संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १७१
रहता है। इसके बाद जब वह कुछ बड़ा होता है, तब अक्षरोंके अध्ययन आदिसे और गुरुके शासनसे उसको महान् दुःख होता है।
युवावस्थामें रागोन्मत्त पुरुषकी सम्पूर्ण इन्द्रिय-वृत्तियाँ काम तथा रागकी पीड़ासे सदा मतवाली रहती हैं। अतः उसे भी कहाँसे सुख प्राप्त हो सकता है। मोहवश पुरुषको यदि कहीं अनुराग हो जाता है तो ईर्ष्याके कारण उसे बड़ा भारी दुःख होता है। जो उन्मत्त और क्रोधी है उसका कहीं भी राग होना केवल दुःखका ही कारण है। रातमें कामाग्निजनित खेदसे पुरुषको निद्रा नहीं आती। दिनमें भी द्रव्योपार्जनकी चिन्ता लगी रहनेके कारण उसे सुख नहीं मिल सकता। स्त्रियाँ सब दोषोंका आश्रय हैं; यह बात भलीभाँति जान लेनेपर भी जो लोग उनमें मैथुनसे सुख मानते हैं, उनका वह सुख मल-मूत्र-त्यागके सदृश ही माना गया है। सम्मान अपमानसे, प्रियजनोंका संयोग वियोगसे तथा जवानी वृद्धावस्थासे ग्रस्त है। निर्विघ्न सुख कहाँ है?
युवावस्थाका शरीर एक दिन जरा अवस्थासे जर्जर कर दिया जानेपर सम्पूर्ण कार्योंके लिये असमर्थ हो जाता है। उसके बदनमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, सिरके बाल सफेद हो जाते हैं और शरीर बहुत ढीला-ढाला हो जाता है। स्त्री और पुरुषका वही रूप, जो जवानीके दिनोंमें एक-दूसरेका आधार था, जराग्रस्त हो जानेपर दोनोंमेंसे किसीको भी प्रिय नहीं लगता। बुढ़ापेसे दबा हुआ पुरुष असमर्थ होनेके कारण पत्नी-पुत्र आदि बन्धु-बान्धवों तथा दुराचारी सेवकोंद्वारा भी अपमानित होता है। वृद्धावस्थामें रोगातुर पुरुष धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका साधन करनेमें असमर्थ हो जाता है; इसलिये युवावस्थामें ही धर्मका आचरण करना चाहिये।
वात, पित्त और कफकी विषमता ही व्याधि कहलाती है। इस शरीरको वात आदिका समूह बताया गया है। इसलिये अपना यह शरीर व्याधिमय है; ऐसा जानना चाहिये। इस शरीरमें अनेक प्रकारके रोगोंद्वारा बहुतेरे दुःख प्रवेश कर जाते हैं। उनका पता अपने-आपको भी नहीं लगता, फिर दूसरोंको तो लग ही कैसे सकता है। इस देहमें एक सौ एक व्याधियाँ स्थित हैं। इनमेंसे एक व्याधि तो कालके साथ रहती है और शेष आगन्तुक मानी गयी हैं। जो आगन्तुक बतायी गयी हैं, वे तो दवा करनेसे तथा जप, होम और दानसे शान्त हो जाती हैं; परन्तु मृत्युरूप व्याधि कभी शान्त नहीं होती। नाना प्रकारकी व्याधियाँ, सर्प आदि प्राणी, विष और अभिचार (पुरश्चरण)—ये सब देहधारियोंकी मृत्युके द्वार बताये गये हैं। यदि जीवका काल आ पहुँचा है, तो सर्प और रोग आदिसे पीड़ित होनेपर उसे धन्वन्तरि भी जीवित नहीं रख सकते। कालसे पीड़ित मनुष्यको औषध, तपस्या, दान, मित्र तथा बन्धु-बान्धव—कोई भी बचा नहीं सकते। रसायन, तपस्या, जप, योग, सिद्ध-महात्मा तथा पण्डित—ये सब मिलकर भी कालजनित मृत्युको नहीं टाल सकते। समस्त प्राणियोंके लिये मृत्युके समान कोई दुःख नहीं है, मृत्युके समान कोई भय नहीं है तथा मृत्युके समान कोई त्रास नहीं है। सती भार्या, उत्तम पुत्र, श्रेष्ठ मित्र, राज्य, ऐश्वर्य और सुख—ये सभी स्नेहपाशमें बँधे हुए हैं। मृत्यु इन सबका उच्छेद कर डालती है। माँ! क्या तुम नहीं देखती कि हजारों मनुष्योंमेंसे पाँच भी शायद ही ऐसे होंगे, जो पूरे सौ वर्षोंतक जीनेवाले हों। कोई-ही-कोई अस्सी वर्ष और सत्तर वर्षकी अवस्थामें मरते हैं। प्रायः साठ वर्षतककी ही लोगोंकी परमायु हो गयी है; किंतु वह भी सबके लिये निश्चित नहीं है। जिस देहधारीको अपने पूर्वकर्मानुसार जितनी आयु प्राप्त होती है, उसका आधा भाग तो मृत्युरूपिणी रात्रि हर लेती है। बाल्यावस्था, अबोधावस्था तथा वृद्धावस्थाके