संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 208, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १७९
कर्मोंके समुद्रमें भटक रहे हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है।'
इस श्लोकका आशय बहुत गम्भीर है। हरिमेधा आदि ब्राह्मणोंने जब इसे सुना, तब आसन और पूजा आदिके द्वारा ऐतरेयका बहुत सत्कार किया। तत्पश्चात् ऐतरेयने अपनी विद्यासे उन वेदार्थनिपुण ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया। फिर सबने उन्हें दक्षिणा दी। हरिमेधाने ऐतरेयको अपनी पुत्री भी दे दी। धन और पत्नीको ग्रहण करके ऐतरेय अपने घर आये। उन्होंने माताको आनन्दित किया और अनेकों निर्मल पुत्रोंको जन्म दिया। ऐतरेय सदा द्वादशी व्रतका पालन करते रहे। वे अनेक यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करके निरन्तर वासुदेवका ध्यान किया करते थे। इससे देहत्यागके पश्चात् उन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया। अर्जुन! ऐसी महिमावाले भगवान् वासुदेव यहाँ स्वयं विराजमान हैं। जो इनकी पूजा, अर्चा और स्तुति करता है, उसका सब पुण्य अक्षय माना गया है।
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भट्टादित्यकी स्थापना तथा नारदजीके द्वारा एक सौ आठ नामोंसे उनकी स्तुति
नारदजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन! भगवान् वासुदेवकी स्थापनाके पश्चात् मैंने पुनः मनुष्योंपर कृपा करनेकी इच्छासे प्रत्यक्ष देवता भगवान् सूर्यको इस तीर्थमें लानेका विचार किया। भगवान् सूर्य समस्त प्राणियोंके उद्गमस्थान हैं। वे इस लोक और परलोकमें भी सबका अभ्युदय करते हैं। श्रीसूर्यदेव सम्पूर्ण विश्वके आधार माने गये हैं। जो भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यका प्रतिदिन स्मरण, कीर्तन और पूजन करते हैं, वे निस्सन्देह कृतार्थ हो जाते हैं। जिसने इस संसारमें जन्म लेकर सहस्रों किरणोंवाले देवेश्वर भगवान् सूर्यका पूजन नहीं किया, उसने अपने आत्मासे ही द्रोह किया है। जो सदा भगवान् सूर्यकी भक्तिमें तत्पर और सर्वदा उन्हींमें मन लगाये रहनेवाले हैं, जो सदा सूर्यका ही स्मरण किया करते हैं, वे कभी दुःखके भागी नहीं होते हैं। भगवान् भास्करकी भक्ति दुर्लभ है, उनका पूजन दुर्लभ है, उनके लिये दान देनेका सौभाग्य दुर्लभ है तथा उनकी प्रसन्नताके लिये होम करना तो और भी दुर्लभ है। जिसकी जिह्वाके अग्रभागमें नमस्कार आदिसे युक्त 'रवि' ये दो अक्षर विराजते हैं, उसका जीवन सफल है। इस प्रकार भगवान् सूर्यके बड़े भारी माहात्म्यका चिन्तन करके मैंने पूरे सौ वर्षतक भक्तिपूर्वक सूर्यदेवकी आराधना की। मैं वायु पीकर रहता और सूर्यसम्बन्धी वैदिक मन्त्रोंके विशुद्ध जपसे भगवान् सूर्यकी स्तुति किया करता था। तब, अत्यन्त तेजके कारण जिनकी ओर देखना बहुत कठिन है, उन भगवान् सूर्यने योगबलसे दूसरी मूर्ति धारण करके आकाशमें