भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१७० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


किसीको निरन्तर छेदा जाय तो उसे जितनी पीड़ा हो सकती है, उससे आठ गुनी पीड़ा गर्भमें भोगनी पड़ती है। इस प्रकार स्थावर-जंगम सभी प्राणियोंको अपने-अपने गर्भके अनुरूप यह महान् गर्भ-दुःख प्राप्त होता है; ऐसा कहा गया है।

गर्भमें स्थित होनेपर सभीको अपने पूर्वजन्मोंका स्मरण हो आता है। उस समय जीव इस प्रकार सोचता है—'अहो! मैं मरकर पुनः उत्पन्न हुआ और उत्पन्न होकर पुनः मृत्युको प्राप्त हुआ। जन्म ले-लेकर मैंने सहस्रों योनियोंका दर्शन किया है। इस समय जन्म धारण करते ही मेरे पूर्वसंस्कार जाग उठे हैं; अतः अब मैं ऐसे कल्याणकारी साधनका अनुष्ठान करूँगा, जिससे पुनः मेरा गर्भवास न हो। संसार-बन्धनको दूर करनेवाले भगवदीय तत्त्वज्ञानका मैं चिन्तन करूँगा।' इस प्रकार उस दुःखसे छूटनेके उपायपर विचार करता हुआ गर्भस्थ जीव चिन्तामग्न रहता है। जब उसका जन्म होने लगता है, उस समय तो उसे गर्भकी अपेक्षा भी कोटिगुना अधिक दुःख होता है। गर्भवासके समय जो सद्बुद्धि जाग्रत् हुई रहती है, वह जन्म हो जानेपर नष्ट हो जाती है। बाहरकी हवा लगते ही मूढ़ता आ जाती है। मोहग्रस्त होनेपर शीघ्र ही उसकी स्मरणशक्तिका नाश हो जाता है। स्मरणशक्ति नष्ट होनेपर पूर्वकर्मवशात् जीवका पुनः उसी जन्म (-के शरीर आदि)-में अनुराग हो जाता है। इस प्रकार राग और मोहके वशीभूत हुआ वह संसारमें न करनेयोग्य पापादि कर्मोंमें लग जाता है। उनमें फँसकर न तो वह अपनेको जानता है, न दूसरोंको जानता है और न किसी देवताको ही कुछ समझता है। अपने परम कल्याणकी बाततक नहीं सुनता। आँख रहते हुए भी नहीं देखता। समतल मार्गपर धीरे-धीरे चलते हुए भी वह पग-पगपर लड़खड़ाता है। विद्वानोंके समझानेपर भी, बुद्धि रहते हुए भी वह नहीं समझ पाता, इसीलिये राग और मोहके वशीभूत होकर संसारमें क्लेश उठाता रहता है। जन्म लेनेपर गर्भकालमें जाग्रत् हुई पूर्वजन्मकी स्मृति अथवा गर्भके दुःखोंकी स्मृति नहीं रहती, इसलिये महर्षियोंने गर्भदुःखका निरूपण करनेके लिये शास्त्रोंका प्रतिपादन किया है। वे शास्त्र स्वर्ग और मोक्षके उत्तम साधन हैं। सब कार्यों और प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाले इस शास्त्रज्ञानके रहते हुए भी लोग उससे अपने कल्याणका साधन नहीं करते। यह अत्यन्त अद्भुत बात है।

बाल्यावस्थामें इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ अव्यक्त रहती हैं, इसलिये जीव उस समयके महान् दुःखको बतानेकी इच्छा होनेपर भी बता नहीं सकता और न उस दुःखके निवारणके लिये कुछ कर ही सकता है। फिर जब दाँत उठने लगता है तब उसे महान् कष्ट भोगना पड़ता है। मौल रोग (सिरदर्द), नाना प्रकारके बालरोग तथा पूतना आदि बालग्रह आदिसे भी बालकको बड़ी पीड़ा होती है। भूख-प्यासकी पीड़ासे उसके सब अंग व्याकुल रहते हैं तथा वह कहीं खाट आदिपर पड़ा हुआ रोता