संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १८५ |
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रहता है, ये सूर्य आदि ग्रह स्वभावसे ही आकाशमें विचरण करते हैं, स्वभावसे ही निरन्तर वायु चलती है, स्वभावसे ही मेघ पानी बरसाता है और स्वभावसे ही बोया हुआ धान्य जमता है। स्वभावसे ही पृथ्वी स्थिर है, स्वभावसे ही नदियाँ बहती हैं, स्वभावसे ही पर्वत अविचलभावसे सुशोभित हैं और स्वभावसे ही समुद्र अपनी मर्यादामें स्थित है। स्वभावसे ही गर्भवती स्त्री पुत्र पैदा करती है, स्वभावसे ही ये बहुतेरे जीव उत्पन्न होते हैं। जैसे स्वभावसे ही लोग टेढ़े होते हैं, ऋतुके स्वभावसे ही बेरोंमें काँटे पैदा होते हैं—उसी प्रकार स्वभावसे ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है। इसका कोई प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला कर्ता नहीं है। इस प्रकार स्वभावसे ही सम्पूर्ण लोक स्थित हैं। ऐसी अवस्थामें भी मूर्ख मनुष्य इस विषयको लेकर मतवालेकी भाँति व्यर्थ मोहमें पड़ा रहता है। धूर्तलोग इस मनुष्ययोनिको भी जो सबसे श्रेष्ठ बतलाते हैं, इसकी भी पोल खोलता हूँ, सुनो। मनुष्ययोनिसे बढ़कर दूसरी किसी योनिमें कष्ट नहीं है। मनुष्योंको जो कष्ट है, वह हमारे शत्रुओंको भी न हो। मनुष्योंके समक्ष क्षण-क्षणमें शोकके सहस्रों स्थान आते हैं। यह मानवयोनि क्या है, बन्दीगृह है! कोई बड़भागी पुरुष ही इससे छुटकारा पाता है। ये पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े बिना किसी बन्धनके सुखपूर्वक विहार करते हैं; इनकी योनि अत्यन्त दुर्लभ है। ये स्थावर (वृक्ष-पर्वत आदि) कितने निश्चिन्त हैं। पृथ्वीपर इन्हींका सुख महान् है। अधिक क्या कहें, मनुष्योंकी अपेक्षा अन्य योनियोंमें उत्पन्न होनेवाले सभी जीव धन्य हैं। कोई स्थावर हैं, कोई कीड़े हैं, कोई पतंग हैं और कोई मनुष्य आदि जीवोंके रूपमें उत्पन्न हुए हैं। इसमें स्वभावको ही प्रधान कारण समझो। पुण्य और पाप आदि तो कल्पनामात्र हैं। इसलिये नन्दभद्र! तुम मिथ्या-धर्मका परित्याग करके मौजसे खाओ, पीओ, खेलो और भोग भोगो। पृथ्वीपर, बस यही सत्य है।'
नारदजी कहते हैं—सत्यव्रतके इन वाक्योंसे, जो अशुभकर, अयुक्तिसंगत तथा असमंजस (दोषपूर्ण) थे, महाबुद्धिमान् नन्दभद्र तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे क्षोभरहित समुद्रकी भाँति गम्भीर थे। उन्होंने हँसते हुए उत्तर दिया—'सत्यव्रतजी! आपने जो यह कहा कि धर्मनिष्ठ मनुष्य सदा दुःखके भागी होते हैं, वह झूठ है। हम तो पापियोंपर भी बहुतेरे दुःख आते देखते हैं। संसारबन्धनजनित क्लेश तथा पुत्र और स्त्री आदिकी मृत्युके दुःख, पापी मनुष्योंके यहाँ भी देखे जाते हैं। इसलिये मेरे मतमें धर्म ही श्रेष्ठ है। किसी पुण्यात्मा साधुपुरुषपर संकट आया देखकर बड़े-बड़े लोग सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए यह कहते हैं कि 'अहो! ये तो साधु पुरुष हैं, इनपर कष्ट आया, यह तो हमारे लिये बड़े दुःखकी बात है' इत्यादि। पापियोंको तो यह सहानुभूति भी दुर्लभ है। स्त्री तथा धन आदिके लोभसे जब कोई पापी लुटेरा घरमें घुसता है, तो आप भी उससे डर जाते हैं; उसके प्रति द्वेषका परिचय देते हैं और उसके