उसका आदर तो नन्दभद्र भी करते थे। वे किसीके कर्मोंकी निन्दा या प्रशंसा नहीं करते थे। अनेक भिन्न-भिन्न मार्गोंमें स्थित हुए लोगोंको चन्द्रमाकी भाँति तटस्थ रहकर लीलापूर्वक देखते थे। किसीके साथ न उनका द्वेष था, न राग; न अनुरोध था, न विरोध। पत्थर और सुवर्णको वे समान समझते तथा अपनी निन्दा और स्तुतिमें भी समान भाव रखते थे। वे स्वभावसे ही धीर थे। सम्पूर्ण भूतोंसे निर्भय रहते थे। अपनी आकृति ऐसी बनाये रखते थे, मानो अन्धे और बहरे हों। कर्मोंके फलकी उन्हें कोई आकांक्षा नहीं थी। अतः वह कर्म उनके लिये भगवान् सदाशिवकी आराधना बन जाता था। इसी कारण वे धर्मका अनुष्ठान तो चाहते और करते थे, परंतु उसमें कोई लोभ नहीं रखते थे। नन्दभद्रने भलीभाँति विचार करके इसीको मोक्षके साररूपसे ग्रहण किया था। कुछ लोग खेतीकी प्रशंसा करते हैं; परंतु नन्दभद्रने उसके भी सारभागको ही अपनाया था। आठ बैलोंसे जुड़ा हुआ एक हल होना चाहिये और खेतीकी आयमेंसे तीसवें भागका त्याग करना चाहिये—उसे धर्मके कार्यमें लगा देना चाहिये। बूढ़े पशुओंका भी स्वयं ही पालन-पोषण करना चाहिये। जो ऐसा करे, वही श्रेष्ठ किसान है। नन्दभद्रने इसीको खेतीका सार मानकर इसका आदर किया था। उनके मतसे प्रतिदिन अपनी शक्तिके अनुसार देवताओं, पितरों, मनुष्यों (अतिथियों), ब्राह्मणों तथा पशु-पक्षी, कीट-पतंगादि भूतोंके लिये अन्न देना चाहिये। सदा इन सबको देकर ही स्वयं भोजन करना उचित है। कुछ लोग ऐश्वर्यकी प्रशंसा करते हैं; परंतु नन्दभद्र उसे भी प्रशंसाके योग्य नहीं मानते थे। क्योंकि ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त हो मनुष्य दूसरे मनुष्योंको दास बनाकर उनका उपभोग करते हैं। वे मनुष्योंका वध करते हैं, उन्हें बाँधते हैं और बंदी बनाकर दिन-रात पीड़ा देते हैं। ऐश्वर्यशाली पुरुष अपनेको अजर-अमर समझकर दूसरोंके साथ दुर्व्यवहार करते
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १८३
हैं। उनपर ऐश्वर्यका मद तो रहता ही है, मदिरापानके मदसे भी वे अत्यन्त मतवाले हो उठते हैं। वास्तवमें जो धनके मदसे उन्मत्त होता है, वह पतित होकर विवेक खो बैठता है। अतः सम्पूर्ण भूतों (प्राणियों)-को अपना स्वरूप मानकर उनके प्रति अपने ही जैसा बर्ताव करना चाहिये। जिसकी सर्वत्र आत्मदृष्टि है, वह ऐश्वर्यसे मतवाला नहीं होता। जो सबके शरीरमें अपने ही जैसे सुख-दुःखका अनुभव करता हो, ऐसा ऐश्वर्यशाली पुरुष आज कहाँ है? इसलिये नन्दभद्रने ऐश्वर्यका जो सार ग्रहण किया था, वह भी सुनो। वे अपनी शक्तिके अनुसार सभी प्राणियोंकी सेवा करते थे, किसीकी भी सेवासे विमुख नहीं होते थे।
इस प्रकार इधर-उधर प्रकट हुए सारभूत सदाचारका संग्रह करके बुद्धिमान् नन्दभद्र उसीका पालन करते थे। इस आचरणसे रहनेवाले साधु-शिरोमणि नन्दभद्रके सद्व्यवहारकी देवतालोग भी स्पृहा रखते थे। इन्द्र आदि सब देवताओंको उनकी स्थिति देखकर बड़ा विस्मय होता था। इसी स्थानमें एक शूद्र भी रहता था, जो नन्दभद्रका पड़ोसी था। उसका नाम तो था सत्यव्रत, किंतु वह बड़ा भारी नास्तिक और दुराचारी था। धर्मपरायण नन्दभद्रपर बारंबार दोषारोपण किया करता था और सदा उनके दोष ही ढूँढ़ता रहता था। उसकी इच्छा थी, यदि इनका कोई छिद्र देख पाऊँ तो इन्हें धर्मसे गिरा दूँ। खोटे हृदयवाले क्रूर नास्तिकोंका यह स्वभाव ही होता है कि वे अपनेको तो नीचे गिराते ही हैं, दूसरोंको भी गिरानेकी चेष्टा करते हैं।
धार्मिक वृत्तिसे रहनेवाले बुद्धिमान् नन्दभद्रके वृद्धावस्थामें बड़े कष्टसे एक पुत्र हुआ, किंतु वह चल बसा। इसे प्रारब्धका फल मानकर उन महामति वैश्यने शोक नहीं किया। देवता हो या मनुष्य, प्रारब्धके विधानसे कौन छूट पाता है। तदनन्तर नन्दभद्रकी प्यारी पत्नी कनका, जो अरुन्धतीकी भाँति साध्वी स्त्रियोंके समस्त सद्गुणोंसे विभूषित तथा गृहस्थधर्मकी साक्षात् मूर्ति थी, सहसा मृत्युको प्राप्त हो गयी। नन्दभद्र जितेन्द्रिय थे; फिर भी पत्नीके न रहनेसे गृहस्थ-धर्मका नाश होगा, यह सोचकर उन्हें शोक हुआ।
नन्दभद्रका यह अन्तर देखकर सत्यव्रतको बहुत दिनोंके बाद बड़ी प्रसन्नता हुई। वह 'हाय-हाय! बड़े कष्टकी बात हुई' ऐसा कहता हुआ शीघ्र ही नन्दभद्रके पास आया और मित्रकी भाँति मिलकर उनसे बोला—'हा नन्दभद्र! यदि तुम-जैसे धर्मात्माको भी ऐसा फल मिला तो इससे मेरे मनमें यही आता है कि यह धर्म-कर्म व्यर्थ ही है। भाई नन्दभद्र! मैं सदा तुमसे कुछ कहना चाहता था, किंतु तुम्हारी ओरसे कोई प्रस्ताव न होनेके कारण मैंने कभी कुछ नहीं कहा, क्योंकि बिना किसी प्रस्तावके बृहस्पतिजी भी कोई बात कहें, तो उनकी बुद्धिकी अवहेलना होती है और उन्हें नीच पुरुषकी भाँति अपमान प्राप्त होता है। मैं वाणीके अठारह और बुद्धिके नौ दोषोंसे रहित सर्वथा निर्दोष वाक्य बोलूँगा। सूक्ष्मता, संख्या, क्रम, निर्णय और प्रयोजन—ये पाँच अर्थ जिसमें उपलब्ध होते हैं, उसे 'वाक्य' कहते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके उद्देश्यसे जो कुछ कहा जाता है, वह 'प्रयोजन' नामक वाक्य कहा गया है। यह वाक्यका प्रथम लक्षण है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके विषयमें प्रतिज्ञा करके वाक्यके उपसंहारमें 'यही वह है' ऐसा कहकर जो विशेषरूपसे सिद्धान्त बताया जाता है, वह 'निर्णय' नामक वाक्य है। 'यह पहले और यह पीछे कहना चाहिये'—इस प्रकार क्रमविभागपूर्वक जो प्रस्तुत विषयका प्रतिपादन किया जाता है, उसे वाक्यतत्त्वके ज्ञाता विद्वान् 'क्रमयोग' कहते हैं। जहाँ दोषों और गुणोंका
१८४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
यथावत् विभाग करके दोनोंके लिये प्रमाण उपस्थित किया जाय उसे 'संख्या' वाक्य समझना चाहिये। और जहाँ वाक्यके विभिन्न अर्थोंमें अभेद देखा जाता है, उस अतिशय अभेदकी प्रतीतिमें जो हेतु है; उसे ही 'सूक्ष्मता' कहते हैं। यह वाक्यके गुणोंकी गणना हुई। अब वाणीके अठारह दोषोंका वर्णन सुनो। अपेतार्थ, अभिन्नार्थ, अप्रवृत्त, अधिक, अश्लक्ष्ण, सन्दिग्ध, पदान्त अक्षरका गुरु होना, पराङ्मुखमुख, अनृत एवं असंस्कृत, त्रिवर्गविरुद्ध, न्यून, कष्टशब्द, अतिशब्द, व्युत्क्रमाभिहत, सशेष, अहेतुक तथा निष्कारण*—ये वाणीके दोष हैं। अब बुद्धिके दोषोंको सुनो। काम, क्रोध, भय, लोभ, दैन्य, अनार्जव (कुटिलता)—इन छः दोषोंसे युक्त होकर तथा दया, सम्मान और धर्म—इन तीन गुणोंसे हीन होकर मैं कोई बात न कहूँगा। (उक्त छः दोषोंके साथ दयाहीनता, सम्मानहीनता और धर्महीनता—ये तीन दोष और मिल जानेसे नौ दोष होते हैं।) जब वक्ता, श्रोता और वाक्य तीनों अविकल रहकर बोलनेकी इच्छामें समान अवस्थाको प्राप्त हों, तभी वक्ताका अभिप्राय यथावत् रूपसे प्रकट होता है। बातचीत करते समय जब वक्ता श्रोताकी अवहेलना करता है अथवा श्रोता ही वक्ताकी उपेक्षा करने लगता है, तब बोला हुआ वाक्य बुद्धिपथपर नहीं चढ़ता। इसके सिवा, जो सत्यका परित्याग करके अपनेको अथवा श्रोताको प्रिय लगनेवाला वचन बोलता है, उसके उस वाक्यमें सन्देह उत्पन्न होने लगता है; अतः वह वाक्य भी सदोष ही है। इसलिये जो अपनेको या श्रोताको प्रिय लगनेवाली बात छोड़कर केवल सत्य ही बोलता है, वही इस पृथ्वीपर यथार्थ वक्ता है, दूसरा नहीं।
शास्त्रोंके जालसे पृथक् हो मिथ्यावादोंको छोड़कर केवल सत्य कहना ही मेरा व्रत है। इसलिये मैं 'सत्यव्रत' कहलाता हूँ। मैं तुमसे सच्ची बात कहूँगा और तुम्हें भी उसे सत्य मानकर ही स्वीकार करना चाहिये। भलेमानुस ! जबसे तुम पत्थर पूजनेमें लग गये, तबसे तुम्हें कोई अच्छा फल मिला हो, ऐसा मैं नहीं देखता। तुम्हारे एक ही तो पुत्र था, वह भी नष्ट हो गया। पतिव्रता पत्नी थी, सो भी संसारसे चल बसी। साधो ! झूठे तथा कपटपूर्ण कर्मोंका ही ऐसा फल हुआ करता है। भैया ! देवता कहाँ हैं? सब मिथ्या है। यदि होते तो दिखायी न देते? यह सब कुछ कपटी ब्राह्मणोंकी झूठी कल्पना है। लोग पितरोंके उद्देश्यसे दान देते हैं, यह देखकर मुझे तो हँसी आती है। मेरी दृष्टिमें यह अन्नकी बरबादी है। भला, मरा हुआ मनुष्य क्या खायेगा? मूर्ख एवं नीच ब्राह्मण, जो समस्त संसारकी सृष्टिका अनेक प्रकारसे वर्णन किया करते हैं, उसमें भी जो यथार्थ बात है उसे सुनो। संसारकी सृष्टि और संहार—ये दोनों बातें झूठी हैं। वास्तवमें यह जगत् सत्य है और इसी रूपमें सदा बना रहता है। यह विश्व स्वभावसे ही सदा वर्तमान
* जिस वाणीके उच्चारण करनेपर भी अर्थका भान न हो, वह 'अपेतार्थ' है। जिससे अर्थभेदकी स्पष्ट प्रतीति न हो, वह अभिन्नार्थ है। जो सदा व्यवहारमें न आता हो ऐसा शब्द 'अप्रवृत्त' कहा गया है। जिसके न रहनेपर भी वाक्यार्थ-बोध हो जाता है, वह वाक् या शब्द अधिक है। अस्पष्ट अथवा अपरिमार्जित वाणीको अश्लक्ष्ण कहते हैं। जिससे अर्थमें सन्देह हो वह सन्दिग्ध है। पदान्त अक्षरका गुरु उच्चारण भी एक दोष ही है। वक्ता जिस अर्थको व्यक्त करना चाहता है, उसके विपरीत अर्थकी ओर जानेवाली वाणीको पराङ्मुखमुख कहा गया है। अनृतका अर्थ है असत्य। व्याकरणसे सिद्ध न होनेवाली वाणीको असंस्कृत कहते हैं। धर्म, अर्थ और कामके विपरीत विचार प्रकट करनेवाली वाणी त्रिवर्ग-विरुद्ध कही गयी है। अर्थ-बोधके लिये पर्याप्त शब्दका न होना न्यून दोष है। जिसके उच्चारणमें क्लेश हो, वह कष्टशब्द है। अतिशयोक्तिपूर्ण शब्दको यहाँ अतिशब्द कहा है। जहाँ क्रमका उल्लंघन करके शब्दप्रयोग हुआ हो, वह व्युत्क्रमाभिहत कहलाता है। वाक्य पूरा होनेपर भी यदि बात पूरी नहीं हुई तो वहाँ सशेष नामक दोष है। कथित अर्थकी सिद्धिके लिये जहाँ उचित तर्क या युक्तिका अभाव हो; वहाँ अहेतुक दोष है। जब किसी बातके कहे जानेका कोई कारण नहीं बताया गया हो अथवा किसी शब्दके प्रयोगका उचित कारण न हो, तब वहाँ निष्कारण दोष है।