संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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द्वारा बीस वर्ष और व्यतीत हो जाते हैं—जो धर्म, अर्थ और काम—किसीके भी उपयोगमें नहीं आते। शेष आयुका आधा भाग मनुष्यपर आनेवाले बहुत-से भय तथा अनेक प्रकारके रोग और शोक आदि हर लेते हैं। इन सबसे जो शेष रह जाता है, वही मनुष्यका जीवन है।
इस जीवनकी समाप्ति होनेपर मनुष्य अत्यन्त भयंकर मृत्युको प्राप्त होता है। मृत्युके बाद वह पुनः करोड़ों योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है। कर्मोंकी गणनाके अनुसार देह-भेदसे जो जीवका एक शरीरसे वियोग होता है, उसे 'मृत्यु' नाम दिया गया है, वास्तवमें उससे जीवका विनाश नहीं होता। मृत्युके समय महान् मोहको प्राप्त हुए जीवके मर्मस्थान जब विदीर्ण होने लगते हैं, उस दशामें उसे जो बड़ा भारी कष्ट भोगना पड़ता है, उसकी इस संसारमें कहीं उपमा नहीं है। जैसे साँप मेंढकको निगल जाता है, उसी प्रकार मृत्यु जब मनुष्यको निगलने लगती है, उस समय वह हा तात! हा मातः! हा कान्ते! इत्यादि रूपसे पुकारता हुआ अत्यन्त दुःखी हो-होकर रोता है। भाई-बन्धुओंसे साथ छूट रहा है, प्रेमीजन उसे चारों ओरसे घेरकर खड़े हैं। वह सूखते हुए मुखसे गरम-गरम लंबी साँस खींचता है। चारपाईपर चारों ओर बार-बार करवट बदलता है। पीड़ासे मोहित होकर बड़े वेगसे इधर-उधर हाथ फेंकता है। खाटसे भूमिपर और भूमिसे खाटपर तथा फिर भूमिपर आना चाहता है। उसके वस्त्र खुल गये हैं, लज्जा छूट चुकी है, विष्ठा और मूत्रमें सना हुआ है। कण्ठ, ओष्ठ और तालू सूख जानेके कारण बार-बार पानी माँगता है। अपने धन-वैभवके लिये इस बातकी चिन्ता करता है कि मेरे मर जानेपर ये किसके हाथमें पड़ेंगे। पुनः कालपाशसे खींचे जानेपर उसका गला घुरघुराने लगता है और पार्श्ववर्ती लोगोंके देखते-देखते मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जैसे तृणजलौका जलमें बहते हुए तिनकेके अन्ततक पहुँचकर जब दूसरा तिनका थाम लेती है, तब पहलेको छोड़ देती है। उसी प्रकार जीव एक देहसे दूसरी देहमें क्रमशः प्रवेश करता है। भावी शरीरमें अंशतः प्रवेश करके पूर्वशरीरका त्याग करता है।
विवेकी पुरुषके लिये किसीसे कुछ माँगना मृत्युसे भी अधिक दुःखदायी होता है। मृत्युका दुःख तो क्षणभरमें समाप्त हो जाता है, परंतु याचनाजनित दुःखका कभी अन्त नहीं होता। मैंने तो इस समय यह अनुभव किया है कि मृत मनुष्य जीवित रहकर याचना करनेवालेकी अपेक्षा श्रेष्ठ है; क्योंकि अब वह फिर दूसरे किसीके सामने हाथ नहीं फैला सकता। तृष्णा ही लघुताका कारण है। आदिमें दुःख है, मध्यमें दुःख है तथा अन्तमें भी दारुण दुःख प्राप्त होता है। दुःखोंकी यह परंपरा समस्त प्राणियोंको स्वभावतः प्राप्त होती है। क्षुधाको सब रोगोंसे महान् रोग माना गया है। वह अन्नरूपी ओषधिका लेप करनेसे कुछ क्षणोंके लिये शान्त हो जाती है। क्षुधारूपी व्याधिकी तीव्र वेदना सम्पूर्ण बलका उच्छेद करनेवाली है। जैसे अन्य रोगोंसे लोग मरते हैं, उसी प्रकार क्षुधासे पीड़ित होनेपर भी मनुष्यकी मृत्यु हो जाती है। (यदि कहें धन-धान्यसम्पन्न राजा सुखी होंगे तो यह भी ठीक नहीं।) राजाको केवल यह अभिमान ही होता है कि मेरे घरमें इतना वैभव शोभा पा रहा है। वास्तवमें तो उनका सारा आभरण भाररूप है, समस्त आलेपन-द्रव्य मलमूत्र है, सम्पूर्ण संगीत-राग प्रलापमात्र है तथा नृत्य आदि भी पागलोंकी-सी चेष्टा है। विचार-दृष्टिसे देखनेपर इन राज्यभोगोंके द्वारा राजाओंको सुख कहाँ मिलता है? क्योंकि वे लोग तो एक-दूसरेको जीतनेके लिये सदा ही चिन्तित रहते हैं। प्रायः राज्यलक्ष्मीके मदसे उन्मत्त होनेके कारण नहुष आदि महाराज स्वर्गका साम्राज्य पाकर भी वहाँसे नीचे गिर गये हैं। राजलक्ष्मी अथवा धन-