भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 213

१८४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

यथावत् विभाग करके दोनोंके लिये प्रमाण उपस्थित किया जाय उसे 'संख्या' वाक्य समझना चाहिये। और जहाँ वाक्यके विभिन्न अर्थोंमें अभेद देखा जाता है, उस अतिशय अभेदकी प्रतीतिमें जो हेतु है; उसे ही 'सूक्ष्मता' कहते हैं। यह वाक्यके गुणोंकी गणना हुई। अब वाणीके अठारह दोषोंका वर्णन सुनो। अपेतार्थ, अभिन्नार्थ, अप्रवृत्त, अधिक, अश्लक्ष्ण, सन्दिग्ध, पदान्त अक्षरका गुरु होना, पराङ्मुखमुख, अनृत एवं असंस्कृत, त्रिवर्गविरुद्ध, न्यून, कष्टशब्द, अतिशब्द, व्युत्क्रमाभिहत, सशेष, अहेतुक तथा निष्कारण*—ये वाणीके दोष हैं। अब बुद्धिके दोषोंको सुनो। काम, क्रोध, भय, लोभ, दैन्य, अनार्जव (कुटिलता)—इन छः दोषोंसे युक्त होकर तथा दया, सम्मान और धर्म—इन तीन गुणोंसे हीन होकर मैं कोई बात न कहूँगा। (उक्त छः दोषोंके साथ दयाहीनता, सम्मानहीनता और धर्महीनता—ये तीन दोष और मिल जानेसे नौ दोष होते हैं।) जब वक्ता, श्रोता और वाक्य तीनों अविकल रहकर बोलनेकी इच्छामें समान अवस्थाको प्राप्त हों, तभी वक्ताका अभिप्राय यथावत् रूपसे प्रकट होता है। बातचीत करते समय जब वक्ता श्रोताकी अवहेलना करता है अथवा श्रोता ही वक्ताकी उपेक्षा करने लगता है, तब बोला हुआ वाक्य बुद्धिपथपर नहीं चढ़ता। इसके सिवा, जो सत्यका परित्याग करके अपनेको अथवा श्रोताको प्रिय लगनेवाला वचन बोलता है, उसके उस वाक्यमें सन्देह उत्पन्न होने लगता है; अतः वह वाक्य भी सदोष ही है। इसलिये जो अपनेको या श्रोताको प्रिय लगनेवाली बात छोड़कर केवल सत्य ही बोलता है, वही इस पृथ्वीपर यथार्थ वक्ता है, दूसरा नहीं।

शास्त्रोंके जालसे पृथक् हो मिथ्यावादोंको छोड़कर केवल सत्य कहना ही मेरा व्रत है। इसलिये मैं 'सत्यव्रत' कहलाता हूँ। मैं तुमसे सच्ची बात कहूँगा और तुम्हें भी उसे सत्य मानकर ही स्वीकार करना चाहिये। भलेमानुस ! जबसे तुम पत्थर पूजनेमें लग गये, तबसे तुम्हें कोई अच्छा फल मिला हो, ऐसा मैं नहीं देखता। तुम्हारे एक ही तो पुत्र था, वह भी नष्ट हो गया। पतिव्रता पत्नी थी, सो भी संसारसे चल बसी। साधो ! झूठे तथा कपटपूर्ण कर्मोंका ही ऐसा फल हुआ करता है। भैया ! देवता कहाँ हैं? सब मिथ्या है। यदि होते तो दिखायी न देते? यह सब कुछ कपटी ब्राह्मणोंकी झूठी कल्पना है। लोग पितरोंके उद्देश्यसे दान देते हैं, यह देखकर मुझे तो हँसी आती है। मेरी दृष्टिमें यह अन्नकी बरबादी है। भला, मरा हुआ मनुष्य क्या खायेगा? मूर्ख एवं नीच ब्राह्मण, जो समस्त संसारकी सृष्टिका अनेक प्रकारसे वर्णन किया करते हैं, उसमें भी जो यथार्थ बात है उसे सुनो। संसारकी सृष्टि और संहार—ये दोनों बातें झूठी हैं। वास्तवमें यह जगत् सत्य है और इसी रूपमें सदा बना रहता है। यह विश्व स्वभावसे ही सदा वर्तमान


* जिस वाणीके उच्चारण करनेपर भी अर्थका भान न हो, वह 'अपेतार्थ' है। जिससे अर्थभेदकी स्पष्ट प्रतीति न हो, वह अभिन्नार्थ है। जो सदा व्यवहारमें न आता हो ऐसा शब्द 'अप्रवृत्त' कहा गया है। जिसके न रहनेपर भी वाक्यार्थ-बोध हो जाता है, वह वाक् या शब्द अधिक है। अस्पष्ट अथवा अपरिमार्जित वाणीको अश्लक्ष्ण कहते हैं। जिससे अर्थमें सन्देह हो वह सन्दिग्ध है। पदान्त अक्षरका गुरु उच्चारण भी एक दोष ही है। वक्ता जिस अर्थको व्यक्त करना चाहता है, उसके विपरीत अर्थकी ओर जानेवाली वाणीको पराङ्मुखमुख कहा गया है। अनृतका अर्थ है असत्य। व्याकरणसे सिद्ध न होनेवाली वाणीको असंस्कृत कहते हैं। धर्म, अर्थ और कामके विपरीत विचार प्रकट करनेवाली वाणी त्रिवर्ग-विरुद्ध कही गयी है। अर्थ-बोधके लिये पर्याप्त शब्दका न होना न्यून दोष है। जिसके उच्चारणमें क्लेश हो, वह कष्टशब्द है। अतिशयोक्तिपूर्ण शब्दको यहाँ अतिशब्द कहा है। जहाँ क्रमका उल्लंघन करके शब्दप्रयोग हुआ हो, वह व्युत्क्रमाभिहत कहलाता है। वाक्य पूरा होनेपर भी यदि बात पूरी नहीं हुई तो वहाँ सशेष नामक दोष है। कथित अर्थकी सिद्धिके लिये जहाँ उचित तर्क या युक्तिका अभाव हो; वहाँ अहेतुक दोष है। जब किसी बातके कहे जानेका कोई कारण नहीं बताया गया हो अथवा किसी शब्दके प्रयोगका उचित कारण न हो, तब वहाँ निष्कारण दोष है।