भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 206
  • माहे‍श्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १७७ ---|---

हुआ प्राणी भी महात्माओंकी शरणमें आ जानेपर कष्ट नहीं भोगता। रोगी मनुष्योंको शरण देनेवाला वैद्य है, महासागरमें डूबे हुए मनुष्यका सहारा नौका है, बालकको आश्रय देनेवाले माता और पिता हैं, परंतु भगवन् ! अत्यन्त घोर संसार-बन्धनसे दुःखी हुए मनुष्यको शरण देनेवाले केवल आप ही हैं।* सर्वस्वरूप सर्वेश्वर ! प्रसन्न होइये, आप ही सबके कारण हैं। पारमार्थिक सारतत्त्व भी आप ही हैं। महान् दुःख-समूहसे भरे हुए, संसाररूपी गड्ढेसे स्वयं ही हाथ पकड़कर मुझे निकालिये। हे अच्युत ! हे उरुक्रम ! यह संसार भूख और प्याससे; वात, पित्त और कफ—इन तीन धातुओंसे; सर्दी, गरमी, आँधी और वर्षासे, आपसमें ही एक-दूसरेसे तथा कभी तृप्त न होनेवाली कामाग्नि तथा क्रोधाग्निसे बारंबार पीड़ित होता है। इसे इस दशामें देखकर मेरा मन बहुत दुःखी हो रहा है। मैंने अपनी शक्तिके अनुसार सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाले परमेश्वर भगवान् आप वासुदेवका स्तवन किया है। इससे सबका कल्याण हो, सम्पूर्ण जगत्के समस्त दोष नष्ट हो जायँ। आज मेरे द्वारा जगद्दाता वासुदेवकी स्तुति हुई है; इससे इस पृथ्वीपर, अन्तरिक्षमें, स्वर्गलोकमें तथा रसातलमें भी जो कोई प्राणी रहते हों, वे सिद्धिको प्राप्त हों। मेरे द्वारा स्तुति-पाठ करते समय जो लोग इसको सुनते हैं, इस स्तोत्रका उच्चारण करते समय जो मुझे देखते हैं, वे देवता, असुर, मनुष्य तथा पशु-पक्षी कोई भी क्यों न हों, सभी भगवान् विष्णुके तत्त्वका ज्ञान प्राप्त करें। इनके सिवा जो गूँगे तथा अन्यान्य इन्द्रियोंसे रहित हैं, जो देख-सुन नहीं सकते वे, तथा पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े आदि भी आज भगवत्तत्त्वज्ञानके भागी हो जायँ। संसारमें दुःखोंका नाश हो जाय, समस्त प्रजाके हृदयसे लोभ आदि दोषसमुदाय निकल जायँ। अपनेमें, अपने भाई और पुत्रमें जैसा प्रेम और आत्मीयताका भाव होता है, सब लोगोंका सबके प्रति वैसा ही भाव हो जाय। जो संसाररूपी रोगके चिकित्सक, सम्पूर्ण दोषोंके निवारणमें चतुर तथा परमानन्दकी प्राप्तिके हेतुभूत हैं, वे भगवान् विष्णु सबके हृदयमें विराजमान हों और ऐसा होनेसे सब लोगोंके संसार-बन्धन शिथिल हो जायँ। सम्पूर्ण विश्वको धारण करनेवाले भगवान् वासुदेवका स्मरण करनेपर मन, वाणी और शरीरद्वारा आचरित मेरे समस्त पाप नष्ट हो जायँ। हे वासुदेव ! ऐसा उच्चारण करनेपर अथवा भगवान् विष्णुके भक्तकी महिमाका कीर्तन करनेपर, अथवा श्रीहरिका स्मरण करनेपर समस्त पापोंका नाश हो जाता है। यदि यह सत्य है, तो इस सत्यके प्रभावसे मेरा पाप नष्ट हो जाय। अखिलेश्वर ! आपके चरणोंमें पड़े हुए मुझ सेवकपर आप यह सोचकर कृपा कीजिये कि 'यह बेचारा मूढ़ है—कुछ जानता नहीं, इसकी बुद्धि बहुत थोड़ी है, इसके द्वारा उद्यम भी बहुत कम हो पाता है। विषयोंसे इसका मन सदा क्लेशमें पड़ा रहता है, इसीलिये वह मुझमें नहीं लग पाता।' देव ! आपकी स्तुति करनेमें ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं। भगवन् ! आप प्रसन्न होइये। हे विष्णो ! आप बड़े दयालु हैं, मुझ अनाथपर कृपा कीजिये। हे अनन्त ! हे पापहारी हरि ! आप पुरुषोत्तम हैं, संसार-सागरमें डूबे हुए मुझ दीनका उद्धार कीजिये।'

अर्जुन ! ऐतरेयके इस प्रकार स्तुति करनेपर विशालकाय भगवान् वासुदेवने आनन्दमग्न होकर कहा—'वत्स ऐतरेय ! मैं तुम्हारी भक्तिसे और


* सोऽहं भृशार्तः करुणां कुरु त्वं संसारगर्ते पतितस्य विष्णो।
महात्मनां संश्रयमभ्युपेतो नैवावसीदत्यपि दुर्गतोऽपि॥
परायणं रोगवतां हि वैद्यो महाब्धिमग्नस्य च नौर्नरस्य।
बालस्य मातापितरौ सुघोरसंसारखिन्नस्य हरे त्वमेकः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३७। ९१-९२)