भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 207

१७८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

इस स्तुतिसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे कोई मनोवांछित एवं दुर्लभ वर माँगो।'

ऐतरेयने कहा—नाथ! हरे! मेरा अभीष्ट वर तो यही है कि घोर संसारसागरमें डूबते हुए मुझ असहायके लिये आप कर्णधार हो जायें।

भगवान् वासुदेव बोले—वत्स! तुम तो संसारसागरसे मुक्त ही हो। जो सदा इस स्तोत्रसे गुप्तक्षेत्रमें स्थित हुए मुझ वासुदेवका स्तवन करेगा, उसके सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जायगा। अतः यह 'अघनाशन' नामसे विख्यात होगा। जो एकादशीको उपवास करके मेरे आगे इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह शुद्धचित्त होकर मेरे परम धामको प्राप्त होगा। जैसे सब क्षेत्रोंमें यह गुप्तक्षेत्र मुझे अधिक प्रिय है, उसी प्रकार सब स्तोत्रोंमें यह स्तोत्र मुझे विशेष प्रिय है। जिन प्राणियोंके उद्देश्यसे महात्मा पुरुष इस स्तोत्रका जप करते हैं, वे सब प्राणी मेरी कृपासे शान्ति, ऐश्वर्य तथा उत्तम बुद्धि प्राप्त करेंगे। बेटा! तुम श्रद्धापूर्वक वैदिक धर्मोंका आचरण करो, उन्हें निष्कामभावसे मुझे समर्पित कर देनेपर उनके द्वारा तुम्हें बन्धन नहीं प्राप्त होगा। पत्नीका पाणिग्रहण करके तुम यज्ञोंद्वारा भगवान्‌की आराधना करो और अपनी माताकी प्रसन्नता बढ़ाओ। मुझमें तीव्र ध्यान करनेसे निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे। बुद्धि, मन, अहंकार, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ—ये तेरह ग्रह हैं। बोद्धव्य, मन्तव्य, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वचन, आदान, कर्म, गमन, मलोत्सर्ग और रतिजनित आनन्द—ये तेरह महाग्रह हैं। बेटा! अपने बुद्धि आदि शुद्ध (आसक्तिशून्य) ग्रहोंके द्वारा मेरा ध्यान करते हुए पूर्वोक्त महाग्रहोंको शुद्ध रूपमें ग्रहण करो, भगवत्प्रसाद मानकर स्वीकार करो। ऐसा करनेसे तुम मोक्ष प्राप्त कर लोगे। वीर! इस प्रकार भगवदर्पण बुद्धिसे कर्म करनेपर तुम नैष्कर्म्यभावको प्राप्त होओगे। ठीक उसी तरह, जैसे चतुर स्वर्णकार रससंबिद्ध ताँबेको सुवर्णके रूपमें उपलब्ध करता है। वर्णाश्रमोचित आचारवाला पुरुष भी यदि अपने सब कर्म मुझे समर्पित करके स्वयं मेरे ध्यानमें संलग्न हो जाता है, तो उसे भी यहाँ मोक्ष दुर्लभ नहीं है। इसलिये मेरे बताये अनुसार बर्ताव करते हुए नियमपरायण होकर तुम आनन्दपूर्वक रहो। अपनी सात पीढ़ियोंका उद्धार करके फिर मुझमें लीन हो जाओगे। यद्यपि वेदोंका अध्ययन तुमने नहीं किया है, तो भी सम्पूर्ण वेद तुम्हारी बुद्धिमें स्वयं प्रतिभासित होंगे। अब यहाँसे कोटितीर्थमें, जहाँ हरिमेधाका यज्ञ हो रहा है, जाओ। वहाँ तुम्हारी माताका सम्पूर्ण मनोरथ सफल होगा।

यों कहकर भगवान् विष्णु पुनः वासुदेव-विग्रहमें ही प्रवेश कर गये। उस समय ऐतरेयकी माता और ऐतरेय दोनों एकटक दृष्टिसे भगवान्‌की ओर देख रहे थे। तत्पश्चात् वासुदेव-विग्रहको नमस्कार करके विस्मय और आनन्दमें निमग्न हुए ऐतरेयने अपनी मातासे कहा—"माँ! मैं पूर्वजन्ममें शूद्र था, एक दिन सांसारिक दोषोंसे भयभीत हो एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मणकी शरणमें गया। वे बड़े दयालु थे। उन्होंने मुझे द्वादशाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया और कहा, 'सदा इस मन्त्रका जप किया कर।' उनकी इस आज्ञाके अनुसार मैं निरन्तर उस मन्त्रका जप करने लगा। उस जपके प्रभावसे तुम्हारे गर्भसे मेरा जन्म हुआ। मुझे पूर्वजन्मकी स्मृति हुई, भगवान् विष्णुके प्रति मेरे मनमें भक्तिका उदय हुआ और इस तीर्थमें सर्वदा निवास करनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ।" मातासे ऐसा कहकर ऐतरेय यज्ञमें गये और वहाँ यह श्लोक बोले—

नमस्तस्मै भगवते विष्णवेऽकुण्ठमेधसे।
यन्मायामोहितधियो भ्रमामः कर्मसागरे॥

'जिनकी बुद्धि कहीं कुण्ठित नहीं होती तथा जिनकी मायासे मोहितचित्त होकर हमलोग