संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १७३
ऐश्वर्यसे भला कौन सुख पाता है? मनुष्य स्वर्गलोकमें जो पुण्यफल भोगते हैं, वह अपने मूलधनको गँवाकर ही भोगते हैं; क्योंकि वहाँ वे दूसरा नवीन कर्म नहीं कर सकते। यही स्वर्गमें अत्यन्त भयंकर दोष है। जैसे वृक्षकी जड़ काट देनेपर वह विवश होकर पृथ्वीपर गिर पड़ता है, उसी प्रकार पुण्यरूपी मूलका क्षय हो जानेपर स्वर्गवासी जीव पुनः पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं। इस तरह विचारपूर्वक देखा जाय तो स्वर्गमें भी देवताओंको कोई सुख नहीं है। नरकमें गये हुए पापी जीवोंका दुःख तो प्रसिद्ध ही है—उनका क्या वर्णन किया जाय। स्थावर-योनिमें पड़े हुए जीवोंको भी बहुत दुःख भोगने पड़ते हैं। दावानलसे जलना, पाला पड़नेसे गलना, धूप और हवासे सूखना, कुल्हाड़ीसे काटा जाना, उनके वल्कलों (छिलकों)-का उतारा जाना, प्रचण्ड आँधीके वेगसे पत्तों, डालियों और फलोंका गिराया जाना तथा हाथियों और अन्य जंगली जन्तुओंद्वारा कुचला जाना आदि उनके लिये महान् दुःख हैं।
सर्पों और बिच्छुओंको प्यास और भूखका कष्ट रहता है, उन्हें क्रोधका भी दारुण दुःख सहन करना पड़ता है। संसारमें प्रायः दुष्ट साँप-बिच्छुओंको मारा जाता है, उन्हें जालमें फँसाकर बंद रखा जाता है। माताजी! इस प्रकार उस योनिके जीवोंको बारंबार कष्ट उठाना पड़ता है। कीड़े आदिका अकस्मात् जन्म होता है और अचानक ही उनकी मौत भी हो जाती है; अतः उनका दुःख भी कम नहीं है। मृगों और पक्षियोंको वर्षा, सर्दी और धूपका महान् कष्ट तो है ही, भूख-प्यासके भारी दुःखसे भी मृग सदा संत्रस्त रहते हैं। पशु-समूहके जो दुःख हैं, उन्हें भी सुन लो। भूख-प्यास तथा सर्दी-गरमी आदिका कष्ट सहना, मारा जाना, बन्धनमें डाला जाना और डंडे आदिसे पीटा जाना, नाकका छेदा जाना, चाबुक और अंकुशकी मार पड़ना आदि उनके महान् क्लेश हैं। इनके अतिरिक्त बोझ ढोनेका भी उन्हें बड़ा भारी कष्ट है। कार्यकी शिक्षा देते समय भी उन्हें मारा-पीटा जाता है, फिर युद्ध आदिकी पीड़ा भी सहनी पड़ती है। अपने झुंडसे जो उनका वियोग होता है और वे वनसे जो अन्यत्र लाये जाते हैं—यह सब कष्ट अलग हैं।
दुर्भिक्ष, दुर्भाग्यका प्रकोप, मूर्खता, दरिद्रता, नीच-ऊँचका भाव, मृत्यु, राष्ट्रविप्लव (एक राज्यका नाश करके दूसरे राज्यकी स्थापना), पारस्परिक अपमानका दुःख, आपसमें एक-दूसरेसे धन-वैभव या मान-प्रतिष्ठामें बढ़ जानेका कष्ट, अपनी प्रभुताका सदा स्थिर न रहना, ऊँचे चढ़े हुए लोगोंका नीचे गिराया जाना इत्यादि महान् दुःखोंसे यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है। जैसे इस कंधेका भार उस कंधेपर कर देनेको मनुष्य विश्राम समझता है, उसी प्रकार इस लोकमें एक दुःख दूसरे दुःखसे ही शान्त होता है। अतः एक-दूसरेसे ऊँची स्थितिमें स्थित हुए इस सम्पूर्ण जगत्को दुःखोंसे भरा हुआ जानकर उसकी ओरसे अत्यन्त उद्विग्न हो जाना चाहिये। उद्वेगसे वैराग्य होता है, वैराग्यसे ज्ञान प्रकट होता है तथा ज्ञानसे परमात्मा विष्णुको जानकर मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
माँ! जैसे कौओंके अपवित्र स्थानमें विशुद्ध राजहंस नहीं रह सकता, उसी प्रकार ऐसे दुःखमय संसारमें मैं तो कभी रम नहीं सकता। मैया! जहाँ रहकर मैं बिना किसी विघ्न-बाधाके आनन्दपूर्वक रह सकता हूँ, वह स्थान भी बताता हूँ, सुनो। अविद्यारूपी वन तो बड़ा भयंकर है। उसमें नाना प्रकारके कर्ममय बड़े-बड़े वृक्ष खड़े हैं। वहाँ संकल्पोंके डाँस और मच्छर बहुत हैं। शोक और हर्ष ही वहाँकी सर्दी और धूप हैं। उस वनमें मोहका घना अन्धकार छाया रहता है। वहाँ