भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209
१८०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आकर मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दिया। तब मैंने हाथ जोड़कर भगवान्‌को नमस्कार किया और सामवेदके विविध मन्त्रोंद्वारा उनका स्तवन भी किया। इससे प्रसन्न होकर वर देनेवाले भगवान् सूर्यने कहा—'देवर्षे ! तुमने दीर्घकालतक तपस्याके द्वारा मेरी आराधना की है। अब कोई अभीष्ट वर माँगो।'

उनके ऐसा कहनेपर मैं हाथ जोड़कर बोला—भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना उचित समझते हैं, तो आपकी जो कामरूपिणी कला है, पूर्वकालमें राजा राजवर्धनने जिसकी आराधना की थी, उसी कलाके द्वारा आप सदा हमारी रक्षा करते रहें। तदनन्तर भगवान् सूर्यने सन्तुष्ट होकर जब 'तथास्तु' कह दिया, तब मैंने इस तीर्थमें भट्टादित्यके नामसे उनकी स्थापना की। मुझ भट्टके द्वारा स्थापित होनेके कारण भगवान् सूर्यका उक्त नाम प्रसिद्ध हुआ। तत्पश्चात् फूलोंसे भलीभाँति पूजा करनेपर मूर्तिमें भगवान् सूर्यका आवेश हुआ। यह देख मेरा सम्पूर्ण अंग भक्तिरसके उद्रेकमें डूब गया और मैंने सम्पूर्ण वेदोंके रहस्यभूत एक सौ आठ नामोंद्वारा सूर्यदेवका इस प्रकार स्तवन किया—

भगवान् सूर्य आप १ सप्तसप्ति (सात घोड़ोंसे युक्त रथपर विचरण करनेवाले), २ अचिन्त्यात्मा (जिनका स्वरूप चिन्तनमें नहीं आ सकता), ३ महाकारुणिकोत्तम (अत्यन्त करुणा करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ), ४ संजीवन (सबको भलीभाँति जीवित रखनेवाले), ५ जय (विजयी), ६ जीव (जीवन-दाता), ७ जीवनाथ (जीवोंके स्वामी) और ८ जगत्पति (संसारके स्वामी) हैं। आप ९ कालाश्रय (कालके आधार), १० कालकर्ता, ११ महायोगी, १२ महामति (परम बुद्धिमान्), १३ भूतान्तःकरण (समस्त भूतोंके अन्तरात्मा), १४ देव (द्युतिमान्), १५ कमलानन्दनन्दन (कमलोंका आनन्द बढ़ानेवाले), १६ सहस्रपाद् (किरणरूपी सहस्रों चरणोंसे सुशोभित), १७ वरद (वर देनेवाले), १८ दिव्यमण्डलमण्डित, १९ धर्मप्रिय, २० अर्चितात्मा (पूजित स्वरूपवाले), २१ सविता (सम्पूर्ण जगत्‌के उत्पादक), २२ वायुवाहन (प्रवह वायुके सहारे आकाशमें विचरण करनेवाले अथवा वायुके ऊपर स्थित), २३ आदित्य (अदिति-पुत्र), २४ अक्रोधन (क्रोधरहित), २५ सूर्य, २६ रश्मिमाली (किरण-समूहसे सुशोभित), २७ विभावसु (विशेषरूपसे प्रकाशित होनेवाले), २८ दिनकृत (अपने उदयसे दिन प्रकट करनेवाले), २९ दिनहृत् (स्वयं अस्त होकर दिनको हर लेनेवाले), ३० मौनी (मौन रहनेवाले), ३१ सुरथ (सुन्दर रथवाले), ३२ रथिनां वर (रथियोंमें श्रेष्ठ), ३३ राज्ञां पति (राजाओंके अधिपति), ३४ स्वर्णरेता (सुवर्णरूप बीजवाले), ३५ पूषा (पोषण करनेवाले), ३६ त्वष्टा, ३७ दिवाकर, ३८ आकाशतिलक, ३९ धाता (धारण-पोषण करनेवाले), ४० संविभागी (दिन-रातका विभाग करनेवाले), ४१ मनोहर, ४२ प्राज्ञ (विद्वान्), ४३ प्रजापति (बुद्धिके स्वामी अथवा प्रेरक), ४४ धन्य, ४५ विष्णु (व्यापक), ४६ श्रीश (शोभा और संपत्तिके स्वामी), ४७ भिषग्वर (अपनी किरणोंद्वारा नाना प्रकारके रोगोंके निवारण करनेवाले श्रेष्ठ वैद्य), ४८ आलोककृत (प्रकाशक), ४९ लोक-नाथ, ५० लोकपालनमस्कृत, ५१ विदिताशय (सबके अभिप्रायको जाननेवाले), ५२ सुनय (उत्तम नीतिवाले), ५३ महात्मा, ५४ भक्तवत्सल, ५५ कीर्ति, ५६ कीर्तिकर, ५७ नित्य, ५८ रोचिष्णु (कान्तिमान्), ५९ कल्मषापह (पापोंका नाश करनेवाले), ६० जितानन्द (आनन्दको अपने अधीन रखनेवाले), ६१ महावीर्य (परम पराक्रमी), ६२ हंस (आकाशरूपी सरोवरमें हंसके समान विचरण करनेवाले अथवा परमात्मा), ६३ संहारकारक (प्रलयकालमें संवर्तकानलरूपसे प्रकट होकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको दग्ध करनेवाले), ६४ कृतकृत्य,

संक्षिप्त स्कन्द पुराण · पृष्ठ 209, कुल 1406 में से · BharatKosha